अयोध्या के पास वन में विश्वामित्रजी का आश्रम था। रामचरित मानस में इसे शुभ आश्रम लिखा है और वाल्मीकि रामायण में सिद्ध आश्रम। विश्वामित्रजी के यज्ञ के समय मारीच-सुबाहु राक्षस विघ्न उत्पन्न करने लगे, तब उन्हें चिंता हुई। गृहस्थ हो, चाहे साधु हो, किसी न
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शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने चंद्रेश्वर महादेव मंदिर बिसनावदा में नौ दिवसीय श्रीराम कथा के चौथे दिन शुक्रवार को यह बात कही। व्यासपीठ का पूजन दारासिंह पटेल और उनके परिवार ने किया।
कथा में आरती करते श्रद्धालु
अयोध्या का सच्चा साधु कभी भिक्षा नहीं मांगता
महाराजश्री ने बताया कि ऐसा माना जाता है कि अयोध्या में सदियों के साधुओं की यह परंपरा चली आ रही है कि वहां के साधु फटे कपड़े पहन लेते हैं लेकिन भिक्षा नहीं मांगते, भूख लगती है तो सत्तू खा लेते हैं और सीता-राम, सीता-राम भजते हैं। इनके विपरीत आजकल के ठगोरे साधु महंगी गाड़ियों में बैठकर शहरों में आते हैं, भोले-भाले लोगों को यह कहकर ठगते हैं कि हम अयोध्या से आए हैं या वृंदावन से आए हैं। अरे भाई, लोग अयोध्या-वृंदावन जाते हैं, तुम आ क्यों गए? लोग इस बात को नहीं समझते हैं। धर्म के नाम पर इन ठगोरों की बातों में आकर ठगे जाते हैं। कई कहते हैं हम कथा करने वृंदावन से आए हैं। आश्चर्य है लोग वृंदावन कथा करने जाते हैं ये लोग वृंदावन से कथा करने आ जाते हैं। सरयू भक्ति भूमि है। आज भी वहां के सच्चे साधु कहीं भीख मांगने नहीं जाते, वहीं भगवान का भजन करते हैं। तीर्थों में जाकर गंदगी नहीं करनी चाहिए। किसी भी तीर्थ जाएं तो तीर्थ का वंदन करना चाहिए। कुल्ला नहीं करना चाहिए। साबुन लगाकर नहीं नहाना चाहिए। कपड़े नहीं धोना चाहिए। शरीर नहीं बल्कि तीर्थों में मन धोना चाहिए।
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कथा में उपस्थित श्रद्धालु
जब भी कोई चंद्र होता है, विश्वामित्रजी आ जाते हैं…
डॉ. गिरीशानंदजी ने बताया- दशरथजी को पता चला कि विश्वामित्रजी आए हैं, तो वे सुनते ही घबरा गए। वशिष्ठजी से बोले- रघुकुल में जब भी कोई चंद्र होता है, तो विश्वामित्रजी आ जाते हैं। पहले हरिश्चंद्र हुए थे, अब रामचंद्र हुए हैं। वशिष्ठजी ने कहा- ऐसा कुछ नहीं है। विश्वामित्रजी का अभिनंदन करो, वंदन करो। दशरथजी ने सिंहासन पर बिठाया, विश्वामित्रजी मन में मुस्काए। भगवान तुमने मुझे वन से महल में बुलवा लिया। कुशासन छुड़वाकर सिंहासन पर बिठा दिया। भगवान मुस्कुराए। गुरुदेव आपने तो आज त्याग का भी त्याग कर दिया। विश्वामित्रजी मन में बोले- तुमने मुझसे मेरा वन छुड़वा दिया, मैं तुम्हारा महल छुड़वा दूंगा। तुमने कंद-मूल-फल छुड़ाए, भोजन कराया, मैं तुम्हारा भोजन छुड़ा दूंगा और कंद-मूल-फल खिलाउंगा। दशरथजी से जब रामजी को मांगा, विश्वामित्रजी ने यज्ञ की रक्षा के लिए, कहा कि ये यज्ञ से हुए हैं और यज्ञ पूर्ण हम कराएंगे। दशरथजी घबरा गए बोले- राम देत नहीं बने गोसाई… विश्वामित्रजी बोले-अभी तो आपने कहा था कि सबकुछ आपका है और अब मना कर रहे हो। दशरथजी बोले मना नहीं कर रहा हूं, यह ट्रस्ट की संपत्ति है। शंकरजी के इष्ट हैं, भक्तों के भगवान हैं, हमारे पुत्र हैं, विश्वामित्रजी बोले- ट्रस्टियों की लिस्ट हमारे पास है। बुला लो, फैसला हो जाएगा। वशिष्ठजी ने दशरथजी से कहा- विवाद में मत पड़ो। राम मत दो इन्हें अपना पद दे दो। कहने लगे कैसा पद? वशिष्ठजी बोले सिंहासन पर तो बिठा ही दिया है, पद तो त्याग ही दिया है, ये राम का लगन कराएंगे। दशरथजी समझ गए और उन्होंने कहा- गुरुदेव आज से आप इनके माता-पिता होंगे और कल की जगह इन्हें अभी ले जाओ, क्योंकि वे लगन की बात सुनकर बहुत खुश हो गए। उन्होंने कहा कि मेरी इच्छा है- वृद्ध अवस्था में मैं राम को जोड़े सहित सिंहासन पर बैठा देखूं। आज हमारे भाग्य खुल गए, जो लगन कराने विश्वामित्रजी पधारे।
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