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‘दुश्मनों से लड़ सकता हूँ, लेकिन सिस्टम से हार गया’, इंदौर में अपनी पुश्तैनी जमीन के लिए दर-दर भटक रहा सेना का सूबेदार

‘दुश्मनों से लड़ सकता हूँ, लेकिन सिस्टम से हार गया’, इंदौर में अपनी पुश्तैनी जमीन के लिए दर-दर भटक रहा सेना का सूबेदार

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। सीमा पर देश की रक्षा करने वाले सैनिकों के सम्मान और सुशासन के दावे करने वाली व्यवस्था की संवेदनहीनता का बड़ा उदाहरण मंगलवार को इंदौर कलेक्टोरेट की जनसुनवाई में सामने आया।

राजौरी सेक्टर में पदस्थ सेना के सूबेदार निलेश पंचाल अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने की गुहार लेकर अधिकारियों के सामने पहुंचे। दर्द यह था कि जो जवान देश की सीमा पर रात-दिन ड्यूटी कर रहा है, वह अपने गांव में अपनी ही पुश्तैनी जमीन का सीमांकन तक नहीं करवा पा रहा।

तीन साल से भटका रहा राजस्व विभाग

महू तहसील के ग्राम आम्बाचंदन निवासी सूबेदार निलेश पंचाल ने बताया कि उनकी पुश्तैनी कृषि भूमि पर पड़ोसी कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। सीमांकन के लिए वे पिछले तीन वर्षों से लगातार आवेदन दे रहे हैं, लेकिन राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई करने के बजाय हर बार नया बहाना बनाकर मामला टाल देते हैं।

सूबेदार ने आरोप लगाया कि हर छुट्टी में वे घर आते हैं, लेकिन पूरा समय पटवारी और तहसील कार्यालय के चक्कर लगाने में ही निकल जाता है। इस बार भी परिवार ने 3 मार्च को सीमांकन के लिए आवेदन दिया था, लेकिन उसे गलत बताकर प्रक्रिया रोक दी गई। इसके बाद 28 अप्रैल को दोबारा आवेदन किया गया, लेकिन अब तक सीमांकन आदेश जारी नहीं हुए। पटवारी द्वारा ‘कैलेंडर के अनुसार ही नपती होगी’ कहकर मामला टाला जा रहा है।

देश की रक्षा करने वाले का अपमान

सूबेदार निलेश पंचाल का कहना है कि 20 साल से सेना में रहकर देश की सीमा की रक्षा कर रहा हूं और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भी लगातार ड्यूटी की, लेकिन जब अपने हक की जमीन बचाने की बात आई तो प्रशासन ने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई।

सूबेदार निलेश 15 अप्रैल को एक माह की छुट्टी लेकर गांव आए थे और 15 मई को उन्हें फिर ड्यूटी पर लौटना है। इसके बावजूद सीमांकन की प्रक्रिया शुरू तक नहीं हो सकी। आम्बाचंदन गांव स्थित सर्वे नंबर 752/2, रकबा 1.977 हेक्टेयर कृषि भूमि परिवार के सदस्यों सुबद्राबाई, श्यामलाल, पुष्पाबाई, भूरीबाई और सुमनबाई के नाम दर्ज है। मौके पर जमीन कम होने के कारण परिवार सीमांकन की मांग कर रहा है।

कागजों तक सीमित राजस्व अभियान और अधिकारियों की लीपापोती

प्रदेश सरकार ने लंबित राजस्व प्रकरणों के निराकरण के लिए पिछले वर्षों में विशेष अभियान चलाए। कलेक्टर शिवम वर्मा ने भी मार्च में राजस्व अभियान चलाने के निर्देश दिए थे, लेकिन जमीनी हकीकत अलग दिखाई दे रही है। सीमांकन, बटांकन और नक्शा सुधार जैसे सामान्य मामलों में भी लोगों को महीनों नहीं, बल्कि वर्षों तक भटकना पड़ रहा है।

मामला जनसुनवाई में पहुंचने के बाद राजस्व विभाग प्रक्रिया की लीपापोती में लग गया। तहसीलदार यशदीप राव का कहना है कि पहले नक्शा सुधार होगा, इसके बाद सीमांकन हो सकेगा। राजस्व अधिकारी नक्शे की गड़बड़ी बताने में जुटे हैं। सवाल यह उठ रहे हैं कि यदि नक्शा सुधार के बाद ही सीमांकन होना था, तो हाथों-हाथ सुधार का आवेदन क्यों नहीं लिया गया। मामला तीन साल से टाला जा रहा है।

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