नईदुनिया प्रतिनिधि, धार। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला विवाद (Dhar Bhojshala Dispute Case) पर बड़ा फैसला सुनाते हुए इसे मंदिर से जुड़ा स्थल माना है। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि यह निर्णय अचानक नहीं लिया गया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले में तय किए गए सिद्धांतों के आधार पर दिया गया है।
न्यायमूर्ति विजय शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने कहा कि उन्होंने एएसआई की रिपोर्ट, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, पुरातात्विक तथ्यों और सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन करने के बाद फैसला दिया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह संपत्ति के मालिकाना हक पर फैसला नहीं दे रहा, बल्कि विवादित स्थल के स्वरूप को तय कर रहा है।
अयोध्या फैसले के सिद्धांत बने आधार
कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या मामले में दिए गए 10 अहम सिद्धांतों का जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि धार्मिक और ऐतिहासिक विवादों में केवल दस्तावेज ही नहीं, बल्कि आस्था, पूजा की परंपरा और ऐतिहासिक निरंतरता भी महत्वपूर्ण होती है।
कोर्ट के अनुसार, ऐसे मामलों में “संभावना की प्रबलता” यानी कौन-सी बात ज्यादा संभावित लगती है, उसी आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर तथ्य को गणितीय तरीके से पूरी तरह साबित करना जरूरी हो।
धार्मिक आस्था और पूजा को माना अहम
हाईकोर्ट ने कहा कि आधुनिक अदालतों का काम धार्मिक मान्यताओं की सत्यता जांचना नहीं, बल्कि यह देखना है कि किसी स्थल पर पूजा-अर्चना की परंपरा कितनी पुरानी और लगातार रही है।
फैसले में कहा गया कि भोजशाला में हिंदू पूजा के लगातार प्रमाण मिले हैं। कोर्ट ने राजा भोज से जुड़े संस्कृत शिक्षण केंद्र और देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर के रूप में इस स्थल की ऐतिहासिक पहचान को भी स्वीकार किया। कोर्ट ने माना कि भक्त भी देवता और धार्मिक स्थल के हितों की रक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
मूर्ति टूटने से खत्म नहीं होता धार्मिक अधिकार
फैसले में अयोध्या केस के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया गया जिसमें कहा गया था कि यदि किसी मंदिर की मूर्ति टूट जाए या मौजूद न हो, तब भी धार्मिक उद्देश्य खत्म नहीं होता।
कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्थल की पहचान सिर्फ मूर्ति से नहीं, बल्कि उसकी परंपरा, आस्था और धार्मिक उपयोग से तय होती है। ऐसे मामलों में अदालत धार्मिक उद्देश्य को कानूनी पहचान दे सकती है ताकि भक्तों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।
आस्था को हर बार दस्तावेजों से साबित करना जरूरी नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि आस्था और विश्वास को हमेशा कागजी सबूतों से साबित नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि धार्मिक विश्वास व्यक्ति के निजी दायरे का हिस्सा होता है।
फैसले में कहा गया कि अदालतों को यह नहीं देखना चाहिए कि कौन-सा धर्म ज्यादा मजबूत है, बल्कि यह देखना चाहिए कि किसी समुदाय की आस्था कितनी लगातार और सच्ची रही है। कोर्ट ने साफ कहा कि “परीक्षण तर्कसंगतता का नहीं, बल्कि आस्था की प्रामाणिकता का होना चाहिए।”
एएसआई रिपोर्ट को माना अहम सबूत
भोजशाला मामले में एएसआई की रिपोर्ट को भी कोर्ट ने महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि पुरातत्व कोई अनुमान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और बहु-विषयक प्रक्रिया है। कोर्ट ने माना कि एएसआई रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि उसकी जांच और मूल्यांकन अदालत द्वारा किया जाना जरूरी है।
फैसले में कहा गया कि यदि किसी इमारत की नींव पुरानी संरचना पर बनी हो या फर्श पहले की इमारत के ऊपर तैयार किया गया हो, तो यह जबरन ढांचे में बदलाव के संकेत हो सकते हैं।
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सरकारी रिकॉर्ड और गजेटियर पर भी विचार
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी गजेटियर, पुराने रिकॉर्ड और प्रशासनिक दस्तावेज किसी स्थल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि केवल सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर मालिकाना हक तय नहीं किया जा सकता। ऐसे दस्तावेजों को दूसरे सबूतों के साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए।
वक्फ और धार्मिक अधिकारों पर कोर्ट की टिप्पणी
फैसले में कहा गया कि किसी एक पक्ष के धार्मिक दावे को इस तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता जिससे दूसरे समुदाय के स्थापित धार्मिक अधिकार खत्म हो जाएं।
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कोर्ट ने कहा कि अयोध्या फैसले में भी यही सिद्धांत अपनाया गया था। इसलिए भोजशाला मामले में भी सभी पक्षों के दावों का संतुलित तरीके से परीक्षण किया गया।
मुस्लिम पक्ष के लिए अलग जगह का सुझाव
हाईकोर्ट ने एएसआई के 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें हिंदुओं को मंगलवार और मुस्लिम पक्ष को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी।
अब फैसले के बाद मंदिर में पूजा-अर्चना का अधिकार हिंदू पक्ष को मिला है। साथ ही कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया कि मुस्लिम पक्ष के लिए नमाज अदा करने हेतु दूसरी जगह उपलब्ध कराई जाए।
सरकार को दिए अहम निर्देश
फैसले में कोर्ट ने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ धार्मिक स्थलों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। सरकार को श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाएं, आश्रय स्थल, कानून व्यवस्था और धार्मिक स्थल की पवित्रता बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। कोर्ट ने भोजशाला के संरक्षण और प्रबंधन में ASI की भूमिका को भी सही माना।
अयोध्या और भोजशाला केस में अंतर
हाईकोर्ट ने साफ किया कि अयोध्या मामला जमीन के मालिकाना हक से जुड़ा था, जबकि भोजशाला केस का मुख्य मुद्दा विवादित स्थल का धार्मिक और ऐतिहासिक स्वरूप तय करना है। कोर्ट ने कहा कि इसी कारण अयोध्या फैसले के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए भोजशाला मामले का मूल्यांकन किया गया।
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