इंदौर शहर की ऐतिहासिक धरोहर गांधी हॉल की स्थिति लगातार बिगड़ती ही जा रही है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के अंतर्गत इस ऐतिहासिक परिसर के जीर्णोद्धार पर 15 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि खर्च की जा चुकी है, लेकिन मात्र तीन साल के भीतर ही यह पूरा परिसर एक बार फिर बदहाली का शिकार हो गया है। आज धरातल पर स्थिति इतनी चिंताजनक हो चुकी है कि परिसर में बनाए गए रिक्रिएशन सेंटर को निर्माण कार्य पूरा होने के बाद आज तक एक बार भी आम जनता या किसी गतिविधि के लिए खोला नहीं जा सका है। देखरेख के अभाव में यह केंद्र अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। परिसर में बैठने के लिए लगाई गई बेंचें टूट चुकी हैं, आकर्षक फव्वारा पूरी तरह बंद पड़ा है और मुख्य भवन की दीवारों में सीलन आ चुकी है। वर्तमान में गांधी हॉल को केवल चुनिंदा कार्यक्रमों के आयोजन के समय ही खोला जाता है। यदि शहर का कोई नागरिक या बाहर से आने वाला पर्यटक इस ऐतिहासिक इमारत को अंदर से देखना चाहे, तो उसे भीतर जाने की अनुमति भी नहीं मिल पाती है।
प्राकृतिक खूबसूरती हो गई नष्ट
शहर में प्राकृतिक रूप से खूबसूरत स्थानों में से एक गांधी हॉल अब पूरी तरह से हरियाली विहीन होता जा रहा है। कभी यहां पर सावन के झूले लगते थे और प्रांगण में ही मौजूद विशालकाय प्राचीन वृक्षों पर महिलाएं सावन के झूलों का आनंद उठातीं थी। परिसर में प्रवेश करते ही हर तरफ हरियाली नजर आती थी और बड़े बड़े पेड़ों और चारों तरफ बिखरे फूलों से शहरवासियों का स्वागत होता था। अब परिसर में न तो कहीं वह प्राचीन वृक्ष नजर आते हैं न ही कहीं हरियाली दिखाई देती है। हर तरफ बस सीमेंट, कांक्रीट के आधे अधूरे निर्माण और कटे हुए पेड़ नजर आते हैं।
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत हुए कामों को हो गई दुर्दशा
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के अंतर्गत साल 2018 में गांधी हॉल के जीर्णोद्धार का काम बड़े स्तर पर शुरू किया गया था। इस योजना के तहत लगभग साढ़े छह करोड़ रुपए की राशि केवल मुख्य इमारत को उसका पुराना स्वरूप और रौनक लौटाने के लिए खर्च की गई थी। इसके अलावा पूरे परिसर के विकास कार्यों को मिलाकर कुल 15 करोड़ रुपए से ज्यादा का बजट खर्च हुआ था। साल 2022 में इस जीर्णोद्धार कार्य को पूरा घोषित किया गया, जिसके तहत भवन के फर्श बदले गए, दीवारों का आकर्षक रंगरोगन किया गया, वाटर प्रूफिंग का काम हुआ और एक सुंदर बगीचा भी तैयार किया गया था। परिसर में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मुख्य रूप से रिक्रिएशन सेंटर, भवन के पिछले हिस्से में एक ओपन थिएटर और एक लाइब्रेरी के लिए जगह निर्धारित की गई थी। इसके बावजूद रिक्रिएशन सेंटर का ताला एक बार भी नहीं खुल सका, क्योंकि गांधी हॉल के संचालन की जिम्मेदारी लेने के लिए कोई भी एजेंसी आगे नहीं आई। नतीजा यह है कि आज इस सेंटर के भीतर कचरे के ढेर जमा हो चुके हैं और पास ही बने जलाशय में भी गंदा पानी तथा गंदगी भरी हुई है।
ऐतिहासिक इमारत के भीतर का सच और घटिया निर्माण
वर्तमान में इस धरोहर की हालत को करीब से देखें तो हॉल के मुख्य दरवाजों पर लगे नकूचे और हैंडल टूटे हुए मिलते हैं, बिजली के बोर्ड गायब हैं और चारों तरफ गंदगी का साम्राज्य नजर आता है। भवन की ऊपरी मंजिल पर आई भारी सीलन की वजह से छत और दीवारें फफूंद से भर चुकी हैं, जबकि परिसर का सुलभ शौचालय भी बंद पड़ा हुआ है। रिनोवेशन के दौरान लकड़ी के कार्यों में प्लायवुड और बेहद सस्ती लकड़ी का इस्तेमाल किया गया था, जिसकी कलई अब खुलने लगी है। करीब दो साल पहले एक शासकीय कार्यक्रम के दौरान छत से प्लायवुड गिरने की एक दुर्घटना भी हो चुकी है, जिसके बाद आनन-फानन में इसकी मरम्मत कराई गई थी। इसके बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ और सीढ़ियों पर लगी ऐतिहासिक विंटेज रैलिंग की कीमती लकड़ी कई जगहों से सड़ने लगी है। इसके साथ ही बगीचे की बेंचें पूरी तरह टूट चुकी हैं और मुख्य फव्वारा कबाड़ में तब्दील हो रहा है।
दुर्लभ तस्वीरें गायब और महात्मा गांधी उद्यान की अधूरी योजना
इस बदहाली के बीच एक और गंभीर बात सामने आई है कि गांधी हॉल में पहले इंदौर और महू क्षेत्र के उन वीर सैनिकों तथा युद्धों में शहीद हुए ब्रिगेडियर्स की दुर्लभ तस्वीरें सहेजकर रखी गई थीं, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, रिनोवेशन के दौरान करीब 18 फ्रेम वाली इन अमूल्य और ऐतिहासिक तस्वीरों को बिना किसी सार्वजनिक सूचना के वहां से हटा दिया गया। वर्तमान में ये तस्वीरें कहां रखी हैं या किस हाल में हैं, इस बारे में कोई भी पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त, गांधी हॉल के पिछले हिस्से की 5500 वर्ग फीट जमीन पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को प्रदर्शित करने वाला एक भव्य उद्यान बनाने की योजना स्वीकृत हुई थी। प्रशासन ने पांच करोड़ रुपए की लागत से इसे मात्र छह महीने के भीतर तैयार करने का बड़ा दावा किया था। इस उद्यान में एक विशेष पाथ-वे बनाया जाना था, जिसमें अत्याधुनिक ग्राफिक्स, सुंदर म्यूरल्स और स्कल्पचर के माध्यम से गांधीजी के जीवन, देश के आजादी आंदोलन और स्वतंत्र भारत के निर्माण में उनके अमूल्य योगदान को दर्शाया जाना प्रस्तावित था। इस पाथ-वे के अंतिम छोर पर एक सुंदर जलाशय का निर्माण कर उस पर हे राम लिखा जाना था, लेकिन योजना बनने के तीन साल बीत जाने के बाद भी यह उद्यान सिर्फ कागजों पर ही सीमित है और जमीन पर नहीं आ सका है।
जिम्मेदारों का आश्वासन, फिर लौटेगा गांधी हॉल का गौरवमयी इतिहास
इस पूरे विषय पर इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव और नगर निगम कमिश्नर क्षितिज सिंघल का कहना है कि गांधी हॉल को जल्द ही शहर के सामने पहले से भी अधिक सुंदर और बेहतर रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत यहां पर कई बड़े और महत्वपूर्ण कार्य पहले ही करवाए जा चुके हैं और परिसर के जो भी बचे हुए कार्य या कमियां हैं, उन्हें बहुत जल्द पूरा कर लिया जाएगा। अगर इस इमारत के इतिहास पर नजर डालें तो साल 1904 में निर्मित इस ऐतिहासिक गांधी हॉल पर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत भारी बजट लगाया गया है। ब्रिटिश काल में निर्माण के समय इसका नाम किंग एडवर्ड हॉल रखा गया था, जिसे देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद बदलकर गांधी हॉल कर दिया गया। होलकर राजवंश के शासनकाल के दौरान इस अद्भुत इमारत का डिजाइन प्रसिद्ध वास्तुकार जेजे स्टीवेंस द्वारा तैयार किया गया था और इसकी निर्माण शैली को शुद्ध राजपूताना स्वरूप दिया गया था। पाटन के विशेष पत्थरों से निर्मित इस भव्य इमारत को इंदौर के स्थानीय लोग घंटा घर के नाम से भी जानते हैं, क्योंकि गांधी हॉल की सबसे ऊपरी मंजिल पर एक विशाल घड़ी स्थापित की गई है, जो आज भी लगभग आधा किलोमीटर की दूरी से लोगों को बिल्कुल सही समय बता देती है।
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