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सड़क की धूल ने बिगाड़ी स्वच्छ इंदौर की सांस: शहर के मध्य क्षेत्र में लगातार 110 से 140 के बीच एक्यूआई, पीएम 2.5 बना सबसे बड़ा खतरा

सड़क की धूल ने बिगाड़ी स्वच्छ इंदौर की सांस: शहर के मध्य क्षेत्र में लगातार 110 से 140 के बीच एक्यूआई, पीएम 2.5 बना सबसे बड़ा खतरा

प्रणय चौहान, नईदुनिया, इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ शहर के तमगे के बावजूद इंदौर अब हवा की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। शहर के मध्य क्षेत्र छोटी ग्वालटोली के हालिया एक्यूआई आंकड़े बताते हैं कि मई महीने में हवा लगातार मध्यम श्रेणी में बनी रही। कई दिनों में एक्यूआई 120 से 140 तक पहुंच गया।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक लगातार हवा में मौजूद हैं, जो सीधे फेफड़ों और रक्त प्रवाह तक पहुंचते हैं। इससे गंभीर बिमारियां होने की खतरा बढ़ जाता है। बढ़ते प्रदूषण, धूल और दूषित हवा के बीच फिर सवाल उठने लगा है कि क्या शहरवासियों को मास्क की आदत अपनानी होगी। ताजा हालात संकेत दे रहे हैं कि खराब हवा सीधे शहरवासियों की सांसों पर असर डाल रही है।

मध्यम श्रेणी का अर्थ यह नहीं कि खतरा टल गया है

मई में छोटी ग्वालटोली क्षेत्र का एक्यूआई 71 से 140 के बीच दर्ज किया गया। 15 मई को यह 140 तक पहुंच गया, जबकि मई में कई दिन 110 से ऊपर दर्ज किया। विशेषज्ञों के अनुसार मध्यम श्रेणी का अर्थ यह नहीं कि खतरा टल गया है। लंबे समय तक ऐसी हवा में रहना बच्चों, बुजुर्गों और सांस रोगियों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। जबकि पराली जलाने संबंधी मामले भी बंद हो चुके है।

जमीन पर अपेक्षित असर दिखाई नहीं दे रहा

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2025 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भी इंदौर को वायु प्रदूषण कम करने के लिए विशेष कदम उठाने के निर्देश दिए थे। नगर निगम ने धूल नियंत्रण, मैकेनिकल स्वीपिंग और पानी के छिड़काव सहित कई योजनाएं घोषित की थीं, ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि जमीन पर अपेक्षित असर दिखाई नहीं दे रहा। शहर में प्रदूषण का स्तर लगातार खराब बना हुआ है।

सड़क की धूल बन रही बड़ा कारण

पर्यावरणविदों का मानना है कि शहर में बढ़ती रोड डस्ट यानी सड़क की धूल अब प्रदूषण का प्रमुख कारण बन चुकी है। इसमें केवल मिट्टी ही नहीं, बल्कि वाहनों के टायर घिसने से निकले कण, ब्रेक लाइनिंग की धातु धूल, निर्माण सामग्री और सड़कों के किनारे जमा महीन कचरा भी शामिल होता है। इंदौर के कई हिस्सों में टूटी सड़कें, कच्चे किनारे, अवैध पार्किंग और निर्माण सामग्री खुले में पड़ी रहने से धूल लगातार हवा में उड़ रही है। तेज गति से दौड़ते वाहन इन महीन कणों को दोबारा हवा में पहुंचा देते हैं।

बच्चों और बुजुर्गों पर ज्यादा असर

डाक्टरों के अनुसार पीएम 2.5 के कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि वे सीधे फेफड़ों के भीतर जाकर रक्त में मिल सकते हैं। इससे अस्थमा, एलर्जी, सीओपीडी, फेफड़ों की सूजन और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। शहर के बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार खराब हवा बच्चों के फेफड़ों के विकास को प्रभावित कर सकती है। वहीं बुजुर्गों में सांस फूलना, खांसी और आंखों में जलन की शिकायतें बढ़ रही हैं।

पानी का छिड़काव नहीं, वैज्ञानिक व्यवस्था जरूरी

विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल पानी का छिड़काव या एंटी स्माग गन चलाना स्थायी समाधान नहीं है। कई बार बिना वैक्यूम तकनीक के चलने वाली स्वीपिंग मशीनें धूल को दबाने की बजाय और अधिक हवा में फैला देती हैं। शहर में वैज्ञानिक सफाई प्रणाली, सड़कों के किनारों का पक्का निर्माण, ग्रीन बैरियर, ड्रिप सिंचाई और धूल नियंत्रण के स्थायी उपायों की जरूरत महसूस की जा रही है।

क्यों बढ़ रही समस्या

  • सड़कों पर जमा महीन धूल
  • निर्माण सामग्री का खुला परिवहन
  • टूटी सड़कें और कच्चे किनारे
  • ट्रैफिक दबाव और अवैध पार्किंग
  • सड़कों पर जमा महीन धूल
  • निर्माण सामग्री का खुला परिवहन
  • टूटी सड़कें और कच्चे किनारे
  • ट्रैफिक दबाव और अवैध पार्किंग

प्रदूषण बोर्ड लगातार कर रहा कार्रवाई

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड औद्योगिक क्षेत्रों में निगरानी कर रहा है। केंद्र सरकार द्वारा अलग-अलग विभागों को एडवाइजरी जारी की जाती है। बोर्ड के लिए जो एडवाइजरी जारी होती है, उसका पालन करते है। प्रदूषण फैलाने वालों को समझाइश दी जाती है, नहीं मानने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाती है। – सतीश चौकसे, रीजनल आफिसर, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

नगर निगम लगातार कर रहा कार्रवाई

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