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सफेद संगमरमर, 250 किलो वजन और 140 साल का इंतजार… लंदन से मां वाग्देवी के घर वापसी की मांग तेज, बनेगा ‘सरस्वती लोक’

सफेद संगमरमर, 250 किलो वजन और 140 साल का इंतजार… लंदन से मां वाग्देवी के घर वापसी की मांग तेज, बनेगा ‘सरस्वती लोक’

धीरज बेलवाल, नईदुनिया प्रतिनिधि। धार की ऐतिहासिक माटी, जिसने कभी राजा भोज की ज्ञान-साधना को फलीभूत होते देखा था, आज एक बार फिर इतिहास के एक नए सुनहरे पृष्ठ को लिखने की साक्षी बन रही है। परमार वंश के प्रतापी राजा भोज द्वारा लगभग एक हजार वर्ष पूर्व स्थापित ‘ज्ञान के वैश्विक केंद्र’ धार भोजशाला को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के एक युगांतकारी निर्णय के बाद पूरे देश में सांस्कृतिक और राष्ट्रीय गौरव का एक नया ज्वार उठा है।

इस ऐतिहासिक न्याय की पृष्ठभूमि में, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने धार की इस देवभूमि पर कदम रखकर एक ऐसी घोषणा की है, जिसने न केवल धार बल्कि पूरे भारत की आध्यात्मिक चेतना को उद्वेलित कर दिया है। मुख्यमंत्री ने भोजशाला परिसर में सविधि पूजा-अर्चना करने के बाद एलान किया है कि उज्जैन के ‘श्री महाकाल लोक’ की भव्य तर्ज पर धार में भी एक अलौकिक ‘मां सरस्वती लोक’ का निर्माण किया जाएगा। इसके साथ ही, राजा भोज के बौद्धिक और वैज्ञानिक विजन को पुनर्जीवित करने के लिए ‘राजा भोज रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की स्थापना की जाएगी।

यह आलेख केवल एक घोषणा का विवरण नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक क्षति, ऐतिहासिक संघर्ष, विधिक विजय और वैश्विक संग्रहालयों की बंद कोठरियों में कैद हमारी ‘वाग्देवी’ की घर वापसी की उस तड़प का संपूर्ण दस्तावेज है, जिसे आज हर भारतवासी महसूस कर रहा है।

कोर्ट की देहरी से न्याय का शंखनाद

यह संपूर्ण कूट राजनीतिक और सांस्कृतिक विजन उस ऐतिहासिक न्यायिक फैसले की कोख से जन्मा है, जिसे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 15 मई 2026 को सुनाया था। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में वैज्ञानिक साक्ष्यों, पुरातात्विक सर्वेक्षणों और ऐतिहासिक सत्यों को आधार बनाते हुए भोजशाला परिसर को स्पष्ट रूप से ‘मां सरस्वती को समर्पित हिंदू मंदिर’ घोषित कर दिया।

इस विधिक निर्णय के साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वह दशकों पुरानी खंडित व्यवस्था प्रभावी रूप से समाप्त हो गई, जिसके अंतर्गत:

  • मंगलवार को हिंदू पक्ष को केवल पूजा-अर्चना की अनुमति थी।
  • शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।

न्यायालय ने माना कि पूजा और प्रार्थना के नाम पर किसी मंदिर की मौलिक पहचान को विभाजित नहीं किया जा सकता। यद्यपि इस फैसले से असंतुष्ट मुस्लिम पक्ष अब देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का रुख कर चुका है, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह हाईकोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन करने और इसकी ऐतिहासिक व बौद्धिक संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

कौन हैं वाग्देवी माता?

जब हम भोजशाला की बात करते हैं, तो हमारे मानस पटल पर सबसे पहला बिंब ‘वाग्देवी’ का उभरता है। वाग्देवी का शाब्दिक अर्थ ही है ‘वाणी और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी’।

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(AI से जेनरेट की गई इमेज)

‘वाग्देवी’ शब्द संस्कृत के दो कूट शब्दों से मिलकर बना है:

  • ‘वाक्’ — जिसका अर्थ है वाणी, शब्द या अभिव्यक्ति।
  • ‘देवी’ — जो दिव्य, पवित्र और असीम शक्ति का प्रतीक है।

हिंदू दर्शन में मां सरस्वती को केवल पुस्तकों तक सीमित ज्ञान की देवी नहीं माना गया है; वे मनुष्य के भीतर की रचनात्मक ऊर्जा, वैज्ञानिक सोच, संगीत, कला, वाक्-चातुर्य और विवेक का स्रोत हैं। ऋषि-मुनियों से लेकर आधुनिक काल के शिक्षार्थी, शिक्षक, कलाकार और लेखक इसी दिव्य चेतना की आराधना करते हैं ताकि उनके जीवन में सत्य, शिव और सुंदरम का समन्वय हो सके। ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः’ के महामंत्र से गुंजायमान होने वाली यह भूमि सदियों से मानवता को अज्ञान के तिमिर से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का संदेश देती रही है।

राजा भोज और ‘सरस्वती सदन’ की स्थापना

11वीं शताब्दी में मालवा की पावन धरा पर परमार वंश के राजा भोज का शासन था। राजा भोज केवल एक वीर योद्धा नहीं थे, बल्कि वे स्वयं खगोलशास्त्र, व्याकरण, वास्तुकला, चिकित्सा और दर्शन के उद्भट विद्वान थे। उन्होंने धार को अपनी राजधानी बनाया और ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए एक अनूठे विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी, जिसे ‘सरस्वती सदन’ या ‘भोजशाला’ कहा गया।

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(AI से जेनरेट की गई इमेज)

यह प्राचीन भारत का एक ऐसा कूट और जीवंत ज्ञान केंद्र था, जहां देश-विदेश के हजारों छात्र और मनीषी व्याकरण, वेदों और दर्शनशास्त्र की शिक्षा लेने आते थे। इसी विश्वविद्यालय के मध्य में राजा भोज ने ज्ञान की आराध्या मां वाग्देवी की एक ऐसी अनुपम प्रतिमा स्थापित करवाई थी, जो स्थापत्य और कला का सर्वोत्तम शिखर थी।

कैसी है मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा?

इतिहासकारों और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, राजा भोज द्वारा स्थापित मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा भारतीय मूर्तिकला का एक विलक्षण और जीवंत उदाहरण है:

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(AI से जेनरेट की गई इमेज)

  • सामग्री व आकार: यह प्रतिमा उत्कृष्ट कोटि के सफेद संगमरमर (White Marble) से निर्मित है। इसकी ऊंचाई लगभग 4 फीट और वजन करीब 250 किलोग्राम है।
  • सौंदर्य व भाव: मूर्ति में देवी का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और ध्यानमग्न मुद्रा में है। वे कमल के आसन पर विराजमान हैं, जो पवित्रता और अनासक्ति का प्रतीक है।
  • नक्काशी व अभिलेख: देवी के आभूषणों, मुकुट और वस्त्रों पर की गई बारीक नक्काशी तत्कालीन उत्कृष्ट शिल्प कला को दर्शाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रतिमा के पादपीठ (Base) पर संस्कृत भाषा में विस्तृत शिलालेख अंकित हैं, जो इसके ऐतिहासिक और परमारकालीन होने का अकाट्य विधिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

आक्रांताओं का क्रूर आघात

भोजशाला की यह दिव्य ज्ञान-साधना और शांति अधिक समय तक विदेशी आक्रांताओं की आंखों में न समा सकी। साल 1305 में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा और धार पर क्रूर हमला किया। इस बर्बर आक्रमण के दौरान ज्ञान के इस पावन मंदिर, विशाल पुस्तकालय और प्राचीन भित्तिचित्रों को भारी नुकसान पहुंचाया गया।

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(AI से जेनरेट की गई इमेज)

बाद में, 15वीं शताब्दी के दौरान ऐतिहासिक अवशेषों को ढंकते हुए मंदिर परिसर के भीतर ही एक मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। इस कूट निर्माण में मंदिर के ही नक्काशीदार खंभों, बीम और शिलालेखों वाले पत्थरों का उपयोग किया गया, जो आज भी वहां चीख-चीख कर अपने इतिहास की गवाही देते हैं। इसी विध्वंस और अराजकता के दौर में, मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा को या तो आक्रांताओं के डर से कहीं छिपा दिया गया या वह मलबे के नीचे दब गई।

कैसे विदेश पहुंच गईं हमारी देवी?

समय का चक्र बदला और भारत पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन स्थापित हुआ। वर्ष 1875 में ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में धार भोजशाला परिसर के मलबे और आसपास के क्षेत्रों की पुरातात्विक खुदाई की गई। इस खुदाई में सदियों से दबी मां वाग्देवी की वह अति दुर्लभ और ऐतिहासिक प्रतिमा सकुशल बाहर आई।

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(AI से जेनरेट की गई इमेज)

परंतु, इस अमूल्य धरोहर को भारत में सहेजने के बजाय, तत्कालीन ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट मेजर किनकेड (Major Kincaid) की नजर इस पर पड़ी। वर्ष 1880 में वे इस अनमोल विधिक व सांस्कृतिक निधि को कूट चालाकी से अपने साथ इंग्लैंड ले गए। तब से लेकर आज तक, पिछले 140 से अधिक वर्षों से मां वाग्देवी की यह मूल प्रतिमा लंदन के ‘ब्रिटिश म्यूजियम’ (British Museum) के एक कोने में बंद है, जो औपनिवेशिक लूट का एक मूक प्रतीक बनी हुई है।

डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर और पहचान की वह रोमांचक गाथा

लंदन में रखी इस बेनाम प्रतिमा की पहचान की कहानी भी बेहद रोमांचक है। साल 1961 में भारत के महान पुरातत्वविद और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर (जिन्होंने भीमबेटका की खोज भी की थी) लंदन प्रवास पर थे। जब वे ब्रिटिश म्यूजियम पहुंचे, तो वहां प्रदर्शित भारतीय मूर्तियों के बीच उनकी पैनी नजर इस श्वेत संगमरमर की प्रतिमा पर पड़ी।

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(AI से जेनरेट की गई इमेज)

उन्होंने मूर्ति के निचले हिस्से पर लिखे संस्कृत के शिलालेखों का गहन और वैज्ञानिक अध्ययन किया। उन्होंने प्रामाणिक रूप से यह सिद्ध किया कि यह कोई साधारण प्रतिमा नहीं, बल्कि राजा भोज द्वारा धार की भोजशाला में स्थापित की गई ऐतिहासिक ‘वाग्देवी’ की मूल प्रतिमा ही है। डॉ. वाकणकर की इस खोज ने भारत में एक नए सांस्कृतिक आंदोलन की नींव रखी। वर्तमान में धार की भोजशाला में इसी मूल प्रतिमा की एक सुंदर प्रतिकृति (Replica) स्थापित है, जिसकी पूजा की जाती है।

‘घर वापसी’ की तेज होती मांग

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 2026 के हालिया फैसले ने इस मुद्दे को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय और कूटनीतिक पटल पर लाकर खड़ा कर दिया है। कोर्ट द्वारा भोजशाला को पूरी तरह हिंदू धार्मिक स्थल माने जाने के बाद, अब वाग्देवी की प्रतिमा की ‘घर वापसी’ (Repatriation) की मांग जन-आंदोलन का रूप ले चुकी है।

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यह मांग केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय स्वाभिमान से जुड़ी है। कूटनीतिक स्तर पर माना जा रहा है कि भारत सरकार जल्द ही यूनेस्को (UNESCO) के नियमों और द्विपक्षीय सांस्कृतिक संधियों का हवाला देते हुए ब्रिटेन सरकार और ब्रिटिश म्यूजियम के समक्ष इस ऐतिहासिक प्रतिमा को ससम्मान भारत वापस लाने का आधिकारिक दावा पेश करेगी।

कैसा होगा मां सरस्वती लोक?

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा घोषित ‘मां सरस्वती लोक’ केवल कंक्रीट और पत्थरों का ढांचा नहीं होगा, बल्कि यह भारत के प्राचीन ज्ञान, विज्ञान, वैदिक गणित, खगोलशास्त्र और भाषाई कलाओं को प्रदर्शित करने वाला एक आधुनिक और वैश्विक केंद्र होगा। इस भव्य लोक की परिकल्पना में निम्नलिखित कूट आयाम शामिल होने की संभावना है:

विकासात्मक आयाम (Development Dimensions)

मुख्य योजना और विशेषताएं (Planned Features 2026)

अपेक्षित कूट व सांस्कृतिक प्रभाव (Expected Impact)

मां सरस्वती लोक कॉरिडोर

उज्जैन के महाकाल लोक की भव्य तर्ज पर पूरे परिसर का सुव्यवस्थित और कलात्मक सौंदर्यीकरण।

पर्यटकों और श्रद्धालुओं को त्रेता और द्वापर युग के ज्ञान वैभव का सजीव अनुभव होगा।

राजा भोज रिसर्च इंस्टीट्यूट

संस्कृत भाषा, वैदिक विज्ञान, प्राचीन वास्तुकला और राजा भोज के ग्रंथों पर शोध हेतु उच्च स्तरीय अनुसंधान केंद्र।

भारत की प्राचीन वैज्ञानिक पद्धतियों को आधुनिक शोध से जोड़कर विश्व पटल पर स्थापित करना।

अत्याधुनिक डिजिटल गैलरी

परमार साम्राज्य, धार के इतिहास और ब्रिटिश म्यूजियम से वाग्देवी की वापसी के संघर्ष की गाथा को दर्शाती लाइट एंड साउंड प्रदर्शनी।

नई पीढ़ी अपनी गौरवशाली जड़ों और ऐतिहासिक संघर्षों को तकनीक के माध्यम से आसानी से समझ सकेगी।

विस्थापितों का पुनर्वास

सौंदर्यीकरण के दायरे में आने वाले वास्तविक स्थानीय निवासियों और विस्थापितों का पारदर्शी पुनर्वास।

स्थानीय पर्यटन के विकास के साथ-साथ नागरिकों के आर्थिक और सामाजिक स्तर में कूट सुधार होगा।

लगभग एक हजार साल के लंबे इंतजार, आक्रांताओं के आघातों को सहने और कूट विधिक संघर्षों के बाद, धार की भोजशाला अब अपनी मुक्ति और वैभव के चरम सोपान पर है। मध्य प्रदेश सरकार की इस ऐतिहासिक घोषणा और न्यायालय के न्यायपूर्ण आदेश ने यह सिद्ध कर दिया है कि समय कितना भी क्रूर क्यों न हो, सत्य और संस्कृति की अंतर्धारा को कभी सुखाया नहीं जा सकता। ‘मां सरस्वती लोक’ का निर्माण और लंदन से वाग्देवी की घर वापसी का यह महा-संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए गौरव, स्वाभिमान और बौद्धिक चेतना का एक नया आलोक स्तंभ साबित होगा।

यह भी पढ़ें- भोजशाला मंदिर में किस देवी की होती है पूजा? जानिए कौन हैं मां वाग्देवी, नाम का अर्थ और धार्मिक महत्व



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