इंदौर में कभी साइकिल चलाने के लिए भी लाइसेंस लेना पड़ता था। नगर निगम ट्रायल टेस्ट के बाद लाइसेंस जारी करता था और पीतल की नंबर प्लेट लगाना अनिवार्य था। …और पढ़ें
HighLights
- साइकिल के लाइसेंस पर भी यह निर्देश लिखा जाता था कि नंबर प्लेट लगाना जरूर है
- पीतल की नंबर प्लेट गुम होने पर चार आने देकर बनती थी नई नंबर प्लेट
- होमी दास ने मजदूरों के साथ किया रेल रोको आंदोलन, बाद में खत्म हुई लाइसेंस की बाध्यता
डिजिटल डेस्क, इंदौर। इंदौर शहर जितना अपनी स्वच्छता को लेकर मशहूर है, वहीं अपने अलग इतिहास को लेकर भी यह जाना जाता है। आज जहां शहर की सड़कों पर गाड़ियां फर्राटे भरते हुई दिखाई देती हैं, कभी यहां साइकिल चलाने के लिए भी लाइसेंस लेना होता था।
इतना ही नहीं जैसे आजकल ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए ट्रायल टेस्ट देना होता है, वैसे ही पहले साइकिल चलाकर दिखाना पड़ती थी। इसी के बाद लाइसेंस बनता था। इंदौर में इतिहासकार जफर अंसारी के संग्रहालय में 1929 में साइकिल चलाने के लिए बना लाइसेंस है, जिसे नगर निगम द्वारा जारी किया गया था।
पीतल की नंबर प्लेट भी साइकिल पर लगी थी
आजकल वाहनों पर लगने वाली नंबर प्लेट की तरह उस दौर में साइकिल पर नंबर प्लेट लगती थी, जो पीतल की होती थी। इसे लगाना भी अनिवार्य होता था, अगर यह गुम हो जाए तो नगर निगम से नई नंबर प्लेट बनवानी होती थी। इसके लिए चार आने देने होते थे। साइकिल के लाइसेंस पर भी यह निर्देश लिखा जाता था कि नंबर प्लेट लगाना जरूरी है।
इंदौर के इतिहासकार जफर अंसारी के संग्रहालय में इंदौर नगर निगम द्वारा जारी साइकिल चलाने का लाइसेंस है, इसे एक साल 1929 और 1930 के लिए जारी किया गया था। उस समय इसे बनवाना भी बड़ा मुश्किल था। उस दौरान इंदौर में श्रमिकों के नेता होमी दास ने इसे लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म कराने के लिए मजदूरों को साथ लेकर आंदोलन किया था।
इंदौर शहर में उस समय 6 कपड़ा मिलें थी, इसमें 30 हजार से ज्यादा श्रमिक काम करते थे, इसमें से ज्यादातर श्रमिक साइकिल से ही आते-जाते थे। ऐसे में मेहनत कर उन्हें जो कमाई होती थी, उसमें से लाइसेंस बनवाने के लिए भी खर्च करना पड़ता था। लाइसेंस बंद करवाने के लिए रेल रोको आंदोलन किया गया था, इसके बाद साइकिल लाइसेंस को बंद किया गया।
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