नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को यह एहसास करवाया कि डॉक्टर केवल इलाज करने वाले पेशेवर नहीं, बल्कि कठिन समय में समाज की सबसे मजबूत उम्मीद भी होते हैं। इंदौर में भी महामारी के दौरान हजारों मरीज अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे थे। इन्हीं हालातों के बीच कुछ ऐसे परिवार भी सामने आए, जो बीमारी से ज्यादा इलाज के खर्च से परेशान थे।
मरीजों की यह बेबसी ने डॉक्टरों को भीतर तक झकझोर गई। इसके बाद इंदौर के सात डॉक्टरों ने मरीजों की आर्थिक मदद करने का फैसला लिया। सात डॉक्टरों ने मिलकर सेवा का जो छोटा-सा अभियान शुरू किया था, उससे अब बड़ी संख्या में लोगों को मदद मिल रही है।
डॉक्टरों ने स्कोपर्स सोसायटी फार सोशल वेलफेयर की स्थापना की। छह वर्षों में यह संस्था न केवल इंदौर बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी जरूरतमंद मरीजों की मदद कर रहे हैं। इस सेवा कार्य से देशभर के 100 से अधिक डाक्टर और विभिन्न क्षेत्रों के लोग जुड़ चुके हैं। संस्था अब तक एक हजार से अधिक जरूरतमंद मरीजों और परिवारों तक स्वास्थ्य सहायता पहुंचा चुकी है।
इन डॉक्टरों ने मिलकर बनाई संस्था
डा. जेनिशा जैन, डा. मयंक जैन. डा. मुकेश वर्मा, डा. मीनाक्षी शर्मा, डा. कामना जैन, डा. सिवानी, डा. अरूण।
पेंटिंग्स बनाकर बेची, इससे आने वाली राशि से की मदद
संस्था की अध्यक्ष एवं नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. जेनिशा जैन अपनी बनाई पेंटिंग्स बेचती हैं और उससे मिलने वाली पूरी राशि जरूरतमंद मरीजों के इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती हैं। उन्होंने बताया कि संस्था का कार्य केवल आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है। डॉक्टरों की टीम नियमित रूप से शहर की बस्तियों में स्वास्थ्य शिविर आयोजित करती है। इन शिविरों में मरीजों की जांच, उपचार, स्वास्थ्य संबंधी परामर्श और जरूरी दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं। जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है, उनके इलाज की व्यवस्था भी संस्था अपने स्तर पर करती है।
इन मरीजों को हम कभी भुल नहीं सकते
डॉ. जेनिशा बताती हैं कि कुछ मरीज ऐसे होते हैं, जिन्हें डॉक्टर कभी भूल नहीं पाते। एक बस्ती क्षेत्र के सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित बच्चे का मामला संस्था के लिए यादगार बन गया। आर्थिक अभाव के कारण परिवार बच्चे की नियमित थेरेपी नहीं करा पा रहा था। संस्था ने थेरेपी और इलाज की व्यवस्था करवाई। आज बच्चा चलने भी लगा है, साथ ही पढ़ाई-लिखाई भी कर रहा है। इसके अलावा
एक महिला ने मात्र 800 ग्राम वजन के नवजात को जन्म दिया। इससे पहले उसके पांच गर्भपात हो चुके थे और परिवार पूरी तरह निराश था। डॉक्टरों की टीम ने विशेष देखभाल, समय पर इलाज और लगातार निगरानी के जरिए नवजात को सुरक्षित रखा। आज बच्चा स्वस्थ है और परिवार के चेहरे पर मुस्कान लौट आई है।
महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर कर रहे जागरूक
संस्था महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर भी काम कर रही है। बस्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाकर महिलाओं को मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में जानकारी दी जाती है। जरूरतमंद महिलाओं और किशोरियों को निश्शुल्क सैनिटरी पैड भी वितरित किए जाते हैं, ताकि आर्थिक कारणों से उनका स्वास्थ्य प्रभावित न हो।
34 वर्षों से दिव्यांगों को दे रहे नए कदम
डाक्टर केवल जीवन ही नहीं बचाते, कई बार वे लोगों को आत्मनिर्भर बनने का भरोसा भी लौटाते हैं। इंदौर के आर्थोपेडिक सर्जन डा. प्रमोद नीमा पिछले 34 वर्षों से ऐसे ही सेवा कार्य में जुटे हैं। वर्ष 1991 से वे दिव्यांग बच्चों और जरूरतमंद मरीजों की निःशुल्क करेक्टिव सर्जरी कर रहे हैं। अब तक 28 हजार से अधिक मरीजों का उपचार कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर दे चुके हैं। जिन परिवारों ने कभी अपने बच्चों के चलने-फिरने की उम्मीद छोड़ दी थी, आज उन्हीं के चेहरों पर मुस्कान है।
डा. नीमा के पास इंदौर ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और प्रदेशों से भी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। उन्होंने अपने निजी अस्पताल में 30 बिस्तरों का विशेष दिव्यांग वार्ड बनाया है। यहां दिव्यांग मरीजों को सर्जरी, भर्ती, उपचार और देखभाल की सुविधा पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती है।
आपने मुझे ‘मंकी’ से मनुष्य बना दिया
डा. नीमा बताते हैं कि डाक्टर के जीवन में कुछ मरीज हमेशा याद रह जाते हैं। ऐसा ही एक बच्चा वर्ष 2024 में उनके जीवन में आया। लता मंगेशकर आडिटोरियम में आयोजित दिव्यांग बच्चों के एक कार्यक्रम में उन्होंने देखा कि एक छोटा बच्चा हाथों और घुटनों के सहारे रेंगकर चल रहा था। बच्चे की स्थिति देखकर उन्होंने उसके अभिभावकों से बात की और सर्जरी की सलाह दी। इसके बाद बच्चे की सात से आठ चरणों में सर्जरी की गई। लंबे उपचार और पुनर्वास के बाद जब वह पहली बार अपने पैरों पर चलकर उनके सामने आया तो मुस्कुराते हुए बोला, “सर, आपने मुझे मंकी से मनुष्य बना दिया।” डा. नीमा कहते हैं कि यह वाक्य उनके लिए किसी भी पुरस्कार से बड़ा सम्मान है।
500 से अधिक निःशुल्क घुटना प्रत्यारोपण
दिव्यांगों की सेवा के साथ-साथ डा. नीमा बुजुर्गों और जरूरतमंद मरीजों के लिए भी लगातार कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2018 से अब तक वे 500 से अधिक निःशुल्क घुटना प्रत्यारोपण कर चुके हैं। इस सेवा कार्य में कई सामाजिक संस्थाएं भी सहयोग कर रही हैं। वर्तमान में हर वर्ष 100 से अधिक घुटना प्रत्यारोपण किए जा रहे हैं। डा. नीमा को उनके सेवा कार्यों के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार मिल चुके हैं। उनका कहना है कि किसी मरीज को अपने पैरों पर चलता हुआ देखना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है।
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