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राजस्थान में बस हादसा: बंद इमरजेंसी गेट बना कॉल, पोटली में समेटकर लाना पड़े बेटी के अवशेष

राजस्थान में बस हादसा: बंद इमरजेंसी गेट बना कॉल, पोटली में समेटकर लाना पड़े बेटी के अवशेष

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर हुआ भीषण बस हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि लापरवाही की जीती-जागती मिसाल बन गया है। चश्मदीदों का आरोप है कि सफर के दौरान बस का चालक और उसका सहायक (हेल्पर) शराब के नशे में धुत थे। टक्कर लगते ही आग ने इतनी तेजी से विकराल रूप लिया कि यात्रियों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।

चीख-पुकार के बीच नहीं खुला आपातकालीन द्वार

हादसे के वक्त बस के भीतर कोहराम मच गया। धुएं और लपटों से घिरे यात्री अपनी जान बचाने के लिए आपातकालीन द्वार (इमरजेंसी गेट) की तरफ भागे, लेकिन वह पूरी तरह जाम था और नहीं खुला। इस तकनीकी विफलता के कारण कई बेकसूर यात्री भीतर ही फंस गए और जिंदा जल गए।

इन्हीं अभागों में बजरंग नगर की रहने वाली इंजीनियरिंग की छात्रा भूमि भी शामिल थी। आग इतनी भयानक थी कि उसका शव पूरी तरह खाक हो गया, जिसकी शिनाख्त बाद में डीएनए टेस्ट के जरिए ही मुमकिन हो सकी। बदहवास परिजनों को अपनी लाडली के अवशेषों को एक पोटली में समेटकर घर वापस लाना पड़ा।

डीएनए टेस्ट करवा कर पोटली में लाए बेटी का शव, एसपी ने दिए जांच के आदेश

बजंरग नगर निवासी भूमि भोर एलएनटी कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी। उसका शव बुरी तरह जल गया था। बुधवार दोपहर भूमि के पिता भारत रिश्तेदारों के साथ दौसा पहुंचे और डीएनए टेस्ट करवा कर पहचान की। भूमि सहेली लिसा और दिशा के साथ मसूरी गई थी। उसका शव पोटली में लेकर आना पड़ा। सहेलियों ने स्वजन को बताया कि बस तेज रफ्तार में चल रही थी। कुछ लोगों ने बताया चालक को झपकी लगी थी। आगे चल रहे ट्राला में बस का अगला हिस्सा चढ़ गया था। कई यात्रियों को तो स्वजन तलाशते रहे। उधर दौसा एसपी पीयूष दीक्षित ने पूरी घटना की जांच के आदेश दिए हैं।

अपनों को खोने का कभी न भरने वाला जख्म

इस हादसे ने कई हंसते-खेलते परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया है।

मेरी आंखों के सामने वो जलती रही…” हादसे में अपनी पत्नी को खोने वाले पत्रकार चंद्रप्रकाश गुप्ता ने रुंधे गले से उस खौफनाक मंजर को याद किया। उन्होंने बताया कि टक्कर के बाद पूरी बस धुएं के गुबार से भर गई थी। वह किसी तरह खुद को बाहर निकालने में तो कामयाब रहे, लेकिन उनकी पत्नी निर्मला भीतर ही फंसी रह गईं और देखते ही देखते लपटों की भेंट चढ़ गईं। वहीं, तीर्थयात्रा (वैष्णो देवी और हरिद्वार) से लौट रहे तंवर और पांडे परिवार के लिए भी यह सफर कॉल साबित हुआ। इस हादसे ने उनसे उनके चिराग दीपक तंवर और प्रियंका पांडे को हमेशा के लिए छीन लिया।

‘चलता-फिरता बारूद’ बनीं एसी बसें: आखिर जिम्मेदार कौन?

इस दर्दनाक हादसे ने आलीशान और आरामदायक मानी जाने वाली एसी (AC) बसों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, इन बसों के ‘आग का गोला’ बनने के पीछे कई मुख्य कारण हैं:

  • अवैध मॉडिफिकेशन और वायरिंग: बसों में यात्रियों को लुभाने के लिए क्षमता से अधिक लाइट्स, चार्जिंग पॉइंट्स और एलईडी स्क्रीन लगाई जाती हैं। इसके लिए की जाने वाली घटिया वायरिंग अक्सर शॉर्ट सर्किट की वजह बनती है।

  • ज्वलनशील इंटीरियर: बसों के केबिन और सीटों को आरामदायक बनाने के लिए बड़े पैमाने पर फोम, रेजीन और प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है, जो आग पकड़ते ही पेट्रोल की तरह काम करते हैं।

  • सुरक्षा मानकों की अनदेखी: नियमों को ताक पर रखकर बसों के भीतर सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए अक्सर इमरजेंसी गेट के सामने रुकावटें खड़ी कर दी जाती हैं, जिससे ऐन वक्त पर उन्हें खोलना नामुमकिन हो जाता है।

प्रशासनिक दावा: क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (इंदौर) प्रदीप शर्मा का कहना है कि विभाग द्वारा बसों की नियमित रूप से फिटनेस जांच की जाती है, जिसमें इमरजेंसी गेट और अग्निशमन यंत्रों को परखा जाता है। नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों पर सख्त कार्रवाई की बात भी कही गई है। लेकिन धरातल पर ऐसे हादसों का न रुकना इन दावों की पोल खोलता नजर आता है।

बस के सभी कागजात पूरे थे

हादसा होने के कारण यह घंटना घटित हुई। बस के सभी कागजात पूरे थे। हादसा होने के बाद गाड़ी पलट गई थी और लोग कांच तोडकर और एमरजेंसी गेट से बाहर निकले। बस में दो चालक और एक परिचालक था। ड्रायवर के शराब पीने की जानकारी गलत है। – अरूण गुप्ता, संचालक हंस ट्रेवल्स

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