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चंबल से बालाघाट तक फैला कछुआ तस्करी का नेटवर्क, 500 रुपये में खरीदकर 10 हजार में बेचते हैं

चंबल से बालाघाट तक फैला कछुआ तस्करी का नेटवर्क, 500 रुपये में खरीदकर 10 हजार में बेचते हैं

स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स (एसटीएसएफ) की जांच में मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में सक्रिय सदस्यों की भूमिका सामने आई है।

Publish Date: Tue, 01 Sep 2026 10:16:46 AM (IST)Updated Date: Tue, 01 Sep 2026 10:20:39 AM (IST)

आरोपी से बरामद किए कछुए।

कपिल नीले, नईदुनिया, इंदौर। चंबल नदी और बालाघाट की वेनगंगा नदी से तस्कर 500 से 900 रुपये में कछुआ खरीदते थे और उसे मप्र के इंदौर सहित बड़े शहरों, राजस्थान, महाराष्ट्र व उत्तर प्रदेश में तीन हजार से 10 हजार रुपये तक में बेचते थे। यह खुलासा वन विभाग की स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स (एसटीएसएफ) की जांच में हुआ है।

पिछले दिनों पकड़े गए कछुआ तस्करों ने पूछताछ में बताया कि गिरोह के सदस्य कछुओं को कुछ दिन अपने पास रखकर पालते थे। इसके बाद खरीदारों की तलाश शुरू करते थे। एसटीएसएफ अब मप्र सहित अन्य राज्यों में तस्करों के नेटवर्क को खंगाल रही है। इसके साथ ही कछुओं को पकड़ने वाले लोगों से लेकर उन्हें ग्राहकों तक पहुंचाने वाले सदस्यों की भूमिका भी जांची जा रही है।

चंबल क्षेत्र में बना तस्करों का अलग नेटवर्क

कछुआ तस्करी के मामले में शिवाजी मार्केट स्थित फ्रेश टाउन के कर्मचारी बिलाल की रिमांड 27 अगस्त को खत्म हो चुकी है। पूछताछ के बाद उसे जेल भेज दिया गया। बिलाल से पूछताछ में एसटीएसएफ को चंबल क्षेत्र में सक्रिय एक ऐसे सदस्य के बारे में जानकारी मिली है जिसने अपना अलग नेटवर्क बना रखा था।

इस तरह होती थी कछुए की तस्करी

पहला चरण – 500 से 900 रुपये में खरीद

गिरोह का सदस्य चुनिंदा लोगों के संपर्क में रहकर चंबल और बालाघाट से कछुए खरीदता था। स्थानीय स्तर पर कछुओं का सौदा करीब 500 से 900 रुपये में किया जाता था। कछुओं को पकड़ने वाले लोग उन्हें कुछ दिनों तक अपने पास रखते थे। इसके बाद नेटवर्क से जुड़े सदस्य उन्हें अपने कब्जे में लेकर आगे की डील शुरू करते थे।

दूसरा चरण – पहले ग्राहक, फिर कीमत तय

तस्करी का अगला चरण ग्राहकों की तलाश का था। नेटवर्क से जुड़े लोग पहले यह पता करते थे कि ग्राहक को किस तरह का कछुआ चाहिए। इसके बाद सौदा तय किया जाता था। जांच में यह भी सामने आया है कि अंधविश्वास के कारण कछुओं की मांग करने वाले ग्राहकों से कई गुना अधिक कीमत वसूली जाती थी। जो कछुआ स्थानीय स्तर पर 500 से 900 रुपये में खरीदा जाता था, उसे आगे करीब तीन हजार से 10 हजार रुपये तक में बेचा जाता था।

तीसरा चरण – मुंबई से पार्सल

एसटीएसएफ की जांच में मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में सक्रिय सदस्यों की भूमिका सामने आई है। कछुआ तस्करी में सिर्फ पकड़ने और बेचने वाला व्यक्ति ही शामिल नहीं था, बल्कि अलग-अलग स्थानों पर भेजने के लिए भी नेटवर्क बना है।

खास बात यह है कि मुंबई से विभिन्न राज्यों तक कछुओं की सप्लाई की जाती थी। इसके लिए सड़क मार्ग का इस्तेमाल होता था। बाक्स में रखकर कछुओं को कोरियर और बस सेवा के माध्यम से पार्सल बुक किया जाता था। फिर इनकी सप्लाई की जाती थी।

ऐसा चला घटनाक्रम

  • 20 अगस्त को कछुआ तस्करी को लेकर एसटीएसएफ ने केशव शर्मा और रोहन गौड़ को गिरफ्तार किया।
  • दोनों के पास से 30 कछुए मिले थे। इन्हें 40 हजार रुपये में बेचने वाले थे।
  • पांच दिन की रिमांड पर केशव और रोहन से देवास निवासी होटल व्यवसायी रौनक जुनेजा के बारे में पता चला।
  • अभी रौनक फरार है और उसकी अग्रिम जमानत भी खारिज हो चुकी है।
  • रौनक के बहनोई कमल मेहता के घर से एक कछुआ और तोता बरामद किया गया है। खुद को सरकारी गवाह बताकर कमल भी फरार है।

खंगाल रहे नेटवर्क

कछुआ तस्करी में अब तक तीन आरोपित बनाए गए हैं। पूछताछ में गिरोह के बाकी सक्रिय सदस्य व नेटवर्क के बारे में जानकारी मिली है। उसी को लेकर जांच चल रही है। – शरद जाटव, प्रवक्ता, एसटीएसएफ

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