विनय यादव, नईदुनिया, इंदौर। सरकार ने एनसीईआरटी किताबों के जरिए पढ़ाई का खर्च कम करने की मंशा जताई है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। निजी स्कूलों ने एनसीईआरटी पाठ्यक्रम लागू होने के बावजूद अपनी एडिशनल किताबों का अलग सिस्टम बना लिया है। इन किताबों को अनिवार्य बताया जाता है और पालकों को मजबूरन इन्हें खरीदना पड़ता है।
इंदौर में हर वर्ष महंगी किताबों के चलते पालकों को आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। निजी स्कूलों में फरवरी से ही नए सत्र की किताबें बुलवाने का दबाव बनाया जाता है, लेकिन हमारे जिले का प्रशासन और शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारी अप्रैल में औपचारिकता दिखाते हुए नजर आते हैं। अप्रैल में हेल्पलाइन नंबर जारी करते हैं और दिखावे की कार्रवाई करते हैं।
जबकि करीब 30 प्रतिशत पालक पहले ही किताबें खरीद चुके होते हैं। सबसे अधिक समस्या आठवीं के नीचे की कक्षाओं में देखने को मिल रही है। हाल ही में इंदौर में दो स्कूल और दो दुकानों पर एफआईआर दर्ज हुई है। स्कूल प्रबंधन द्वारा एक ही दुकानों से किताबें खरीदने के लिए बाध्य किया जा रहा था। यहां मनमानी दर पर किताबें दी जा रही थीं।
महंगे दामों में किताबों की 30 से अधिक शिकायतें
जिला प्रशासन द्वारा जारी हेल्पलाइन नंबर पर अब तक 30 से अधिक शिकायतें आ चुकी हैं। इनमें स्कूलों द्वारा एक ही दुकान से किताबें खरीदने के लिए कहना, स्टेशनरी संचालकों द्वारा महंगे दामों में किताबें बेचना, एक ही दुकान से स्कूल की यूनिफार्म खरीदने के लिए बाध्य करना, किताबों के साथ पूरा स्टडी मटेरियल खरीदने के लिए दबाव बनाना आदि शामिल हैं। इनमें से टीम द्वारा जहां गड़बड़ी पाई गई, वहां कार्रवाई की जा रही है।
नौ हजार रुपये में दूसरी कक्षा की किताबें
एक पालक ने बताया कि शिक्षा विभाग द्वारा दावे किए जाते हैं कि कहीं से भी किताब खरीद सकते हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। निजी स्कूलों की किताबें केवल उनके द्वारा तय किए गए वेंडर के पास ही मिलती हैं। मेरे बच्चे ने दूसरी कक्षा में प्रवेश लिया है, उसकी किताबों का बिल नौ हजार रुपये आया है।
कंटेंट वहीं, लेकिन प्रकाशक दूसरा
पालकों ने बताया कि किताबों का कंटेंट लगभग वही होता है, लेकिन प्रकाशक का नाम बदल दिया जाता है। गणित की प्रसिद्ध किताबों के नए संस्करण केवल नए कवर के साथ पेश किए जा रहे हैं। इसके अलावा कुछ प्रकाशकों ने कुछ अध्यायों में बदलाव भी किया है, ताकि पुराने संस्करण का उपयोग न हो सके।
एनसीईआरटी के साथ निजी प्रकाशकों की रेफरेंस बुक अनिवार्य
निजी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों के साथ-साथ निजी प्रकाशकों की रेफरेंस बुक लेना लगभग अनिवार्य कर दिया गया है। ये किताबें एनसीईआरटी की तुलना में पांच से छह गुना तक महंगी होती हैं। जानकारी के अनुसार स्कूलों द्वारा इन्हें कोर्स में शामिल करने के पीछे कमीशन मिलता है।
प्रकाशक और बुक सेलर पहले से ही कमीशन तय कर लेते हैं और उसी के आधार पर किताबों को कोर्स में शामिल किया जाता है। कक्षा एक से आठ तक के पाठ्यक्रम में हिंदी, गणित, विज्ञान के अलावा जीके, मोरल साइंस, कंप्यूटर जैसी कई अतिरिक्त किताबें शामिल कर दी जाती हैं, जिससे कुल खर्च और बढ़ जाता है।
मुनाफा कमाना निजी स्कूलों का उद्देश्य
पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी राजेंद्र कुमार मकवानी ने बताया कि निजी स्कूलों के संचालक और प्राचार्य का उद्देश्य मुनाफा कमाना होता है। यह शासन के निर्देशों का पालन भी नहीं करते हैं। हमारे यहां व्यवस्थाएं भी कम हैं, इसके कारण मनमाने तरीके से किताबें छप रही हैं। एनसीईआरटी की किताबें अच्छी होती हैं, इन्हें योग्य विशेषज्ञों द्वारा लिखा जाता है। ऐसा कुछ नहीं है कि निजी प्रकाशकों की किताबों से ही शिक्षा हासिल की जा सकती है।
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