नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ शहरों में गिने जाने वाले इंदौर में एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। शहर में हवा पहले से साफ दिखने के बावजूद सांस से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। हालिया अध्ययन के अनुसार, इसके पीछे पारंपरिक प्रदूषण नहीं बल्कि परागकण (पोलन) और कबूतरों से जुड़े जैव-एरोसोल्स प्रमुख कारण बन रहे हैं।
टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के पब्लिक पॉलिसी एवं लॉ के विद्यार्थी और चिकित्सक डॉ. अंशुल तिवारी द्वारा किए गए कैपस्टोन अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है। यह अध्ययन संस्था ‘आरोग्यम’ और नगर निगम के सहयोग से किया गया।
सिर्फ धूल-धुआं नहीं, जैव-एरोसोल्स भी खतरा
डॉ. तिवारी के मुताबिक अब तक शहरों में वायु प्रदूषण की चर्चा मुख्य रूप से पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कणों तक सीमित रही है। ये कण धूल, धुएं, वाहन उत्सर्जन, निर्माण कार्य और कचरा जलाने से पैदा होते हैं, लेकिन इसके अलावा हवा में मौजूद जैव-एरोसोल्स जैसे पेड़ों के परागकण, कबूतरों की बीट और पंखों से जुड़े प्रोटीन भी श्वसन रोगों को बढ़ा रहे हैं। यही कारण है कि हवा साफ दिखने के बावजूद लोग एलर्जी, अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियों से जूझ रहे हैं।
अध्ययन में यह आया सामने
- 75.5% लोगों ने माना कि इंदौर में धूल और सामान्य प्रदूषण में कमी आई है।
- 64% लोगों ने पिछले एक वर्ष में किसी न किसी श्वसन समस्या की शिकायत की।
- 67.5% लोगों ने कहा कि हवा साफ लगने के बावजूद स्वास्थ्य में सुधार नहीं हुआ।
- 75% लोगों ने अपने घर या आसपास कबूतरों की बीट देखी।
- 74% लोगों ने बताया कि कबूतर उनके घर, छत या बालकनी पर नियमित बैठते हैं।
- 51% लोगों ने मौसम बदलने पर लक्षण बढ़ने की बात कही।
- 98% लोगों ने इस मुद्दे पर प्रशासनिक हस्तक्षेप और जागरूकता की जरूरत बताई।
ऐसे हुआ अध्ययन
यह अध्ययन केवल राय या अनुमान पर आधारित नहीं है। इसमें 2019 से 2026 तक के वायु गुणवत्ता पैमानों के रुझानों, इंदौर के विभिन्न वार्डों के शहरी निवासियों के सर्वे और शहर के प्रमुख चेस्ट फिजिशियन से चर्चा को साथ रखकर विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में शामिल विशेषज्ञ ने ऐसे मरीज देखने की बात कही, जिनमें कबूतरों, परागकणों या ऐसे पर्यावरणीय कारणों से जुड़ी श्वसन समस्याओं की आशंका या पुष्टि रही। 90 प्रतिशत विशेषज्ञों ने कहा कि केवल वायु गुणवत्ता सूचकांक और पार्टिकुलेट मैटर की निगरानी से पूरे श्वसन रोग-भार को नहीं समझा जा सकता।
सप्तपर्णी वृक्षों के कारण बढ़ रही समस्या
अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया है कि सप्तपर्णी और कोनोकार्पस जैसे वृक्षों को लेकर जो सरकारी स्तर पर चिंताएं सामने आई हैं, यह केवल हरियाली या सौंदर्य का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी हैं।
डॉ. तिवारी ने बताया कि सफाई प्रोटोकाल, जनजागरूकता, मौसम आधारित चेतावनी, कम-एलर्जेन पेड़ों की सूची, और कबूतर-प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छता पर विशेष ध्यान जैसे छोटे कदम भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।
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