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‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर को भूल गए हैं, देश में गर्मी के कारण चल रही है हीट वेव’, पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक भागीदारी पर बोले पर्यावरणविद् प्रो. ज्याणी

‘ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर को भूल गए हैं, देश में गर्मी के कारण चल रही है हीट वेव’, पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक भागीदारी पर बोले पर्यावरणविद् प्रो. ज्याणी

देश में हम हर साल करोड़ों पौधे लगाते हैं, लेकिन यह ध्यान नहीं देते हैं कि उनमें से कितने पौधे पनप कर पेड़ बन पा रहे हैं। हम क्षेत्र की मांग को नजरअंदा …और पढ़ें

Publish Date: Thu, 21 May 2026 10:27:41 AM (IST)Updated Date: Thu, 21 May 2026 10:27:41 AM (IST)

ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर। (एआई जनरेट)

HighLights

  1. जाल सभागृह में पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक भागीदारी विषय पर श्रोताओं को कर रहे थे संबोधित
  2. यह ध्यान नहीं देते हैं कि उनमें से कितने पौधे पनप कर पेड़ बन पा रहे हैं
  3. हम क्षेत्र की मांग को नजरअंदाज करते हुए अपने काम को करते हैं

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर को भूल गए हैं यही कारण है कि आज देश के अलग-अलग हिस्से में गर्मी के कारण हीट वेव चल रही है। हमारे देश में हम हर साल करोड़ों पौधे लगाते हैं, लेकिन यह ध्यान नहीं देते हैं कि उनमें से कितने पौधे पनप कर पेड़ बन पा रहे हैं। हम क्षेत्र की मांग को नजरअंदाज करते हुए अपने काम को करते हैं।

मप्र में घना जंगल होता है यहां पर एक दूसरे के पास में पेड़ लग जाते हैं और पनप जाते हैं, लेकिन राजस्थान के रेगिस्तान वाले इलाके में पेड़ों को एक दूसरे से एक निश्चित दूरी बनाकर लगाना पड़ता है। इसके लिए स्थानीय जरूरत को भी समझने की आवश्यकता है। जैव विविधता पर आने वाले नकारात्मक प्रभाव को रोकना भी हमारी जिम्मेदारी है। हमें हवा मिट्टी और पानी की चिंता करना होगी। जब हम यह चिंता करने लगेंगे तो पर्यावरण का संरक्षण होने लगेगा। यह काम किसी एक व्यक्ति के करने से नहीं होगा बल्कि हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में हमें करना होगा।

ये बातें राजस्थान के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् प्रो. श्यामसुंदर ज्वाणी ने बुधवार को कहीं। वे जाल सभागृह में अभ्यास मंडल द्वारा आयोजित 66वीं ग्रीष्मकालीन व्याख्यानमाला में पर्यावरण संरक्षण और सामूहिक भागीदारी विषय पर श्रोताओं संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि क्लाइमेटचेंज को हमें समझना चाहिए और उसके लिए लगातार काम करना चाहिए। आज हम लोगों की जीवनशैली बदल गई है। हमारे यहां 40 प्रतिशत भूमि मरुस्थल के रूप में बदल गई है। अब यह भूमि उपजाऊ नहीं रही। पहले एक किलो यूरिया डाला जाता था, तो उससे 12 किलो धान तैयार होता था, आज एक किलो यूरिया डालने पर पांच किलो धान भी तैयार नहीं होता है। अब हमारे भोजन में गुणवत्ता नहीं है। हम भोजन करते हैं और उससे पेट भर जाता है। उसके माध्यम से शरीर का पोषण नहीं होता है। हमने विकास की पश्चिमी समझ को अपना लिया है। कृषि की संस्कृति को हम भूल गए हैं और हमारी संस्कृति से विविधता खत्म हो गई है। जब एक लोकगीत मरता है तो उसके साथ में कृषि की कई विधि भी मर जाती है।

हवा, मिट्टी और पानी की चिंता

हवा, मिट्टी और पानी की चिंता करना होगी। जब यह चिंता हम करेंगे, तो पर्यावरण का संरक्षण स्वमेव हो जाएगा। केवल पेड़ लगा लेने से ग्रीन कवरेज नहीं होगा। हमें क्षेत्र की तासीर को भी समझना होगा। अब तक 50 लाख वृक्ष लगाए हैं और 200 वन तैयार किए हैं। किसी भी स्थान पर कोई-सा भी पौधा नहीं लगाया जाता है। हमें जमीन की तासीर को समझाना पड़ेगा। हर प्रदेश का नहीं, बल्कि हर जिले का मिट्टी का एक अलग स्वभाव होता है। जब हम उस स्वभाव को समझेंगे और उसके हिसाब से पौधा लगाएंगे, तो वह पौधा पनपेगा। कई बार हम देखते हैं कि हमने पौधा लगाया, लेकिन वह पौधा नहीं पनपा तो उसके पीछे कारण जमीन का स्वभाव होता है।

हरियाली को हम केवल इस रूप में नहीं ले सकते कि हमें पर्याप्त आक्सीजन मिल जाएं। हमें इसे जीवित तंत्र के रूप में समझना होगा। हमें सोशल इकोलाजी को समझना चाहिए। क्या कारण है कि हमारे देश में हर प्रदेश का खान-पान अलग है क्योंकि हर प्रदेश में मौसम अलग तरह का होता है और वहां पर शरीर की आवश्यकता भी बदल जाती है। कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथि का स्वागत सेवानिवृत आईएएस अधिकारी आनंद शर्मा, शफी शेख, द्वारका मालवीय, सुनील साहू ने किया। संचालन स्वप्निल व्यास ने किया। अतिथि परिचय वैशाली खरे ने दिया। स्मृति चिन्ह डा. ओपी जोशी और डा. दिलीप वाघेला ने भेंट किया। आभार पर्यावरणविद् डा. शंकर लाल गर्ग ने माना। अंत में सभी को राबड़ी दिवस पर राजस्थानी राबड़ी पिलाई गई।

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