नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। जनगणना 2027 के प्रथम चरण में मकान गणना और परिवारों के आंकड़ों ने जिले की बदलती तस्वीर साफ कर दी। जिले की कुल संभावित आबादी 44.24 लाख आंकी गई है, जिसमें 64 प्रतिशत लोग शहरों में निवास करते हैं, जबकि ग्रामीण आबादी 36 प्रतिशत है।
जिले में कुल 12.70 लाख मकान दर्ज किए गए, जिनमें 9.17 लाख आवासीय हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि 1.42 लाख मकान खाली पाए गए, यानी हर 100 में करीब 11 मकान उपयोग में नहीं हैं। परिवारों की संख्या 9.43 लाख दर्ज हुई है।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले 15 वर्षों में इंदौर जिले में जितनी आबादी बढ़ी है, वह कई छोटे शहरों की कुल आबादी के बराबर है। हर साल करीब 76 हजार नए लोग जुड़े, तो दूसरी तरफ औसतन 41 हजार नए मकान भी खड़े हुए। यानी इंदौर हर साल अपने भीतर एक नया शहर बसाता चला गया।
2011 में जिले की आबादी 32.76 लाख थी, जो अब बढ़कर 44.24 लाख के पार पहुंच गई है। इसका मतलब है कि 15 वर्षों में 11.48 लाख लोग बढ़े, यानी लगभग 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी। दिलचस्प बात यह है कि बढ़ती आबादी के साथ रहने की जरूरत भी तेजी से बढ़ी और जिले में मकानों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई। 2011 में जिले में करीब 6.49 लाख मकान थे, जो अब बढ़कर 12.70 लाख से ज्यादा हो चुके हैं।
यानी इस दौरान 6.20 लाख नए मकान बने। सबसे तेज बदलाव शहर में देखने को मिला, जहां नगर निगम सीमा में मकानों की संख्या 3.98 लाख से बढ़कर 8.39 लाख पहुंच गई। यानी शहर में हर साल करीब 29 हजार नए मकान बने।विशेषज्ञों का कहना है कि यह बढ़ोतरी बल्कि बदलती जीवनशैली, रोजगार और तेजी से बढ़ते शहरी विस्तार के कारण हुई है। इंदौर लगातार रोजगार, शिक्षा, व्यापार और उद्योग का बड़ा केंद्र बनता गया, जिससे आसपास के जिलों और गांवों से लोगों का रुझान शहर की ओर बढ़ा।हालांकि आबादी के आंकड़े अभी संभावित हैं। अगले साल फरवरी में आबादी की वास्तविक गणना शुरू होगी, जिसके बाद इंदौर की असली तस्वीर और स्पष्ट होकर सामने आएगी।
ग्रामीण इलाकों में 71 प्रतिशत मकान बढ़े
आमतौर पर माना जाता है कि विकास सिर्फ शहरों तक सीमित रहता है, लेकिन इंदौर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के आंकड़े अलग कहानी बयां करते हैं। ग्रामीण इलाकों में 2011 के 2.50 लाख मकान अब बढ़कर 4.30 लाख हो चुके हैं। यानी गांवों में भी 71 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई।हालाकि अधिकांश मकान इंदौर शहर की सीमा से लगे हुए गांवों में बने है।नगर निगम सीमा के बाहर के गांवों में बड़ी संख्या में कालोनियां विकसित हुई।
हर मकान रहने के लिए नहीं
जनगणना के दौरान सामने आया कि जिले में 9.17 लाख मकान आवासीय श्रेणी में हैं। इनमें से 8.84 लाख पूरी तरह रहने के लिए उपयोग हो रहे हैं, जबकि 33 हजार से ज्यादा मकानों में घर और कारोबार दोनों साथ चल रहे हैं।वहीं 2.10 लाख मकानों का उपयोग पूरी तरह से व्यावसायिक गतिविधियों के लिए हो रहा है। नगर निगम क्षेत्र में 1.30 लाख से ज्यादा निर्माण व्यावसायिक उपयोग में आ रहे है।
1.42 लाख मकान खाली, 16 हजार पर ताले
एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया कि जिले में 1.42 लाख मकान खाली पड़े हैं, जबकि 16 हजार से ज्यादा मकानों पर ताले लगे मिले। इसके पीछे निवेश के लिए खरीदे गए घर, या नए निर्मित मकान, किराएदारों की कमी, नए विकसित क्षेत्र जैसी वजहें मानी जा रही हैं।
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