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जिजीविषा: आधुनिक जीवन और आध्यात्मिक उपभोक्तावाद का उदय

जिजीविषा: आधुनिक जीवन और आध्यात्मिक उपभोक्तावाद का उदय

आज का समय एक विचित्र परिवर्तन का साक्षी बन रहा है। आध्यात्मिकता, जिसे कभी आत्म-अन्वेषण, मौन और आंतरिक परिवर्तन की प्रक्रिया माना जाता था, धीरे-धीरे एक जीवन-शैली उत्पाद में परिवर्तित होती दिखाई दे रही है। अब ध्यान केवल साधना नहीं, “वेलनेस रूटीन” बनता जा रहा है; मौन केवल आत्म-संवाद नहीं, एक “एक्सपीरियंस-पैकेज” बन चुका है; और आध्यात्मिकता का अर्थ अनेक बार आंतरिक अनुशासन से अधिक बाहरी प्रस्तुति में दिखाई देता है। यह परिवर्तन केवल सामाजिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और चेतनात्मक स्तर पर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रश्न यह नहीं कि आध्यात्मिकता लोकप्रिय क्यों हो रही है; प्रश्न यह है कि क्या उसकी गहराई उसी अनुपात में जीवित भी रह पा रही है।

कुछ वर्ष पहले तक आध्यात्मिक साधना का संबंध विराम, एकांत और आत्म-निरीक्षण से जोड़ा जाता था। आज वही आध्यात्मिकता तीव्र उपभोग की संस्कृति का हिस्सा बनती जा रही है। लोग ध्यान-शिविरों में जाते हैं, आध्यात्मिक पुस्तकों का संग्रह करते हैं, प्रेरणादायक वाक्यों को साझा करते हैं, परंतु अनेक बार यह सब एक सूक्ष्म सामाजिक पहचान का हिस्सा अधिक प्रतीत होता है। ऐसा लगता है मानो आध्यात्मिकता भी अब व्यक्तित्व-निर्माण का एक आधुनिक प्रतीक बन गई है। जिस प्रकार लोग अपने वस्त्र, यात्राएँ या जीवन-शैली प्रदर्शित करते हैं, उसी प्रकार अब “आध्यात्मिक होना” भी कई बार एक सांस्कृतिक प्रदर्शन में बदलता दिखाई देता है।

यहाँ समस्या आध्यात्मिक गतिविधियों में नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब साधना अनुभव से अधिक उपभोग का विषय बन जाती है। उपभोग का स्वभाव बाहरी होता है; वह अनुभव को ग्रहण तो करता है, पर उसे आत्मसात नहीं करता। आध्यात्मिकता का स्वभाव इसके विपरीत है। वह व्यक्ति को भीतर की ओर ले जाती है, जहाँ प्रदर्शन का कोई अर्थ नहीं रहता। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में आध्यात्मिकता को सदैव आंतरिक अनुशासन से जोड़ा गया, न कि बाहरी पहचान से।

कठोपनिषद् में कहा गया है: 

“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।”

अर्थात आत्मा केवल प्रवचन, बुद्धि या बहुत सुन लेने से प्राप्त नहीं होती। यह श्लोक आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। हम आध्यात्मिक विचारों को सुन तो रहे हैं, पर क्या हम उन्हें जी भी रहे हैं? हम ध्यान के बारे में पढ़ते हैं, पर क्या वास्तव में कभी अपने भीतर के शोर के साथ बैठे हैं? हम शांति की चर्चा करते हैं, पर क्या हमारे जीवन की गति वास्तव में शांत हुई है? यही अंतर आध्यात्मिक अनुभव और आध्यात्मिक उपभोग के बीच की रेखा है।

समकालीन जीवन में यह प्रवृत्ति इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि आधुनिक मनुष्य भीतर से अत्यधिक थका हुआ है। निरंतर प्रतिस्पर्धा, डिजिटल जीवन, सामाजिक तुलना और मानसिक उत्तेजना ने व्यक्ति को भीतर से रिक्त कर दिया है। ऐसे में आध्यात्मिकता उसे आकर्षित करती है, क्योंकि वह शांति और अर्थ का वादा करती है। परंतु उपभोक्तावादी संस्कृति हर चीज़ को त्वरित अनुभव में बदल देती है। इसलिए आध्यात्मिकता भी अब कई बार “त्वरित शांति” के रूप में प्रस्तुत की जाती है, जैसे कुछ दिनों के लिए किसी आध्यात्मिक शीतल के यात्रा, कुछ घंटों का ध्यान, कुछ प्रेरणादायक वाक्य। इससे अस्थायी राहत तो मिल सकती है, पर बड़ा परिवर्तन नहीं।

आध्यात्मिक परिवर्तन धीमी प्रक्रिया है। वह व्यक्ति से धैर्य, ईमानदारी और आत्म-संघर्ष की माँग करता है। उसमें व्यक्ति को स्वयं के भय, अहंकार, असुरक्षाओं और भ्रमों का सामना करना पड़ता है। यही कारण है कि वास्तविक साधना आकर्षक कम और परिवर्तनीय अधिक होती है। वह व्यक्ति को बदलती है, केवल सांत्वना नहीं देती। पर आज का समय अनुभव से अधिक अनुभव की छवि को महत्व देता है। यही कारण है कि कई बार आध्यात्मिकता का बाहरी स्वरूप उसके वास्तविक सार से अधिक दिखाई देने लगता है।

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि आधुनिक आध्यात्मिकता पूरी तरह सतही हो चुकी है। वास्तव में यह एक संक्रमणकाल है। लोग खोज रहे हैं, पर दिशा स्पष्ट नहीं है। वे अर्थ चाहते हैं, पर उनकी आदतें अभी भी उपभोग की संस्कृति से संचालित हैं। इसलिए आध्यात्मिकता और उपभोक्तावाद का यह मिश्रण दिखाई देता है। यह विरोधाभास आज की चेतना की वास्तविक स्थिति को दर्शाता है: भीतर गहराई की खोज और बाहर त्वरित संतुष्टि की आदत।

आध्यात्मिकता का वास्तविक स्वरूप तब प्रकट होता है जब व्यक्ति स्वयं से ईमानदारी से प्रश्न पूछना आरंभ करता है। क्या मैं शांति को अनुभव करना चाहता हूँ, या केवल शांत दिखाई देना चाहता हूँ? क्या मैं साधना को जी रहा हूँ, या केवल उसके विचारों का संग्रह कर रहा हूँ? क्या मेरी आध्यात्मिकता मुझे भीतर से अधिक सजग और करुणाशील बना रही है, या केवल मेरी पहचान का नया हिस्सा बन रही है? यही प्रश्न व्यक्ति को बाहरी उपभोग से भीतर की यात्रा की ओर ले जाते हैं।

सत्य तो यह है कि आध्यात्मिकता कोई वस्तु नहीं है जिसे खरीदा, प्रदर्शित या संग्रहित किया जा सके। वह चेतना की अवस्था है, जो धीरे-धीरे जीवन में उतरती है। उसे अनुभव करने के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं, बल्कि आत्म-सत्यनिष्ठा आवश्यक है। और शायद आज के समय का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है- क्या हम आध्यात्मिकता को जीना चाहते हैं, या केवल उसका अनुभव उपभोग करना चाहते हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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