भोपाल के एमवीएम ग्राउंड में 12 दिन चले स्वदेशी मेले का समापन हो गया है। बुधवार रात को राज्यपाल मंगुभाई पटेल भी मेले में पहुंचे। इस मेले में देशभर के स्वदेशी उत्पादों, हस्तशिल्प, दैनिक उपयोग की वस्तुओं, स्थानीय उद्योगों और स्टार्टअप्स के 200 से अधिक स्टॉल लगाए गए। मेले में खरीदारी के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम और विभिन्न प्रतियोगिताएं भी आकर्षण का केंद्र रहे। स्वदेशी जागरण मंच और स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में मेले का आयोजन किया गया। आयोजकों के मुताबिक, मेले में कारीगरों, बुनकरों, शिल्पकारों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को अपने उत्पादों के प्रदर्शन और बिक्री का अवसर मिला। इसके जरिए युवाओं, महिलाओं और नए उद्यमियों को भी स्वरोजगार व उद्यमिता के लिए प्रोत्साहित किया गया। सांसद बोले- सभी 55 जिलों में हो ऐसे मेले मेले में पहुंचे सांसद आलोक शर्मा ने कहा कि भोपाल का गौरवशाली इतिहास और समृद्ध संस्कृति रही है। शहर में स्वदेशी मेले के आयोजन की लंबे समय से प्रतीक्षा थी। स्वदेशी जागरण मंच का सराहनीय प्रयास हैं। उनकी इच्छा है कि इसी तरह के स्वदेशी मेले मध्य प्रदेश के सभी 55 जिलों में आयोजित किए जाएं। ऐसे आयोजन अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों और उनके प्रयासों को आपस में जोड़ने का काम करते हैं। उन्होंने भोपाल में अपने कार्यकाल के दौरान भोपाल मेले की शुरुआत का उल्लेख करते हुए कहा कि अब शहर में स्वदेशी जागरण मंच द्वारा स्वदेशी मेले का आयोजन होना प्रसन्नता की बात है। उन्होंने सुझाव दिया कि आने वाले समय में रानी कमलापति की स्मृति में भी मेले का आयोजन किया जाना चाहिए। देश को मजबूत बनाने के लिए समाज को भी आगे आना होगा-मिश्रा
भाजपा मध्य प्रदेश के मोर्चा प्रभारी मनोरंजन मिश्रा ने कहा कि वर्ष 1991 में जब पूरी दुनिया में वैश्वीकरण की चर्चा हो रही थी, उस समय स्वदेशी के विचार पर भी गंभीर विमर्श शुरू हुआ था। भोपाल में अध्ययन के दौरान उन्होंने पहली बार स्वदेशी के बारे में सुना था। उस समय उम्र कम होने के कारण इसकी व्यापकता को समझ नहीं पाए थे, लेकिन आज मेले में वक्ताओं के विचार सुनकर और यहां की गतिविधियों को देखकर स्वदेशी का महत्व समझ में आता है। उन्होंने कहा कि स्वदेशी को केवल आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसके सामाजिक और सांस्कृतिक पक्षों को भी समझना जरूरी है। जापान जैसे देशों ने अपने भीतर स्व का भाव जागृत करके प्रगति की है। भारत में भी पहले स्थानीय व्यवस्थाओं और परंपराओं के आधार पर समाज का संचालन होता था। अंग्रेजों के शासन के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासन की जो व्यवस्थाएं आईं, स्वतंत्रता के बाद भी काफी हद तक उन्हीं पद्धतियों को अपनाया गया। कृषि और गांवों को स्वदेशी से जोड़ना जरूरी
भारतीय किसान संघ के अध्यक्ष सर्वज्ञ दीवान ने कहा कि स्वदेशी का भाव कृषि और गांवों के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। वे स्वयं कृषि क्षेत्र से आते हैं। आज खेती में केवल उर्वरक ही नहीं, बल्कि बीज जैसी जरूरी चीजों के लिए भी विदेशी स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जबकि गांवों का जीवन और कृषि व्यवस्था पहले पूरी तरह स्वदेशी पर आधारित हुआ करती थी। उन्होंने कहा कि स्वदेशी को केवल खानपान या वस्तुओं के उपयोग तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे अपनी पूरी जीवनशैली और दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा। गांवों के लोगों और किसानों को मजबूत करने से ही देश मजबूत होगा। स्वावलंबन भारत फाउंडेशन के सीईओ संकेत सिंह राठौड़ ने कहा कि 1947 में देश की आजादी के साथ एक लड़ाई समाप्त हुई थी, लेकिन उसी वर्ष आर्थिक लड़ाई की शुरुआत भी हो गई थी। आज यह लड़ाई अपने अंतिम चरण में है। पूरी दुनिया वैश्वीकरण से स्थानीयकरण की ओर बढ़ रही है और स्वदेशी का विचार इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए
मेले के दौरान प्रतिदिन रात में सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोक नृत्य, गायन और वादन सहित विभिन्न रंगारंग प्रस्तुतियां हुईं। कार्यक्रम में मेला संयोजक सतीश विश्वकर्मा, स्वदेशी जागरण मंच के मध्य क्षेत्र संयोजक सुधीर दाते, स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन के सीईओ राठौड़, सांसद शर्मा, मोर्चा प्रभारी मिश्रा, किसान संघ के अध्यक्षज्ञ दीवान, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संचालक संजीव शर्मा, श्रीकांत बुदौलिया, सीमा भारद्वाज, दीपक वर्मा, रमन तिवारी, शोभराज सुखवानी, अजय सोनी, अभिषेक तिवारी, हरिओम सेन, महेंद्र सिंह चौहान, वीरेंद्र पटेल, अश्विनी कुमार,सहित अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
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