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‘लड़कों से बात करती है, गलत जा रही है’:घरवालों ने खेल छुड़वाया, पतंजलि स्टोर पर नौकरी की; जानें एशियन गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट किरण की कहानी

‘लड़कों से बात करती है, गलत जा रही है’:घरवालों ने खेल छुड़वाया, पतंजलि स्टोर पर नौकरी की; जानें एशियन गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट किरण की कहानी

सोनीपत1 घंटे पहलेलेखक: राम सिंहमार

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जिम में प्रैक्टिस करतीं हुईं किरण पहल।-फाइल

हरियाणा के सोनीपत की रहने वाली एथलीट किरण पहल मंगलवार को एशियन गेम्स के रिले इवेंट में गोल्ड और टीम इवेंट में सिल्वर मेडल जीतकर देश-दुनिया में छा गईं। गन्नौर एरिया के गांव गुमड़ की गलियों से शुरू हुआ किरण का यह सफर कभी आसान नहीं रहा।

तीसरी कक्षा में जिम्नास्टिक करती लड़कियों को देखकर किरण खेलों की ओर आकर्षित हुईं। स्कूल का मैदान दूर था, इसलिए पिता ने 300 रुपए में कबाड़ी से पुरानी साइकिल दिला दी, ताकि प्रैक्टिस न छूटे। इसी बीच गांव के एक व्यक्ति ने पिता और चाचा से झूठी शिकायत कर दी कि तुम्हारी लड़की लड़कों से बात करती है और गलत रास्ते पर जा रही है। इसके बाद परिवार ने उनका खेल बंद करा दिया। किरण ने किसी तरह परिवार को मनाया और पांच महीने बाद दोबारा मैदान पर लौटीं।

प्रैक्टिस के लिए एथलीट वाले जूते चाहिए थे। बाजार में पता चला कि उनकी कीमत 11 हजार रुपए है। ऐसे में दादी सहारा बनीं। उन्होंने अपनी बुढ़ापा पेंशन के रुपए पोती को दे दिए। गांव से निकलकर रोहतक स्टेडियम पहुंचीं तो डाइट और किराए की समस्या खड़ी हो गई। इसका समाधान उन्होंने पतंजलि स्टोर पर काम करके निकाला। वहां से मिलने वाले 4 हजार रुपए से खेल, रहने और खाने का खर्च पूरा किया।

साल 2022 में किरण के पिता ओमप्रकाश बीमार हुए तो वह प्रैक्टिस छोड़कर उनके पास पहुंचीं। पिता ने उनसे पूछा कि क्या वह ओलिंपिक में जाकर मेडल नहीं ला सकतीं। किरण ने वादा किया कि वह जरूर मेडल लेकर आएंगी। मगर इसी साल पिता का निधन हो गया। पिता से किया यही वादा किरण के लिए प्रेरणा बन गया।

किरण पहल ने एशियन गेम्स में रिले इवेंट में गोल्ड और टीम इवेंट में सिल्वर मेडल जीता।

किरण पहल ने एशियन गेम्स में रिले इवेंट में गोल्ड और टीम इवेंट में सिल्वर मेडल जीता।

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  • तीसरी कक्षा में देखा खेल, पांचवीं में मैदान पर उतरी: किरण तीसरी कक्षा में पढ़ती थीं, तब उन्होंने कुछ लड़कियों को जिम्नास्टिक करते देखा। यहीं से खेलों में जाने की इच्छा पैदा हुई। पांचवीं कक्षा में पहली बार स्कूल की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। साइकिल रेस, मटका रेस, बड़ी रस्सी और दौड़ में वह लगातार जीतती रहीं। इन प्रतियोगिताओं से पहली बार उन्हें 500 रुपए इनाम मिला।
  • गांव के व्यक्ति ने झूठी बात बता खेल छुड़वाया: साल 2009 में किरण ने स्कूल के ग्राउंड में रेस की प्रैक्टिस शुरू की। एक दिन प्रैक्टिस के बाद बाहर निकलते समय गांव के एक लड़के ने उनसे प्रैक्टिस के बारे में पूछा। दोनों को बात करते गांव के किसी व्यक्ति ने देख लिया। उसने चाचा जोगेंद्र और पिता ओमप्रकाश को बताया कि किरण प्रैक्टिस के लिए नहीं, लड़कों से बातचीत करने जाती हैं। वह गलत रास्ते पर जा रही हैं, उन्हें रोक लो। इसके बाद परिवार ने किरण की प्रैक्टिस पर रोक लगा दी। करीब पांच महीने तक वह मैदान नहीं जा सकीं। बाद में उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया कि वह किसी लड़के से बात नहीं करेंगी। इसके बाद दादी और परिवार के अन्य सदस्यों ने उनकी दोबारा प्रैक्टिस शुरू करवाई।
  • दो किलोमीटर दूर पैदल जाकर करती थीं प्रैक्टिस: साल 2010 में किरण गांव से करीब दो किलोमीटर दूर बीएसटी स्कूल के मैदान में दौड़ने जाने लगीं। वहां सिंथेटिक ट्रैक जैसी सुविधा नहीं थी। घास वाले मैदान में ही दूसरी लड़कियों के साथ अभ्यास करती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं थी। पिता ओमप्रकाश कोर्ट में मुंशी थे और इसी आमदनी से घर चलता था। घर का घी, दूध और रोटी ही उनकी डाइट का आधार रहे।
  • 300 रुपए की पुरानी साइकिल बनी रोज की साथी: करीब 18 महीने तक किरण घर से मैदान तक पैदल जाती रहीं। बेटी का खेल के प्रति जुनून देखकर परिवार ने साइकिल का इंतजाम किया। साल 2012 में 300 रुपए में पुरानी साइकिल खरीदी और उसे रिपेयर कराया गया। इसके बाद किरण इसी साइकिल से रोज मैदान आने-जाने लगीं।
किरण पहल के जीतने की खुशी जाहिर करतीं परिवार की महिलाएं।

किरण पहल के जीतने की खुशी जाहिर करतीं परिवार की महिलाएं।

  • स्टेडियम की फीस, किराए के लिए स्टोर पर नौकरी की : साल 2014 में किरण ने सोनीपत के सुभाष स्टेडियम में प्रैक्टिस शुरू की। बेहतर सिंथेटिक ग्राउंड पर ट्रेनिंग के लिए साल 2015 में वह रोहतक चली गई और अकेले किराए पर रहने लगी। रहने और डाइट का खर्च निकालने के लिए उसने पतंजलि स्टोर में 4 हजार रुपए महीने की नौकरी शुरू कर दी। सुबह 5 बजे उठकर प्रैक्टिस करती, सुबह 10 से शाम 5 बजे तक नौकरी करती और इसके बाद फिर मैदान में अभ्यास के लिए पहुंचती थी।
  • पढ़ाई में नहीं लगता था मन, नौकरी में अड़चन आई: किरण ने जिला और स्टेट स्तर पर लगातार खेलते हुए कई मेडल जीते। साल 2018 में पहली बार नेशनल चैंपियनशिप में लगातार दो गोल्ड मेडल हासिल किए। इसके बाद रेलवे में नौकरी का मौका मिला, लेकिन दसवीं पास नहीं होने के कारण अड़चन आ गई। दसवीं में कंपार्टमेंट आने के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। नौकरी के लिए उसने दोबारा पढ़ाई शुरू की और साल 2019 में दसवीं पास की।
एशियन गेम्स में टीम मेंबर्स के साथ किरण (बाएं से दूसरे नंबर पर)।

एशियन गेम्स में टीम मेंबर्स के साथ किरण (बाएं से दूसरे नंबर पर)।

खेल के मैदान में आईं हर मुश्किलों से लड़कर पाया मुकाम…

  • 2019 में इंडिया कैंप, 2020 में कोविड ने रोका सफर : दसवीं पास करने के बाद किरण को 2019 में इंडिया कैंप पटियाला के लिए बुलाया गया। इसके बाद 2020 में कोविड के कारण खेल गतिविधियां प्रभावित हुईं। ओलिंपिक के लिए उसका ट्रायल भी हुआ, लेकिन चयन नहीं हो पाया और उसे कैंप छोड़कर वापस आना पड़ा। लगातार संघर्ष के बाद 25 जून 2021 को किरण ने रेलवे पटियाला में जूनियर क्लर्क के रूप में ज्वाइन किया। इसके बाद से वह नौकरी के साथ खेलों में भी लगातार सक्रिय रही।
  • पेरिस ओलिंपिक में पहुंची, लेकिन मेडल नहीं जीत पाई : किरण ने पेरिस 2024 ओलिंपिक में हिस्सा लिया, लेकिन पदक हासिल नहीं कर सकी। साल 2023 में वह भारतीय ओपन चैंपियनशिप में तीसरे स्थान पर रही थी। 2026 के एशियाई खेलों में किरण ने 400 मीटर की इंडिविजुअल स्पर्धा में हिस्सा लिया। वह महज 20 माइक्रो सेकंड के अंतर से पदक से चूक गई। इससे परिवार को निराशा हुई। रिले से पहले उसकी मां को इतना दुख हुआ कि उस दिन घर में खाना तक नहीं बना। मगर, किरण ने हौसला नहीं छोड़ा और अगली स्पर्धा पर ध्यान लगाया।
रविंद्र (भाई), किरण (मास्क पहने हुए), पिता ओमप्रकाश, रिसालो देवी (दादी), माया देवी (मां) और बहन तमन्ना। फाइल फोटो

रविंद्र (भाई), किरण (मास्क पहने हुए), पिता ओमप्रकाश, रिसालो देवी (दादी), माया देवी (मां) और बहन तमन्ना। फाइल फोटो

बहन बोलीं- चने के लड्डू पसंद, ओलिंपिक में भी साथ ले गई थी

किरण की बहन तमन्ना के अनुसार, वह बहुत आध्यात्मिक है और खेल को लेकर पूरी तरह समर्पित रहती है। वह सामान्य तौर पर सुबह-शाम तीन से चार घंटे प्रैक्टिस करती है। बड़ी प्रतियोगिता आने पर वह दूसरी चीजों को पीछे छोड़कर सिर्फ ट्रेनिंग पर ध्यान देती है।

किरण को चने के लड्डू बेहद पसंद हैं। वह ओलिंपिक के दौरान भी अपने साथ घर के बने चने के लड्डू लेकर गई थी। अब घर लौटने पर मां अपनी बेटी के लिए फिर से चने के लड्डू बनाएंगी।

किरण 2023 तक पूरी तरह शाकाहारी रही। पेरिस ओलिंपिक के दौरान पोलैंड में रहने के समय खाने को लेकर उसे परेशानी हुई। वहां उपलब्ध भोजन में नॉनवेज अधिक होने के कारण डाइट संभालना मुश्किल हुआ। इसके बाद उसने नॉनवेज खाना भी शुरू कर दिया।

1 अक्टूबर को गांव पहुंचेगी मेडल विजेता बेटी

एशियाई खेलों में गोल्ड और सिल्वर जीतने के बाद अब गुमड़ गांव में किरण के स्वागत की तैयारी है। वह 1 अक्टूबर को दिल्ली पहुंचेगी, जिसके बाद उसे गांव लाकर भव्य स्वागत किया जाएगा।

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