नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। नए अधिवक्ताओं को स्टायपंड मिलेगा या नहीं, हाई कोर्ट ने इस मुद्दे को लेकर दायर दो जनहित याचिकाओं में सोमवार को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के वकीलों से पूछा कि आप क्या चाहते हैं, क्या आप नए वकीलों को लाडला वकील बनाना चाहते हैं।
याचिकाओं में कहा है कि नए अधिवक्ताओं को प्रैक्टिस जमाने में तीन से पांच साल का समय लगता है। इस अवधि में उनके पास भरण पोषण का कोई अन्य साधन नहीं होता है, ऐसी स्थिति में नए अधिवक्ताओं को शासन द्वारा प्रारंभिक तीन वर्ष तक प्रतिमाह स्टायपंड दिया जाना चाहिए।
बार कौंसिल आफ इंडिया ने जिला स्तर पर नए अधिवक्ताओं को बीस हजार रुपये प्रतिमाह और तहसील स्तर पर 15 हजार रुपये प्रतिमाह स्टायपंड दिए जाने की अनुशंसा की थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ।
हाई कोर्ट में इन दो जनहित याचिकाओं में से पहली एडवोकेट निमेष पाठक, लकी जैन ने और दूसरी यंग एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से प्रस्तुत हुई है।
याचिकाओं में कहा है कि नियमों में बंधे होने की वजह से अधिवक्ता वकालात के अलावा कोई अन्य काम नहीं कर सकते। नए अधिवक्ताओं के सामने खुद को स्थापित करने की चुनौती होती है।
इसमें लंबा समय लगता है। ऐसे में नए अधिवक्ताओं को सनद प्राप्त करने के कम से कम तीन वर्ष तक एक निश्चित स्टायपंड देना चाहिए।
सुनवाई के दौरान राज्य अधिवक्ता परिषद की ओर से तर्क रखा गया कि कई वरिष्ठ अधिवक्ता जूनियर अधिवक्ताओं को स्टायपंड देते हैं। इधर याचिकाकर्ता का कहना है कि हमारी मांग राज्य अधिवक्ता परिषद और राज्य से स्टायपंड दिलवाए जाने की है।
राज्य अधिवक्ता परिषद और राज्य मिलकर जूनियर अधिवक्ताओं को एक निश्चित समय के लिए और निश्चित राशि स्टायपंड के रूप में देना चाहिए। न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया।
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