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हमारी जिदंगी दूसरों को सुधारने में बर्बाद हो रही | Hamari Jidangi Dusron Ko Sudharne Mein Barbad Ho Rahi

हमारी जिदंगी दूसरों को सुधारने में बर्बाद हो रही | Hamari Jidangi Dusron Ko Sudharne Mein Barbad Ho Rahi

यह उद्गार मालव केसरी गुरुदेव सौभाग्यमल के शिष्य, रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक प्रकाश मुनि निर्भय ने व्यक्त किए। मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि नासिक चातुर्मास के दौरान उनसे श्रावक ने ऐसा ही प्रश्न किया था कि प्रवचन में उपदेश देते है, क्रोध मत करो, अहंकार मत करो, लेकिन ये श्रावकों के लिए है या संतों के लिए भी है? इसका उत्तर था कि परमात्मा का उपदेश पहले साधुओं के लिए ही है, फिर श्रावक-श्राविकाओं के लिए है। पिता बीडी पिएगा, गुटका खाएगा और बेटे को मना करेगा, तो कोन सुनेगा। इसी प्रकार संत भी दूसरों को जो समझाते है, वह खुद नहीं करेंगे, तो वाणी का असर नहीं होगा।

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