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LIVE: तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी चुनाव परिणाम 2026 : पार्टीवार दलीय स्थिति
	
		
			
	


	
		तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणाम 2026
	
		कुल सीटें : 234
	
		बहुमत : 118
		
		
			
				
					
						पार्टी
					
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			केरल विधानसभा चुनाव परिणाम 2026
		
			कुल सीटें : 140
		
			बहुमत : 71
			
			
				
					
						
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				पुडुचेरी विधानसभा चुनाव परिणाम 2026
			
				कुल सीटें : 30
			
				बहुमत : 16
				
				
					
						
							
								पार्टी
							
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LIVE: तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी चुनाव परिणाम 2026 : पार्टीवार दलीय स्थिति

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		कुल सीटें : 234
	
		बहुमत : 118
		
		
			
				
					
						पार्टी
					
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			कुल सीटें : 140
		
			बहुमत : 71
			
			
				
					
						
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				पुडुचेरी विधानसभा चुनाव परिणाम 2026
			
				कुल सीटें : 30
			
				बहुमत : 16
				
				
					
						
							
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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव परिणाम 2026

कुल सीटें : 234

बहुमत : 118

पार्टी सीट/बढ़त 
डीएमके+ 00
एआईएडीएमके+ 00
टीवीके 00
अन्य  00

केरल विधानसभा चुनाव परिणाम 2026

कुल सीटें : 140

बहुमत : 71

पार्टी सीट/बढ़त 
एलडीएफ 00
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भाजपा 00
अन्य 00

पुडुचेरी विधानसभा चुनाव परिणाम 2026

कुल सीटें : 30

बहुमत : 16

पार्टी सीट/बढ़त 
एनडीए 00
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कुल सीटें : 234

बहुमत : 118

पार्टी सीट/बढ़त 
डीएमके+ 00
एआईएडीएमके+ 00
टीवीके 00
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केरल विधानसभा चुनाव परिणाम 2026

कुल सीटें : 140

बहुमत : 71

पार्टी सीट/बढ़त 
एलडीएफ 00
यूडीएफ 00
भाजपा 00
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कुल सीटें : 30

बहुमत : 16

पार्टी सीट/बढ़त 
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#LIVE #तमलनड #करल #पडचर #चनव #परणम #परटवर #दलय #सथत

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Jule’s strike sends Lyon past Arsenal into Women’s Champions League final <div id="content-body-70932729" itemprop="articleBody"><p>OL Lyonnes winger Jule Brand struck late in a thrilling 3-1 win over holder Arsenal to seal a 4-3 aggregate victory and book a place in the Women’s Champions League final.</p><p>Eight-time champion Lyon will face either Barcelona or Bayern Munich, which plays the second leg in Spain on Sunday after a 1-1 draw last week.</p><p>Lyon started strongly and had an early goal from a set-piece ruled out, but took the lead when Melchie Dumornay was brought down in the box by defender Lotte Wubben-Moy, with a penalty awarded after a VAR review.</p><p>Wendie Renard scored from the spot at the second attempt after goalkeeper Daphne van Domselaar moved off her line to save the initial effort.</p><p><b>ALSO READ | <a href="https://sportstar.thehindu.com/football/ipswich-town-promoted-premier-league-championship-promotion-standings-points-football-news/article70931793.ece#google_vignette" target="_self">Ipswich Town promoted to Premier League after finishing second in Championship; Wrexham misses playoffs</a></b></p><p>Kadidiatou Diani doubled the lead nine minutes before the break, hooking home at the back post from a corner as Lyon moved 3-2 ahead on aggregate.</p><p>Arsenal, which had shown little of the intensity that helped it secure a 2-1 win in the first leg, levelled in the 76th minute through Alessia Russo, who got between two defenders to convert Smilla Holmberg’s cross.</p><p>The game looked set for extra time until Brand latched onto a pass from Dumornay and scored with a deft left-foot finish in the 86th minute to send Lyon into its 12th Champions League final.</p><p class="publish-time" id="end-of-article">Published on May 02, 2026</p></div> #Jules #strike #sends #Lyon #Arsenal #Womens #Champions #League #final

इंटरनेट डेस्क। साल 2000 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म हेरा फेरी को लेकर एक बड़ी खबर आई है। खबर ये है कि फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला ने इस फिल्म के कॉपीराइट और रीमेक राइट्स को लेकर मुंबई के अंबोली पुलिस स्टेशन में फ्रॉड का मामला दर्ज करवाया है।

खबरों के अनुसार, नाडियाडवाला ने शिकायत में कहा कि विवाद साल 1989 की मलयालम फिल्म रामजी राव स्पीकिंग से जुड़ा है, जिस पर हेरा फेरी आधारित थी। फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला द्वारा किया गया गया है कि साल 2000 में उन्होंने सुरेश कुमार सिंघल से 4.5 लाख रुपए में कुछ रीमेक राइट्स कानूनी रूप से खरीदे थे।

रिलीज से सात दिन पहले कुछ लोगों ने दबाव बनाकर उनसे पैसे ऐंठने का प्रयास किया। इसके बाद भारी इन्वेस्टमेंट और संभावित नुकसान के डर से उनके द्वारा किया गया। जबकि कोर्ट ने उनके पक्ष में स्टे ऑर्डर दिया था। नाडियाडवाला ने ओरिजिनल फिल्म से जुड़े पक्षों पर पहले से बिके राइट्स को फिर से बेचने का भी गंभीर आरोप लगाया है। इस संबंध में पुलिस की ओर से गोपाला पिल्लई विजयकुमार और एम पॉल माइकल के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

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Producer Firoz Nadiadwala, film Hera Pheri, Hindi news">प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला ने फिल्म Hera Pheri को लेकर दर्ज करवाया मामला   इंटरनेट डेस्क। साल 2000 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म हेरा फेरी को लेकर एक बड़ी खबर आई है। खबर ये है कि फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला ने इस फिल्म के कॉपीराइट और रीमेक राइट्स को लेकर मुंबई के अंबोली पुलिस स्टेशन में फ्रॉड का मामला दर्ज करवाया है।

खबरों के अनुसार, नाडियाडवाला ने शिकायत में कहा कि विवाद साल 1989 की मलयालम फिल्म रामजी राव स्पीकिंग से जुड़ा है, जिस पर हेरा फेरी आधारित थी। फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला द्वारा किया गया गया है कि साल 2000 में उन्होंने सुरेश कुमार सिंघल से 4.5 लाख रुपए में कुछ रीमेक राइट्स कानूनी रूप से खरीदे थे।

रिलीज से सात दिन पहले कुछ लोगों ने दबाव बनाकर उनसे पैसे ऐंठने का प्रयास किया। इसके बाद भारी इन्वेस्टमेंट और संभावित नुकसान के डर से उनके द्वारा किया गया। जबकि कोर्ट ने उनके पक्ष में स्टे ऑर्डर दिया था। नाडियाडवाला ने ओरिजिनल फिल्म से जुड़े पक्षों पर पहले से बिके राइट्स को फिर से बेचने का भी गंभीर आरोप लगाया है। इस संबंध में पुलिस की ओर से गोपाला पिल्लई विजयकुमार और एम पॉल माइकल के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

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प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला ने फिल्म Hera Pheri को लेकर दर्ज करवाया मामला   इंटरनेट डेस्क। साल 2000 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म हेरा फेरी को लेकर एक बड़ी खबर आई है। खबर ये है कि फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला ने इस फिल्म के कॉपीराइट और रीमेक राइट्स को लेकर मुंबई के अंबोली पुलिस स्टेशन में फ्रॉड का मामला दर्ज करवाया है।

खबरों के अनुसार, नाडियाडवाला ने शिकायत में कहा कि विवाद साल 1989 की मलयालम फिल्म रामजी राव स्पीकिंग से जुड़ा है, जिस पर हेरा फेरी आधारित थी। फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला द्वारा किया गया गया है कि साल 2000 में उन्होंने सुरेश कुमार सिंघल से 4.5 लाख रुपए में कुछ रीमेक राइट्स कानूनी रूप से खरीदे थे।

रिलीज से सात दिन पहले कुछ लोगों ने दबाव बनाकर उनसे पैसे ऐंठने का प्रयास किया। इसके बाद भारी इन्वेस्टमेंट और संभावित नुकसान के डर से उनके द्वारा किया गया। जबकि कोर्ट ने उनके पक्ष में स्टे ऑर्डर दिया था। नाडियाडवाला ने ओरिजिनल फिल्म से जुड़े पक्षों पर पहले से बिके राइट्स को फिर से बेचने का भी गंभीर आरोप लगाया है। इस संबंध में पुलिस की ओर से गोपाला पिल्लई विजयकुमार और एम पॉल माइकल के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

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इंटरनेट डेस्क। साल 2000 में रिलीज हुई सुपरहिट फिल्म हेरा फेरी को लेकर एक बड़ी खबर आई है। खबर ये है कि फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला ने इस फिल्म के कॉपीराइट और रीमेक राइट्स को लेकर मुंबई के अंबोली पुलिस स्टेशन में फ्रॉड का मामला दर्ज करवाया है।

खबरों के अनुसार, नाडियाडवाला ने शिकायत में कहा कि विवाद साल 1989 की मलयालम फिल्म रामजी राव स्पीकिंग से जुड़ा है, जिस पर हेरा फेरी आधारित थी। फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला द्वारा किया गया गया है कि साल 2000 में उन्होंने सुरेश कुमार सिंघल से 4.5 लाख रुपए में कुछ रीमेक राइट्स कानूनी रूप से खरीदे थे।

रिलीज से सात दिन पहले कुछ लोगों ने दबाव बनाकर उनसे पैसे ऐंठने का प्रयास किया। इसके बाद भारी इन्वेस्टमेंट और संभावित नुकसान के डर से उनके द्वारा किया गया। जबकि कोर्ट ने उनके पक्ष में स्टे ऑर्डर दिया था। नाडियाडवाला ने ओरिजिनल फिल्म से जुड़े पक्षों पर पहले से बिके राइट्स को फिर से बेचने का भी गंभीर आरोप लगाया है। इस संबंध में पुलिस की ओर से गोपाला पिल्लई विजयकुमार और एम पॉल माइकल के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

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जर्मन मांस उद्योग में नौकरियों का गोरख धंधा, भारतीय भी प्रभावित
	
		
			
	
	जर्मनी के मांस उद्योग में कर्मचारियों की भारी कमी है। भारत, चीन और वियतनाम जैसे देशों से नए कर्मचारी भर्ती किए जा रहे हैं, पर नौकरी के नाम पर उनसे भारी रकमें वसूली जाती हैं। कर्ज़ में डूबे विदेशी श्रमिक जर्मनी पहुंचने पर बहुत दयनीय परिस्थितियों में रहने और काम करने के लिए विवश हो जाते हैं।
	
	वे अधिकतर भारत और वियतनाम जैसे तृतीय देशों के ऐसे युवा पुरुष हैं, जो रोज़गार पाने की लालच में जर्मनी जाते हैं। जर्मनी में कोई काम-धंधा पाने की संभावना उन देशों के लोगों को विशेष रूप से आकर्षित करती है, जहां जर्मनी की तुलना में बहुत कम वेतन मिलते हैं किंतु यूरोप के इस संपन्न देश में रहने और कमाने का सपना, भारत, चीन या वियतनाम जैसे देशों के लोगों के लिए एक भयावह छलावा सिद्ध होने लगा है : प्रायः वे नौकरी दिलाने वाली बिचौलिया एजेंसियों पर निर्भरता की शोषणकारी जटिलताओं में फंस जाते हैं।

	 

	बिचौलिया एजेंसिंया चार से पांच अंकों वाली फ़ीस मांगती हैं

	जर्मनी में नौकरी दिलाने वाली बिचौलिया एजेंसिंया, कुशलकर्मी या मौसमी कामगारों वाले वीज़ा पर जर्मनी जाने से पहले, भावी नौकरियों के लिए चार से पांच अंकों वाली एक फ़ीस मांगती हैं। यह फ़ीस अधिकतर ऐसे कर्ज़ के रूप में होती है, जिसे चुकाने के लिए जर्मनी में कभी-कभी वर्षों तक काम करना पड़ सकता है। जर्मनी का सबसे बड़ा सार्वजनिक टेलीविज़न प्रसारक है। उसकी राजनीतिक पत्रिका 'मॉनिटर' द्वारा भारत और वियतनाम में की गई एक जांच से पता चला है कि जर्मन मांस उद्योग के लिए एशिया में कर्मचारी चुनने वाली एजेंसियां, लगातार सस्ते श्रमिकों को यूरोप की ओर आकर्षित कर रही हैं और खूब कमाई कर रही हैं।
	
	जर्मनी में मांस उद्योग की एक बड़ी और नामी कंपनी है। उसमें काम करने के लिए पिछले साल भारत के केरल राज्य से जर्मनी आए एक युवक ने 'मॉनिटर' को बतायाः मेरे लिए मेरे परिवार ने अपना सारा सोना बेच दिया। यह कोई अकेला मामला नहीं है। जर्मनी पहुंचे कई कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें इस कंपनी में नौकरी पाने के लिए ऊंची रकमें चुकानी पड़ी हैं। यह शिकायत करने वालों में भारतीय ही नहीं, वियतनामी भी शामिल हैं।
	
	वियतनामियों में से एक ने कहाः  हमारी शादी के बाद मेरे और मेरी पत्नी के पास कुछ पैसे बचे थे। बाकी पैसे मैंने पड़ोसियों, रिश्तेदारों और भाई-बहनों से उधार लिए। कंपनी ने स्वीकार किया है कि एशिया में नए कर्मचारियों की भर्ती करने वाली एजेंसियों ने 15,000 यूरो (1 यूरो=111रुपए) तक का शुल्क वसूला है। कंपनी ने कहा कि मांगी

	गई रकमें उसके अपने मूल्यों के बिल्कुल विपरीत है। हम इस प्रथा की कड़ी निंदा करते हैं; एक नियोक्ता के रूप में अपने कर्मचारियों के साथ खड़े हैं।

	भर्ती कुशलकर्मी के तौर पर वेतन अकुशल श्रमिकों जैसा

	जर्मनी जाने का कुशलकर्मी वीज़ा पाने के लिए श्रमिकों को अपनी शैक्षणिक योग्यता प्रमाणित करनी होती है, तभी वे जर्मनी में कसाई के रूप में काम कर सकते हैं। इस योग्यता के लिए कसाई बनने का बाक़ायदा मान्यता प्राप्त शिक्षण-प्रशिक्षण मिला होना चाहिए। हालांकि जांची गई वेतन पर्चियों से पता चला कि कंपनी में उन्हें केवल उत्पादन सहायक के तौर पर वेतन दिया जाता है। पूछताछ करने पर कंपनी का कहना था कि वह सभी कानूनी नियमों का पालन करती है।
	
	कहने के लिए तो कसाई का काम करने वाले श्रमिकों को प्रति घंटे 14.50 यूरो के हिसाब से पूरे महीने प्रतिदिन 8 घंटे काम के लिए कुल मिलाकर 2320 यूरो वेतन मिलना चाहिए, पर जर्मनी में लागू आयकर तथा स्वास्थ्य, पेंशन, बेरोज़गारी, नर्सिंग और दुर्घटना जैसे समयों के लिए अनिवार्य बीमा नियमों के कारण महीने के अंत में 1700 यूरो ही मिल सकते हैं। मांस उद्योग के श्रमिकों के आवास के किराए और परिवहन आदि का ख़र्च काट कर अंत में उन्हें 1300 यूरो के आसपास ही वेतन मिल पाता है।

	किसी भी समय बर्ख़ास्तगी

	एक पत्रकार जर्मन मांस उत्पादी कंपनियों के लिए श्रमिकों की भर्ती करने वाली दक्षिणी जर्मनी की एक एजेंसी के साथ अपनी पहचान छिपाते हुए हफ्तों तक गोपनीय संपर्क बनाए रखने में सफल रहे। अतीत में वह एजेंसी कंपनी के लिए भी अन्य देशों देशों से 100 से अधिक लोगों की भर्ती कर चुकी है। गोपनीय पत्रकारों से बातचीत में इस दूसरी एजेसी के प्रबंध-निदेशक ने बताया कि तीसरे देशों से आए श्रमिकों को किसी भी समय (यहां तक कि परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के बाद भी) बर्ख़ास्त किया जा सकता है।
	
	अन्य देशों में सस्ते श्रमिकों की भर्ती करने वाली इस दूसरी एजेंसी के ग्राहकों में मांस उद्योग की अन्य कंपनियां भी शामिल थीं, जिनमें जर्मन मांस उद्योग की दिग्गज कंपनी भी शामिल है। इस कंपनी का कहना है कि उसके यहां श्रमिकों की भर्ती पूरी तरह से कानून के अनुसार की जाती है। उसके कहने के अनुसार, भारत से भर्ती किए गए उसके सभी श्रमिक आज भी काम कर रहे हैं।

	बीमारी के कारण भी बर्ख़ास्तगी?

	अन्य भारतीय श्रमिकों ने बताया कि उन्हें परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के दौरान बीमारी के कारण बर्खास्त कर दिया गया। इस नियुक्ति प्रणाली में नियोक्ता अक्सर आवास भी प्रदान करता है और किराया सीधे श्रमिकों के वेतन से काट लेता है, इसलिए उन्हें अपने रहने-सोने के कमरे भी खाली करने पड़े। एक पूछताछ के जवाब में कहा कि अतीत में कुछ मामलों में कर्मचारियों के साथ सहयोग समाप्त कर दिया गया है।
	
	कंपनी की नई योजना विशेष रूप से प्रभावित कर्मचारियों के लिए वित्तीय सहायता पैकेज स्थापित कर की है। अपनी जांच में पाया कि कंपनी ने वियतनाम में भर्ती किए गए कर्मचारियों से खुद भर्ती शुल्क वसूला था। कंपनी ने माना कि अस्थाई रूप से ऐसा भी हुआ है, लेकिन ऐसा वियतनाम में प्रचलित और कानूनी रूप से मान्य नियमों का पालन करते हुए हुआ। वे शुल्क उचित और न्यायसंगत थे। उनमें अन्य बातों के अलावा जर्मन भाषा के पाठ्यक्रम का ख़र्च भी शामिल था।

	 

	मानवीय गरिमा का उल्लंघन

	जर्मन मांस उद्योग अतीत में अपने श्रमिकों के शोषण और उनकी भर्ती के लिए ठेकेदारों को माध्यम बनाने के कारण सुर्खियों में रहा है। उस समय सुधार के कई वादे किए गए थे। राजनेताओं ने कड़े कानून बनाकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। इस क्षेत्र में ऐसे तथाकथित सेवा-अनुबंधों (सर्विस कॉन्ट्रैक्ट) पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिनके अधीन कर्मचारियों को सीधे मांस कंपनियों द्वारा नहीं, बल्कि ठेकेदारों द्वारा नियोजित किया जाता था।
	
	मांस कंपनियों द्वारा अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की इस प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त किया जाना था। जर्मनी के सबसे अधिक जनसंख्या वाले नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया राज्य के श्रममंत्री, कार्ल-योज़ेफ लाउमान ने उस समय मांस उद्योग की स्थिति को संगठित गैरजि़म्मेदा के रूप में वर्णित किया था।
	
	किंतु उन्हीं लाउमान को आज के कानूनी ढांचे में बदलाव का कोई कारण नहीं दिखता। वे कहते हैं, यदि (विदेशी) कर्मचारियों को योग्य रोज़गार नहीं दिया जाता या उनके आने के बाद उन्हें वेतन नहीं दिया जाता, तो यह कानून का उल्लंघन है लेकिन इस उल्लंघन को रोकने के लिए क़ानून में किसी संशोधन की या कोई नया क़ानून बनाने की आवश्कता वे नहीं देखते।

जर्मनी के मांस उद्योग में कर्मचारियों की भारी कमी है। भारत, चीन और वियतनाम जैसे देशों से नए कर्मचारी भर्ती किए जा रहे हैं, पर नौकरी के नाम पर उनसे भारी रकमें वसूली जाती हैं। कर्ज़ में डूबे विदेशी श्रमिक जर्मनी पहुंचने पर बहुत दयनीय परिस्थितियों में रहने और काम करने के लिए विवश हो जाते हैं।

वे अधिकतर भारत और वियतनाम जैसे तृतीय देशों के ऐसे युवा पुरुष हैं, जो रोज़गार पाने की लालच में जर्मनी जाते हैं। जर्मनी में कोई काम-धंधा पाने की संभावना उन देशों के लोगों को विशेष रूप से आकर्षित करती है, जहां जर्मनी की तुलना में बहुत कम वेतन मिलते हैं किंतु यूरोप के इस संपन्न देश में रहने और कमाने का सपना, भारत, चीन या वियतनाम जैसे देशों के लोगों के लिए एक भयावह छलावा सिद्ध होने लगा है : प्रायः वे नौकरी दिलाने वाली बिचौलिया एजेंसियों पर निर्भरता की शोषणकारी जटिलताओं में फंस जाते हैं।

 

बिचौलिया एजेंसिंया चार से पांच अंकों वाली फ़ीस मांगती हैं

जर्मनी में नौकरी दिलाने वाली बिचौलिया एजेंसिंया, कुशलकर्मी या मौसमी कामगारों वाले वीज़ा पर जर्मनी जाने से पहले, भावी नौकरियों के लिए चार से पांच अंकों वाली एक फ़ीस मांगती हैं। यह फ़ीस अधिकतर ऐसे कर्ज़ के रूप में होती है, जिसे चुकाने के लिए जर्मनी में कभी-कभी वर्षों तक काम करना पड़ सकता है। जर्मनी का सबसे बड़ा सार्वजनिक टेलीविज़न प्रसारक है। उसकी राजनीतिक पत्रिका 'मॉनिटर' द्वारा भारत और वियतनाम में की गई एक जांच से पता चला है कि जर्मन मांस उद्योग के लिए एशिया में कर्मचारी चुनने वाली एजेंसियां, लगातार सस्ते श्रमिकों को यूरोप की ओर आकर्षित कर रही हैं और खूब कमाई कर रही हैं।

जर्मनी में मांस उद्योग की एक बड़ी और नामी कंपनी है। उसमें काम करने के लिए पिछले साल भारत के केरल राज्य से जर्मनी आए एक युवक ने 'मॉनिटर' को बतायाः मेरे लिए मेरे परिवार ने अपना सारा सोना बेच दिया। यह कोई अकेला मामला नहीं है। जर्मनी पहुंचे कई कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें इस कंपनी में नौकरी पाने के लिए ऊंची रकमें चुकानी पड़ी हैं। यह शिकायत करने वालों में भारतीय ही नहीं, वियतनामी भी शामिल हैं।

वियतनामियों में से एक ने कहाः  हमारी शादी के बाद मेरे और मेरी पत्नी के पास कुछ पैसे बचे थे। बाकी पैसे मैंने पड़ोसियों, रिश्तेदारों और भाई-बहनों से उधार लिए। कंपनी ने स्वीकार किया है कि एशिया में नए कर्मचारियों की भर्ती करने वाली एजेंसियों ने 15,000 यूरो (1 यूरो=111रुपए) तक का शुल्क वसूला है। कंपनी ने कहा कि मांगी

गई रकमें उसके अपने मूल्यों के बिल्कुल विपरीत है। हम इस प्रथा की कड़ी निंदा करते हैं; एक नियोक्ता के रूप में अपने कर्मचारियों के साथ खड़े हैं।

भर्ती कुशलकर्मी के तौर पर वेतन अकुशल श्रमिकों जैसा

जर्मनी जाने का कुशलकर्मी वीज़ा पाने के लिए श्रमिकों को अपनी शैक्षणिक योग्यता प्रमाणित करनी होती है, तभी वे जर्मनी में कसाई के रूप में काम कर सकते हैं। इस योग्यता के लिए कसाई बनने का बाक़ायदा मान्यता प्राप्त शिक्षण-प्रशिक्षण मिला होना चाहिए। हालांकि जांची गई वेतन पर्चियों से पता चला कि कंपनी में उन्हें केवल उत्पादन सहायक के तौर पर वेतन दिया जाता है। पूछताछ करने पर कंपनी का कहना था कि वह सभी कानूनी नियमों का पालन करती है।

कहने के लिए तो कसाई का काम करने वाले श्रमिकों को प्रति घंटे 14.50 यूरो के हिसाब से पूरे महीने प्रतिदिन 8 घंटे काम के लिए कुल मिलाकर 2320 यूरो वेतन मिलना चाहिए, पर जर्मनी में लागू आयकर तथा स्वास्थ्य, पेंशन, बेरोज़गारी, नर्सिंग और दुर्घटना जैसे समयों के लिए अनिवार्य बीमा नियमों के कारण महीने के अंत में 1700 यूरो ही मिल सकते हैं। मांस उद्योग के श्रमिकों के आवास के किराए और परिवहन आदि का ख़र्च काट कर अंत में उन्हें 1300 यूरो के आसपास ही वेतन मिल पाता है।

किसी भी समय बर्ख़ास्तगी

एक पत्रकार जर्मन मांस उत्पादी कंपनियों के लिए श्रमिकों की भर्ती करने वाली दक्षिणी जर्मनी की एक एजेंसी के साथ अपनी पहचान छिपाते हुए हफ्तों तक गोपनीय संपर्क बनाए रखने में सफल रहे। अतीत में वह एजेंसी कंपनी के लिए भी अन्य देशों देशों से 100 से अधिक लोगों की भर्ती कर चुकी है। गोपनीय पत्रकारों से बातचीत में इस दूसरी एजेसी के प्रबंध-निदेशक ने बताया कि तीसरे देशों से आए श्रमिकों को किसी भी समय (यहां तक कि परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के बाद भी) बर्ख़ास्त किया जा सकता है।

अन्य देशों में सस्ते श्रमिकों की भर्ती करने वाली इस दूसरी एजेंसी के ग्राहकों में मांस उद्योग की अन्य कंपनियां भी शामिल थीं, जिनमें जर्मन मांस उद्योग की दिग्गज कंपनी भी शामिल है। इस कंपनी का कहना है कि उसके यहां श्रमिकों की भर्ती पूरी तरह से कानून के अनुसार की जाती है। उसके कहने के अनुसार, भारत से भर्ती किए गए उसके सभी श्रमिक आज भी काम कर रहे हैं।

बीमारी के कारण भी बर्ख़ास्तगी?

अन्य भारतीय श्रमिकों ने बताया कि उन्हें परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के दौरान बीमारी के कारण बर्खास्त कर दिया गया। इस नियुक्ति प्रणाली में नियोक्ता अक्सर आवास भी प्रदान करता है और किराया सीधे श्रमिकों के वेतन से काट लेता है, इसलिए उन्हें अपने रहने-सोने के कमरे भी खाली करने पड़े। एक पूछताछ के जवाब में कहा कि अतीत में कुछ मामलों में कर्मचारियों के साथ सहयोग समाप्त कर दिया गया है।

कंपनी की नई योजना विशेष रूप से प्रभावित कर्मचारियों के लिए वित्तीय सहायता पैकेज स्थापित कर की है। अपनी जांच में पाया कि कंपनी ने वियतनाम में भर्ती किए गए कर्मचारियों से खुद भर्ती शुल्क वसूला था। कंपनी ने माना कि अस्थाई रूप से ऐसा भी हुआ है, लेकिन ऐसा वियतनाम में प्रचलित और कानूनी रूप से मान्य नियमों का पालन करते हुए हुआ। वे शुल्क उचित और न्यायसंगत थे। उनमें अन्य बातों के अलावा जर्मन भाषा के पाठ्यक्रम का ख़र्च भी शामिल था।

 

मानवीय गरिमा का उल्लंघन

जर्मन मांस उद्योग अतीत में अपने श्रमिकों के शोषण और उनकी भर्ती के लिए ठेकेदारों को माध्यम बनाने के कारण सुर्खियों में रहा है। उस समय सुधार के कई वादे किए गए थे। राजनेताओं ने कड़े कानून बनाकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। इस क्षेत्र में ऐसे तथाकथित सेवा-अनुबंधों (सर्विस कॉन्ट्रैक्ट) पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिनके अधीन कर्मचारियों को सीधे मांस कंपनियों द्वारा नहीं, बल्कि ठेकेदारों द्वारा नियोजित किया जाता था।

मांस कंपनियों द्वारा अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की इस प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त किया जाना था। जर्मनी के सबसे अधिक जनसंख्या वाले नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया राज्य के श्रममंत्री, कार्ल-योज़ेफ लाउमान ने उस समय मांस उद्योग की स्थिति को संगठित गैरजि़म्मेदा के रूप में वर्णित किया था।

किंतु उन्हीं लाउमान को आज के कानूनी ढांचे में बदलाव का कोई कारण नहीं दिखता। वे कहते हैं, यदि (विदेशी) कर्मचारियों को योग्य रोज़गार नहीं दिया जाता या उनके आने के बाद उन्हें वेतन नहीं दिया जाता, तो यह कानून का उल्लंघन है लेकिन इस उल्लंघन को रोकने के लिए क़ानून में किसी संशोधन की या कोई नया क़ानून बनाने की आवश्कता वे नहीं देखते।

">जर्मन मांस उद्योग में नौकरियों का गोरख धंधा, भारतीय भी प्रभावित
	
		
			
	
	जर्मनी के मांस उद्योग में कर्मचारियों की भारी कमी है। भारत, चीन और वियतनाम जैसे देशों से नए कर्मचारी भर्ती किए जा रहे हैं, पर नौकरी के नाम पर उनसे भारी रकमें वसूली जाती हैं। कर्ज़ में डूबे विदेशी श्रमिक जर्मनी पहुंचने पर बहुत दयनीय परिस्थितियों में रहने और काम करने के लिए विवश हो जाते हैं।
	
	वे अधिकतर भारत और वियतनाम जैसे तृतीय देशों के ऐसे युवा पुरुष हैं, जो रोज़गार पाने की लालच में जर्मनी जाते हैं। जर्मनी में कोई काम-धंधा पाने की संभावना उन देशों के लोगों को विशेष रूप से आकर्षित करती है, जहां जर्मनी की तुलना में बहुत कम वेतन मिलते हैं किंतु यूरोप के इस संपन्न देश में रहने और कमाने का सपना, भारत, चीन या वियतनाम जैसे देशों के लोगों के लिए एक भयावह छलावा सिद्ध होने लगा है : प्रायः वे नौकरी दिलाने वाली बिचौलिया एजेंसियों पर निर्भरता की शोषणकारी जटिलताओं में फंस जाते हैं।

	 

	बिचौलिया एजेंसिंया चार से पांच अंकों वाली फ़ीस मांगती हैं

	जर्मनी में नौकरी दिलाने वाली बिचौलिया एजेंसिंया, कुशलकर्मी या मौसमी कामगारों वाले वीज़ा पर जर्मनी जाने से पहले, भावी नौकरियों के लिए चार से पांच अंकों वाली एक फ़ीस मांगती हैं। यह फ़ीस अधिकतर ऐसे कर्ज़ के रूप में होती है, जिसे चुकाने के लिए जर्मनी में कभी-कभी वर्षों तक काम करना पड़ सकता है। जर्मनी का सबसे बड़ा सार्वजनिक टेलीविज़न प्रसारक है। उसकी राजनीतिक पत्रिका 'मॉनिटर' द्वारा भारत और वियतनाम में की गई एक जांच से पता चला है कि जर्मन मांस उद्योग के लिए एशिया में कर्मचारी चुनने वाली एजेंसियां, लगातार सस्ते श्रमिकों को यूरोप की ओर आकर्षित कर रही हैं और खूब कमाई कर रही हैं।
	
	जर्मनी में मांस उद्योग की एक बड़ी और नामी कंपनी है। उसमें काम करने के लिए पिछले साल भारत के केरल राज्य से जर्मनी आए एक युवक ने 'मॉनिटर' को बतायाः मेरे लिए मेरे परिवार ने अपना सारा सोना बेच दिया। यह कोई अकेला मामला नहीं है। जर्मनी पहुंचे कई कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें इस कंपनी में नौकरी पाने के लिए ऊंची रकमें चुकानी पड़ी हैं। यह शिकायत करने वालों में भारतीय ही नहीं, वियतनामी भी शामिल हैं।
	
	वियतनामियों में से एक ने कहाः  हमारी शादी के बाद मेरे और मेरी पत्नी के पास कुछ पैसे बचे थे। बाकी पैसे मैंने पड़ोसियों, रिश्तेदारों और भाई-बहनों से उधार लिए। कंपनी ने स्वीकार किया है कि एशिया में नए कर्मचारियों की भर्ती करने वाली एजेंसियों ने 15,000 यूरो (1 यूरो=111रुपए) तक का शुल्क वसूला है। कंपनी ने कहा कि मांगी

	गई रकमें उसके अपने मूल्यों के बिल्कुल विपरीत है। हम इस प्रथा की कड़ी निंदा करते हैं; एक नियोक्ता के रूप में अपने कर्मचारियों के साथ खड़े हैं।

	भर्ती कुशलकर्मी के तौर पर वेतन अकुशल श्रमिकों जैसा

	जर्मनी जाने का कुशलकर्मी वीज़ा पाने के लिए श्रमिकों को अपनी शैक्षणिक योग्यता प्रमाणित करनी होती है, तभी वे जर्मनी में कसाई के रूप में काम कर सकते हैं। इस योग्यता के लिए कसाई बनने का बाक़ायदा मान्यता प्राप्त शिक्षण-प्रशिक्षण मिला होना चाहिए। हालांकि जांची गई वेतन पर्चियों से पता चला कि कंपनी में उन्हें केवल उत्पादन सहायक के तौर पर वेतन दिया जाता है। पूछताछ करने पर कंपनी का कहना था कि वह सभी कानूनी नियमों का पालन करती है।
	
	कहने के लिए तो कसाई का काम करने वाले श्रमिकों को प्रति घंटे 14.50 यूरो के हिसाब से पूरे महीने प्रतिदिन 8 घंटे काम के लिए कुल मिलाकर 2320 यूरो वेतन मिलना चाहिए, पर जर्मनी में लागू आयकर तथा स्वास्थ्य, पेंशन, बेरोज़गारी, नर्सिंग और दुर्घटना जैसे समयों के लिए अनिवार्य बीमा नियमों के कारण महीने के अंत में 1700 यूरो ही मिल सकते हैं। मांस उद्योग के श्रमिकों के आवास के किराए और परिवहन आदि का ख़र्च काट कर अंत में उन्हें 1300 यूरो के आसपास ही वेतन मिल पाता है।

	किसी भी समय बर्ख़ास्तगी

	एक पत्रकार जर्मन मांस उत्पादी कंपनियों के लिए श्रमिकों की भर्ती करने वाली दक्षिणी जर्मनी की एक एजेंसी के साथ अपनी पहचान छिपाते हुए हफ्तों तक गोपनीय संपर्क बनाए रखने में सफल रहे। अतीत में वह एजेंसी कंपनी के लिए भी अन्य देशों देशों से 100 से अधिक लोगों की भर्ती कर चुकी है। गोपनीय पत्रकारों से बातचीत में इस दूसरी एजेसी के प्रबंध-निदेशक ने बताया कि तीसरे देशों से आए श्रमिकों को किसी भी समय (यहां तक कि परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के बाद भी) बर्ख़ास्त किया जा सकता है।
	
	अन्य देशों में सस्ते श्रमिकों की भर्ती करने वाली इस दूसरी एजेंसी के ग्राहकों में मांस उद्योग की अन्य कंपनियां भी शामिल थीं, जिनमें जर्मन मांस उद्योग की दिग्गज कंपनी भी शामिल है। इस कंपनी का कहना है कि उसके यहां श्रमिकों की भर्ती पूरी तरह से कानून के अनुसार की जाती है। उसके कहने के अनुसार, भारत से भर्ती किए गए उसके सभी श्रमिक आज भी काम कर रहे हैं।

	बीमारी के कारण भी बर्ख़ास्तगी?

	अन्य भारतीय श्रमिकों ने बताया कि उन्हें परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के दौरान बीमारी के कारण बर्खास्त कर दिया गया। इस नियुक्ति प्रणाली में नियोक्ता अक्सर आवास भी प्रदान करता है और किराया सीधे श्रमिकों के वेतन से काट लेता है, इसलिए उन्हें अपने रहने-सोने के कमरे भी खाली करने पड़े। एक पूछताछ के जवाब में कहा कि अतीत में कुछ मामलों में कर्मचारियों के साथ सहयोग समाप्त कर दिया गया है।
	
	कंपनी की नई योजना विशेष रूप से प्रभावित कर्मचारियों के लिए वित्तीय सहायता पैकेज स्थापित कर की है। अपनी जांच में पाया कि कंपनी ने वियतनाम में भर्ती किए गए कर्मचारियों से खुद भर्ती शुल्क वसूला था। कंपनी ने माना कि अस्थाई रूप से ऐसा भी हुआ है, लेकिन ऐसा वियतनाम में प्रचलित और कानूनी रूप से मान्य नियमों का पालन करते हुए हुआ। वे शुल्क उचित और न्यायसंगत थे। उनमें अन्य बातों के अलावा जर्मन भाषा के पाठ्यक्रम का ख़र्च भी शामिल था।

	 

	मानवीय गरिमा का उल्लंघन

	जर्मन मांस उद्योग अतीत में अपने श्रमिकों के शोषण और उनकी भर्ती के लिए ठेकेदारों को माध्यम बनाने के कारण सुर्खियों में रहा है। उस समय सुधार के कई वादे किए गए थे। राजनेताओं ने कड़े कानून बनाकर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। इस क्षेत्र में ऐसे तथाकथित सेवा-अनुबंधों (सर्विस कॉन्ट्रैक्ट) पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिनके अधीन कर्मचारियों को सीधे मांस कंपनियों द्वारा नहीं, बल्कि ठेकेदारों द्वारा नियोजित किया जाता था।
	
	मांस कंपनियों द्वारा अपनी ज़िम्मेदारी से बचने की इस प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त किया जाना था। जर्मनी के सबसे अधिक जनसंख्या वाले नॉर्थ राइन-वेस्टफेलिया राज्य के श्रममंत्री, कार्ल-योज़ेफ लाउमान ने उस समय मांस उद्योग की स्थिति को संगठित गैरजि़म्मेदा के रूप में वर्णित किया था।
	
	किंतु उन्हीं लाउमान को आज के कानूनी ढांचे में बदलाव का कोई कारण नहीं दिखता। वे कहते हैं, यदि (विदेशी) कर्मचारियों को योग्य रोज़गार नहीं दिया जाता या उनके आने के बाद उन्हें वेतन नहीं दिया जाता, तो यह कानून का उल्लंघन है लेकिन इस उल्लंघन को रोकने के लिए क़ानून में किसी संशोधन की या कोई नया क़ानून बनाने की आवश्कता वे नहीं देखते।

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