नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। आईएएस अधिकारी वंदना वैद्य के फार्म हाउस पर जुआ पकड़ने वाले मानपुर थाना प्रभारी लोकेंद्रसिंह हिहोरे के निलंबन को हाई कोर्ट ने निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने निलंबन की कार्रवाई को पक्षपातपूर्ण बताते हुए कहा कि इस तरह से कार्रवाई होगी तो कोई काम नहीं करेगा।
23 पेज के फैसले में कोर्ट ने कहा है कि शासन ने जो जवाब दिया, उसमें घटना स्थल को बदलने के लिए दबाव डालने के आरोप पर कोई बात नहीं कही गई। यह थाना प्रभारी द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि करता है।
10 और 11 मार्च 2026 की रात आइएएस अधिकारी मप्र वित्त निगम की एमडी वंदना वैद्य के फार्म हाउस पर जुआ खेलते हुए कुछ लोगों को मानपुर पुलिस ने पकड़ा था। इस घटना के अगले ही दिन 11 मार्च को वरिष्ठ अधिकारियों ने कार्रवाई करते हुए मानपुर थाना प्रभारी लोकेंद्रसिंह हिहोरे और दो एसआइ को निलंबित कर दिया।
18 मार्च को हिहोरे का मुख्यालय इंदौर से बदलकर बुरहानपुर कर दिया गया। हिहोरे ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की। कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था जो गुरुवार को जारी हुआ। कोर्ट ने थाना प्रभारी के निलंबन को मनमाना और प्रतिशोधात्मक मानते हुए इसे निरस्त कर दिया।
कोर्ट ने कहा है कि निलंबन आदेश को जारी रहने दिया गया, तो कोई भी अधिकारी निलंबन के भय से किसी परिसर पर छापा मारने का साहस नहीं करेगा। हालांकि कोर्ट ने अधिकारियों से कहा है कि वे निर्धारित प्रक्रिया अनुसार आवश्यक हो तो आगे उपयुक्त कार्रवाई कर सकेंगे।
कोर्ट की पुलिस को लेकर की टिप्पणी
कोर्ट ने पुलिस को लेकर कहा है कि मामले में स्पष्ट है कि विवादित निलंबन आदेश गंभीर त्रुटियों से ग्रसित है। निलंबन कथित कृत्य अथवा चूक की तुलना में पूर्णत: असंगत एवं अनुपातहीन है। एसपी ने निलंबन के आदेश में लिखा कि थाना क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर जुआ पकड़ने से स्पष्ट है कि
थाना प्रभारी वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन करने में असफल रहे हैं। यह उनके कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाही एवं संदिग्ध आचरण को प्रदर्शित करता है, जबकि यह बात रिकार्ड पर है कि थाना प्रभारी ने मुखबिर की सूचना पर त्वरित कार्रवाई की, तलाशी वारंट प्राप्त किया, स्वतंत्र गवाहों को साथ लिया और बड़े पैमाने पर चल रहे जुए के संचालन पर छापा मारा।
कानून को लागू करने वाले अधिकारी को त्वरित, कुशल एवं कानून सम्मत कर्तव्य पालन करने पर दंडित करना गंभीर कदाचार की अवधारणा के सर्वथा विपरीत है। यह न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोरता है और अधिकारियों की दुर्भावना की ओर संकेत करता है।
कोर्ट ने कहा कि बाहरी दबाव के बावजूद थाना प्रभारी ने पूर्ण निष्ठा का परिचय देते हुए एफआइआर में वास्तविक तथ्यों को दर्ज कराया, लेकिन अगले ही दिन उनका निलंबन आदेश जारी कर दिया गया। साथ ही एक ऐसे एसआइ को निलंबित किया गया जो चिकित्सीय अवकाश पर था। दूसरी तरफ सिमरोल थाना प्रभारी के साथ समान परिस्थितियों में अलग व्यवहार किया गया यह बताता है कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध प्रतिशोधात्मक मानसिकता से कार्रवाई की गई।
सामान्यत: कोर्ट निलंबन आदेशों में हस्तक्षेप नहीं करती, लेकिन इस मामले में याचिकाकर्ता ने गंभीर आरोप लगाया है कि उस पर अपराध स्थल बदलने के लिए दबाव बनाया गया था। शासन इसका खंडन भी नहीं कर सका है। ऐसी स्थिति में न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह हस्तक्षेप करे।
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