भोजशाला को लेकर जैन समाज की तरफ से भी याचिका लगाई गई थी और कहा था कि लंदन में रखी मूर्ति मां सरस्वती की नहीं बल्कि जैन समाज की अराध्य अंबिका देवी की है। कोर्ट ने जैन समाज की याचिका को लेकर कहा कि अंबिका देवी की मूर्ति के दावे से उस परिसर को जैन मंदिर घोषित नहीं किया जा सकता है। प्रतिमा अंबिका की है या सरस्वती की। इस तर्क से यह साबित नहीं होता कि भोजशाला जैन मंदिर थी,क्योंकि हमारे समक्ष ऐतिहासिक साहित्य, स्थापत्य विशेषताओं या एएसआई सर्वेक्षण के माध्यम से ऐसा कोई सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई है जिससे यह संकेत मिले कि विवादित क्षेत्र जैन मंदिर था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में जैन धर्म और हिंदू धर्म अलग-अलग इकाइयां नहीं हैं। इन दोनों धर्मों में पूजा-पद्धति भिन्न हो सकती है, लेकिन प्राचीन काल से दोनों की आस्थाएं साथ-साथ विकसित हुई हैं। ये एक ही परम सत्ता की उपासना करती रही हैं। परिणामस्वरूप जैन और हिंदू परंपराओं से संबंधित मूर्तियां अक्सर एक-दूसरे के मंदिरों में पाई जाती हैं।
कोर्ट ने अपने फैसले में मध्य प्रदेश के रतलाम के एक जैन मंदिर का हवाला दिया। जिसमें शिवलिंग के रूप में भगवान शिव तथा भगवान गणेश की मूर्तियां स्थापित हैं। इसका कानूनी आधार हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 2(1) (ए) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2(1) में स्थापित है, जहां जैन धर्म और बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म का हिस्सा माना गया है। इसलिए उत्खनन के दौरान विवादित परिसर में जैन तीर्थंकर की प्रतिमा का मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध विभिन्न दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर यह तथ्य स्थापित होता है कि ब्रिटिश अधिकारियों ने प्रतिमा के महत्व को पहचानते हुए धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर के निकट मिली दो मूर्तियों को हटाकर सुरक्षित रखा था, जो वर्तमान में लंदन के एक संग्रहालय में रखी गई हैं।
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कोर्ट ने अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन द्वारा कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेज का हवाला देते हुए कहा कि वाग्देवी की प्रतिमा की फोटो में प्रतिमा को अंबिका नाम से संबोधित किया गया है। कोर्ट ने अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा कि वररुचि नाम उस प्रतिमा के शिल्पकार के रुप में अंकित है। वह परमार राज्य का एक अधिकारी था। उसने दो प्रतिमाएँ बनाई थीं एक वाग्देवी की और दूसरी अंबा की। दोनों ही स्वरूप सरस्वती देवी की दिव्यता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वाग्देवी की प्रतिमा में देवी सरस्वती के अलावा अन्य आकृतियां भी दर्शाई गई हैं। इन अन्य छोटी मूर्तियों को जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ बताया जा रहा है, किंतु इसके समर्थन में कोई प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। वाग्देवी प्रतिमा के निचले भाग में भगवान गणेश की प्रतिमा और सिंह पर विराजमान देवी दुर्गा की आकृति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसलिए अब देवी सरस्वती (वाग्देवी) की प्रतिमा के साथ देवी दुर्गा और भगवान गणेश की मूर्तियों की उपस्थिति पर विचार करना उचित होगा।हिंदू पौराणिक कथाओं और परंपरा के अनुसार, देवी सरस्वती का भगवान गणेश और देवी दुर्गा के साथ गहरा और बहुआयामी संबंध है। कोर्ट ने इन तथ्यों को आधार मानकर जैन समाज की याचिका खारिज की है।
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