निर्णय के एक महत्वपूर्ण हिस्से में कोर्ट ने कहा है कि किसी देवता, धार्मिक ट्रस्ट या पूजा स्थल की सुरक्षा केवल ट्रस्टियों या प्रबंधन तक सीमित विषय नहीं …और पढ़ें
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्णय में कई टिप्पणियां ऐसी हैं जो नए उदाहरण स्थापित कर रही हैं। निर्णय के एक महत्वपूर्ण हिस्से में कोर्ट ने कहा है कि किसी देवता, धार्मिक ट्रस्ट या पूजा स्थल की सुरक्षा केवल ट्रस्टियों या प्रबंधन तक सीमित विषय नहीं है। श्रद्धालु और भक्त भी ऐसे मामलों में अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
विपक्षी तर्क खारिज: याचिकाकर्ताओं की पात्रता पर कोर्ट का रुख
दरअसल, अप्रैल और मई में 24 दिन चली नियमित सुनवाई के दौरान अपीलार्थी काजी जकुल्ला की ओर से अधिवक्ता शोभा मेनन ने मंदिर पक्ष की ओर से याचिकाकर्ता बने लोगों पर सवाल उठाया था। उन्होंने सवाल किया था कि वे किस आधार पर याचिकाकर्ता बने हैं। उनका कहना था कि याचिकाकर्ता मूल रूप से प्रदेश के बाहर के निवासी हैं। धार से उनका कोई लेना-देना नहीं है। एडवोकेट मेनन के इस तर्क को निरस्त करते हुए हाई कोर्ट ने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सिद्धांतों का हवाला दिया है।
धार्मिक परंपरा में देवता का स्वरूप और श्रद्धालुओं की भूमिका
कोर्ट ने फैसले में कहा कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में विवाद को सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं रखा जा सकता कि कोर्ट में याचिका लगाने का अधिकार किसके पास है। अगर मामला किसी देवता, धार्मिक उद्देश्य या पूजा स्थल की रक्षा से जुड़ा हो, तो श्रद्धालुओं और भक्तों की चिंता भी महत्वपूर्ण मानी जाएगी। कोर्ट ने फैसले में कहा है कि हिंदू धार्मिक परंपरा में देवता को केवल प्रतिमा नहीं, बल्कि एक वैधानिक और धार्मिक इकाई के रूप में भी देखा जाता है। इसी कारण धार्मिक स्थल के संरक्षण से जुड़े मामलों में श्रद्धालुओं की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आस्था, परंपरा और भविष्य के मामलों के लिए नया संदर्भ
अदालत ने यह भी कहा कि कई बार धार्मिक स्थलों के विवाद वर्षों पुराने होते हैं और ऐसे मामलों में केवल दस्तावेजी स्वामित्व या तकनीकी पहलुओं के आधार पर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। हाई कोर्ट ने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि अदालतों को यह देखना होता है कि किसी स्थल के प्रति समुदाय की आस्था, पूजा की परंपरा और धार्मिक विश्वास कितने लंबे समय से जुड़े रहे हैं। फैसले में यह टिप्पणी उस दौरान दर्ज की गई, जब भोजशाला परिसर के धार्मिक स्वरूप, पूजा-अधिकार और ऐतिहासिक दावों को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रख रहे थे। फैसले के बाद अब कानून विशेषज्ञ इस हिस्से को महत्वपूर्ण मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह केवल भोजशाला विवाद तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य में धार्मिक स्थलों से जुड़े अन्य मामलों में भी संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।
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