भोजशाला की प्रतिमा लंदन के म्युजियम में रखी हुई और इसे वापस लाने की मांग की जा रही है। राजा भोज के कार्यकाल में संस्कृति, कला, साहित्य पर काफी काम हुआ …और पढ़ें
HighLights
- 11वीं सदी में राजा भोज के कार्यकाल में संस्कृति, कला, साहित्य पर काफी काम हुआ था
- भोजशाला की प्रतिमा फिलहाल लंदन के म्युजियम में रखी हुई है
- राजा भोज के राज्य का विस्तार गुजरात व राजस्थान तक भी था
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भोजशाला पर हाई कोर्ट के फैसले के बाद मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा को लेकर चर्चा तेज हो गई है। धार भोजशाला की प्रतिमा फिलहाल लंदन के म्युजियम में रखी हुई और इसे भोजशाला में वापस लाने की मांग की जा रही है। 11वीं सदी में राजा भोज के कार्यकाल में संस्कृति, कला, साहित्य पर काफी काम हुआ था।
इसी का परिणाम था कि उस काल में कई शिल्प कलाकृतियों के साथ मूर्तियों को निर्माण हुआ था। इसी के तहत भोजशाला में अध्ययन केंद्र बना और सरस्वती प्रतिमा भी बनी। राजा भोज के राज्य का विस्तार गुजरात व राजस्थान तक भी था। यही वजह है कि उस काल में इस हिस्से में अलग-अलग स्थानों पर देवी प्रतिमाओं का निर्माण हुआ था। इंदौर के केंद्रीय संग्रहालय में राज भोज के काल में 11 वी सदी में बनी दो सरस्वती प्रतिमाएं रखी हुई है।
ये प्रतिमाएं मंदसौर के हिंगलाजगढ़ किले से मिली थी
ये प्रतिमाएं मंदसौर के हिंगलाजगढ़ किले से मिली थी। परमारकालीन कला शैली में निर्मित इन प्रतिमाओं में देवी सरस्वती को बैठे हुए स्वरूप में दर्शाया गया है। प्रतिमाओं में उनके हाथों में नारदीय वीणा भी दिखाई देती है, जो उस दौर की कलात्मक बारीकी और सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है।
परमारकालीन मूर्तिकला और ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती हैं
वहीं धार भोजशाला से जुड़ी मां वाग्देवी की प्रसिद्ध प्रतिमा, जो वर्तमान में लंदन के संग्रहालय में संरक्षित है, उसमें देवी सरस्वती की द्विभंग मुद्रा का स्वरूप दिखाई देता है। इस तरह इंदौर संग्रहालय की प्रतिमाएं और भोजशाला की वाग्देवी प्रतिमा, दोनों परमारकालीन मूर्तिकला और ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती हैं। वही केंद्रीय संग्रहालय में रखी एक अन्य सरस्वती मूर्ति भी है। यह 12वीं सदी में परमार काल की बनी हुई है। यह भी हिंगलाजगढ़ के किले से मिली है।
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