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सुगम्य इंदौर में 40 प्रतिशत भवनों में नहीं है रैम्प, जहां है वहां 55 प्रतिशत असुरक्षित, दिव्यांगजन परेशान

सुगम्य इंदौर में 40 प्रतिशत भवनों में नहीं है रैम्प, जहां है वहां 55 प्रतिशत असुरक्षित, दिव्यांगजन परेशान

जिन सरकारी कार्यालयों, स्कूल-कालेजों और सार्वजनिक भवनों को दिव्यांगजनों के लिए सबसे अधिक अनुकूल होना चाहिए, वहां प्रवेश से लेकर शौचालय तक बुनियादी सुव …और पढ़ें

Publish Date: Thu, 04 Jun 2026 08:42:19 AM (IST)Updated Date: Thu, 04 Jun 2026 08:42:19 AM (IST)

कई ‍सरकारी कार्यालयों में नहीं है दिव्यांगों के लिए सुविधा। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. 913 भवनों में दिव्यांगो की सुविधाओं का सर्वे, 71 प्रतिशत में व्हीलचेयर नहीं मिली
  2. 363 में दिव्यांगों के लिए रैम्प नहीं, 300 में सुरक्षित रेलिंग नहीं मिले
  3. 651 भवनों में व्हीलचेयर नहीं मिली, 262 भवनों में ही व्हीलचेयर मौजूद मिली

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। प्रदेश में समावेशी शिक्षा और दिव्यांग अधिकारों के बड़े-बड़े दावों के बीच इंदौर जिले की सुगम्य भारत अभियान रिपोर्ट ने सरकारी दावों की जमीन हकीकत उजागर कर दी है। जिन सरकारी कार्यालयों, स्कूल-कालेजों और सार्वजनिक भवनों को दिव्यांगजनों के लिए सबसे अधिक अनुकूल होना चाहिए, वहां प्रवेश से लेकर शौचालय तक बुनियादी सुविधाओं का अभाव दिखा। स्थिति ऐसी है कि कई भवनों में दिव्यांग व्यक्ति के लिए पहुंचना ही चुनौती बना हुआ है।

जिले में 1125 शासकीय और सार्वजनिक भवनों के सर्वे के लिए 29 निरीक्षण दल बनाए गए थे। अब तक 913 भवनों का निरीक्षण हुआ है, यानी करीब 81 प्रतिशत काम पूरा हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक 40 प्रतिशत भवनों में रैम्प ही नहीं मिले। 913 में से 363 भवन ऐसे है, जहां दिव्यांगजन व्हीलचेयर या सहारे के बिना प्रवेश तक नहीं कर सकते। हालांकि 550 भवनों में रैम्प बने मिले, लेकिन यहां भी तस्वीर राहत देने वाली नहीं है। इनमें से 300 रैम्प यानी 55 प्रतिशत में रेलिंग सुरक्षित नहीं है। यानी करोड़ों की लागत से बनी सुविधाएं सुरक्षा मानकों पर खरी नहीं उतर रहीं।

71 प्रतिशत में व्हीलचेयर नहीं

जिले के 71 प्रतिशत भवनों में व्हीलचेयर उपलब्ध नहीं मिली। सिर्फ 262 भवनों में व्हीलचेयर व्यवस्था है, जबकि 651 परिसरों में दिव्यांग व्यक्ति को अपनी व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ेगा। शौचालयों की हालत भी चिंताजनक है। 913 भवनों में केवल 354 में सुलभ शौचालय हैं, जबकि व्हीलचेयर अनुकूल शौचालय सिर्फ 255 भवनों में पाए गए।

तकनीकी सूचना की सुविधा भी अधूरी

तकनीकी और सूचना संबंधी सुविधाओं की तस्वीर और भी खराब है। दृष्टिबाधितों के लिए ब्रेल सूचना पट्ट केवल 35 भवनों में मिले, यानी 96 प्रतिशत परिसरों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। श्रवण बाधितों के लिए साइन लैंग्वेज सुविधा सिर्फ 31 भवनों तक सीमित रही। टैक्टाइल पथ केवल 88 भवनों में मिला, जबकि कई बहुमंजिला परिसरों में लिफ्ट सुविधा का भी अभाव पाया गया।

जनजातीय कार्य विभाग पिछड़ा

निरीक्षण की गति में भी असमानता दिखी। शिक्षा विभाग ने लक्ष्य से अधिक काम कर 103 प्रतिशत उपलब्धि दर्ज की, लेकिन जनजातीय कार्य विभाग 87 भवनों के लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ 2 निरीक्षण ही कर सका। वहीं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय 85 परिसरों में से केवल 38 का निरीक्षण कर पाया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब शिक्षा संस्थान ही समय पर सर्वे नहीं करेंगे तो समावेशी शिक्षा का दावा कितना व्यावहारिक है।

ये है वास्तविकता

  • 363 में दिव्यांगों के लिए रैम्प नहीं
  • 300 में सुरक्षित रेलिंग नहीं मिले
  • 651 भवनों में व्हीलचेयर नहीं मिली
  • 262 भवनों में ही व्हीलचेयर मौजूद मिली
  • व्हीलचेयर अनुकूल शौचालय केवल 255
  • दृष्टिबाधितों के लिए 35 भवनों में ब्रेल सुविधा
  • श्रवण बाधितों के लिए 31 भवनों में साइन लैंग्वेज सुविधा
  • 913 भवनों का निरीक्षण हुआ, 311 भवनों की जांच बाकी

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