शहर में हरित क्षेत्र घटने लगा है। तय मापदंड के आधार पर शहर में तीस फीसद हिस्से में हरियाली जरूरी है, लेकिन अभी महज 9 से 13 फीसद के बीच हरित क्षेत्र हो…और पढ़ें
HighLights
- नईदुनिया विमर्श कार्यक्रम में पूर्व एपीसीसीएफ डॉ. दुबे ने हरित क्षेत्र बढ़ाने को लेकर रखे विचार
- तय मापदंड के आधार पर शहर में तीस फीसद हिस्से में हरियाली जरूरी है
- अभी महज 9 से 13 फीसद के बीच हरित क्षेत्र होने का दावा किया जाता है
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। हरियाली की कीमत पर शहर में सड़क-फ्लाइओवर सहित अन्य विकास कार्य हो रहे है। इसके चलते लगातार शहर में हरित क्षेत्र घटने लगा है। तय मापदंड के आधार पर शहर में तीस फीसद हिस्से में हरियाली जरूरी है, लेकिन अभी महज 9 से 13 फीसद के बीच हरित क्षेत्र होने का दावा किया जाता है। यह पर्यावरण की दृष्टि से काफी चिंताजनक आकड़े हैं।
इंदौर की तुलना में दिल्ली और चित्रकूट जैसे स्थानों की हरियाली अधिक है। 30 प्रतिशत चित्रकूट और 20 प्रतिशत दिल्ली जैसे महानगर में हरित क्षेत्र है। हरियाली बढ़ने के लिए सिर्फ पौधे लगाना जरूरी नहीं है। बल्कि ऐसी प्रजातियों के पौधे रोपेंगे, जो शहर के वायुमंडल के हिसाब से बेहतर हो।
यह बात पूर्व अपर प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (एपीसीसीएफ) व पर्यावरणविद डा. पीसी दुबे ने कही। सोमवार को नईदुनिया विमर्श कार्यक्रम के माध्यम से उन्होंने शहर में घट रही हरियाली” विषय पर अपने विचार रखे। वे बताते है कि शहरी पर्यावरण को बचाने के लिए सिर्फ पौधारोपण अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि, स्थानीय परिस्थितियों और जनभागीदारी को साथ लेकर पर्यावरण की दिशा में काम करने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि बरसात आते ही नगरिक कुछ चुनिंदा स्थानों पर हरियाली बढ़ाने के लिए पौधे लगाते है। बल्कि उसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह पूरे शहर में समान रूप से फैली हो। यदि हरियाली कुछ इलाकों तक सीमित है और घनी आबादी वाले क्षेत्र पेड़ों से वंचित हैं तो लोगों को उसका पूरा लाभ नहीं मिल सकता।
उन्होंने कहा कि शहर के पर्यावरण को ध्यान में रखकर पौधे लगाने का चयन करने की जरूरत है। इसके लिए स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। विदेशी प्रजातियां कई बार पर्यावरण और जैव-विविधता के लिए उतनी उपयोगी नहीं होतीं। उन्होंने बीजा और अर्जुन जैसे देशज वृक्षों का उदाहरण दिया। वे बताया कि ये केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं है। बल्कि औषधीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
30 प्रजातियां संकट में
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश की लगभग 30 प्रतिशत प्रजातियां किसी न किसी स्तर पर संकट में हैं। यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया तो इसका असर केवल जंगलों पर नहीं पड़ेगा। बल्कि मानव स्वास्थ्य, औषधीय परंपरा, पशु-पक्षियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। जैव-विविधता जितनी अधिक होगी, पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही मजबूत रहेगा।
विशेषज्ञों को रखे समिति में
डा दुबे ने नगर निगमों और स्थानीय निकायों की भूमिका पर भी सवाल उठाए है। वे कहते है कि पेड़ों की कटाई या पौधारोपण से जुड़े निर्णय लेने वाली विशेषज्ञ समिति लेती है, लेकिन उसमें वास्तव में विषय के जानकार लोगों को शामिल किया जाना चाहिए। महज समिति बना देने से पर्यावरण संरक्षण नहीं होगा। निर्णय लेने वालों में वैज्ञानिक समझ और पारिस्थितिकी का ज्ञान होना चाहिए।
किसानों को दे सुविधाएं
कृषि वानिकी (एग्रोफारेस्ट्री) पर जोर देते हुए डा दुबे ने कहा कि राष्ट्रीय वन नीति के लक्ष्यों को किसानों की भागीदारी के बिना हासिल नहीं किया जा सकता। किसानों को प्रोत्साहन, सरल नियम और बाज़ार की सुविधा मिलेगी। तभी वे अपनी भूमि पर अधिक पेड़ लगाएंगे। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण सिर्फ सरकारी जिम्मेदारी नहीं है। बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक लोग पृथ्वी और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित नहीं करेंगे। तब तक हरियाली बचाने के प्रयास अधूरे रहेंगे।
Source link
#हरयल #बढन #क #लए #सरफ #पध #लगन #ह #नह #सह #परजतय #क #चयन #करन #भ #बहत #जरर



Post Comment