प्रतिवर्ष इंटरनेट या चाईल्ड पोर्न वीडियो के जरिये 20 करोड़ से अधिक वीडियो लान्च किये जाते है। जिस पर अश्लील वीडियो/ अश्लील क्लिपिंग जिसमें बाल पोर्नोग्…और पढ़ें
HighLights
- बच्चों को पोर्न वीडियो देखने से रोकने के लिए नीति बनाई जाए।
- याचिकाकर्ताकोर्ट ने कहा – देश में कोई रोकथाम का नियम नहीं।
- कोर्ट ने कहा- संबंधितों को याचिका की प्रति के साथ अभ्यावेदन भेजें।
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। बच्चों को पोर्न वीडियो देखने से रोकने के लिए नीति बनाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत याचिका का निराकरण हो गया है। कोर्ट ने याचिका निराकृत करते हुए याचिकाकर्ता से कहा कि यह मुख्य रूप से तकनीकी तरक्की के इस्तेमाल पर आधारित एक नीति से जुड़ा मुद्दा है। याचिकाकर्ता संबंधित अधिकारियों को याचिका की प्रति के साथ अभ्यावेदन भेज दे।
सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका एडवोकेट बीएल जैन ने प्रस्तुत की थी। कहा था कि 13 से 18 वर्ष आयु वर्ग के किशोर और युवाओ द्वारा पोर्न वीडियो देखने से उनके मानस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे संस्कृति नष्ट हो रही है। केंद्र शासन को चाहिए कि नाबालिगों को पोर्नग्राफी देखने से रोकने के लिए नीति बनाए।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि यूरोप, आस्ट्रेलिया, चीन और अरब सहित कई देशों ने चाईल्ड पोर्नोग्राफी पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन भारत में इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। वैश्विक स्तर पर हर सेकंड पांच हजार पोर्न साईटे एक्सेस की जाती है। प्रति वर्ष दो करोड़ से अधिक पोर्न वीडियो लांच किए जाते हैं।
प्रतिवर्ष इंटरनेट या चाईल्ड पोर्न वीडियो के जरिये 20 करोड़ से अधिक वीडियो लान्च किये जाते है। जिस पर अश्लील वीडियो/ अश्लील क्लिपिंग जिसमें बाल पोर्नोग्राफी भी शामिल है जो कि भारतीय बाजार में खुलेआम उपलब्ध है।
चीफ जस्टिस सुर्यकांत, जस्टिस जाायमाल्य बागची एवं जस्टिस वी मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए तर्क सुनने के बाद कहा कि यह मुद्दा कानून का ऐसा सवाल नही है जिसका फैसला इस कोर्ट को करना हो।
मामले के गुण दोष पर कोई राय व्यक्त किए बगैर हम याचिकाकर्ता को यह छूट देते हैं कि वे चाहें तो संबंधित अधिकारियों को याचिका की प्रति के साथ अभ्यावेदन भेज दें। अधिकारी याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुद्दों और सुझावों पर विचार करें।
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