धार भोजशाला को भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मंदिर मानते हुए हिन्दू परिवारों को सालभर पूजा का अधिकार दिया है। भोजशाला को मस्जिद बताने के लिए मुस्लिम समुदाय ने भी अपनी ओर से तर्क रखे और सरकारी रिकॉर्ड भी कोर्ट में प्रस्तुत किए, लेकिन कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की सर्वे रिपोर्ट को मजबूत सबूत माना।
इसमें कहा गया था कि भोजशाला 12वीं शताब्दी में बना एक मंदिर था, लेकिन बाद में उसमें बदलाव किए गए। भीतर के खंभों पर बनी प्रतिमाएँ तोड़ी गईं। इसके अलावा मूर्तियाँ भी हटाई गईं। भोजशाला की दीवारों पर फूल-पत्ती और हिन्दू चिन्ह थे, लेकिन वे नहीं तोड़े जा सके। भोजशाला के भारतीय शैली में बने गुंबद को भी तोड़ा गया और नए सिरे से उसका निर्माण किया गया, ताकि वह मस्जिद लगे।
कोर्ट में हिन्दू पक्ष की तरफ से यह साबित किया गया कि मस्जिद में इस तरह की आकृतियाँ नहीं होतीं और न ही हिन्दू चिन्ह रहते हैं। भोजशाला मामले के याचिकाकर्ता और भोजशाला उत्सव समिति के पदाधिकारियों के अनुसार, पहले भोजशाला में ही मुस्लिम परिवार रहते थे। परिसर में शव दफनाए जाते थे और कब्रें बना दी गई थीं। धार के हिन्दू परिवारों ने जब इसका विरोध शुरू किया तो धीरे-धीरे इस पर रोक लगी।
सर्वे में मिले मंदिर के सबूत
एएसआई द्वारा 98 दिनों तक भोजशाला में किए गए सर्वे के दौरान दीवारों पर देवताओं की आकृतियाँ मिलीं। खुदाई में मिली कलाकृतियाँ संगमरमर, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से तैयार की गई थीं।
उन कलाकृतियों में गणेश, नृसिंह, भैरव, देवी-देवताओं के अलावा पशुओं की आकृतियों के चिन्ह भी हैं। सर्वे में दो स्तंभ ऐसे भी मिले हैं, जिन पर “ऊँ सरस्वतै नमः” लिखा है। मस्जिद निर्माण के दौरान बेसाल्ट के ऊँचे चबूतरों पर भोजशाला के टूटे स्तंभों का फिर से प्रयोग किया गया। इस हिस्से में एक स्तंभ पर देवी-देवता की छवि भी है।सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वी हिस्से के स्तंभों की कतार में लगे एक बड़े शिलालेख में प्राकृत भाषा में दो कविताएँ मिलीं, जिससे मंदिर होने के सबूत और पुख्ता होते गए।
1964 में मंदिर होने के प्रमाण मिले थे
एक विशाल अभिलेख, जिसमें “पारिजातमंजरी-नाटिका” व “विजयश्री” अंकित है, उसमें उल्लेख है कि यह कृति मदन द्वारा रचित है, जो धार के राजा अर्जुनवर्मन के गुरु (आचार्य) थे। अर्जुनवर्मन, सुभटवर्मन के पुत्र थे और परमार वंश से संबंधित थे, जो सम्राट भोजदेव के वंशज माने जाते हैं।
एक अन्य बड़े अभिलेख में प्राकृत भाषा में दो कविताएँ अंकित हैं, जिनमें प्रत्येक में 109 श्लोक हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1964 में भी भोजशाला का सर्वे किया था। भोपाल के डिप्टी डायरेक्टर सदानंद दीक्षित ने भोजशाला आकर मुआयना किया था। उन्हें प्राकृत भाषा आती थी। तब उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिख दिया था कि भोजशाला मस्जिद नहीं, मंदिर है, लेकिन वह रिपोर्ट फाइलों में ही कैद रही।
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