मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में धार जिले स्थित भोजशाला परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर चल रही सुनवाई में गुरूवार को मुस्लिम पक्ष ने पक्ष रखा। वकीलों की तरफ से तर्क रखा गया कि इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि वहां किसी विशेष मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। इंदौर खंडपीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी इस मामले में दायर याचिकाओं और एक रिट अपील पर सुनवाई कर रहे हैं।
मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी धार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने अदालत में विस्तृत दलीलें रखते हुए कहा कि किसी विशिष्ट काल में मंदिर को तोड़ कर उसी स्थान पर मस्जिद बनाए जाने का कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। उन्होंने 2003 में ब्रिटिश हाई कमीशन द्वारा मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को भेजे गए एक कथित पत्र का हवाला देते हुए कहा कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस प्रतिमा को हिंदू पक्ष वाग्देवी (मां सरस्वती) की मूर्ति बता रहा है, वह वास्तव में जैन देवी अंबिका की प्रतिमा है।
खुर्शीद ने सुप्रीम कोर्ट के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि इस विवाद का समाधान भी स्थापित कानूनी सिद्धांतों और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए, जैसा कि सिविल मुकदमों में किया जाता है। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि सभी दस्तावेजों, ग्रंथों और साक्ष्यों की जांच की जाए।
उन्होंने रामसेवक गर्ग की पुस्तक हजरत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती (रहमतुल्लाह अलैह) का हवाला देते हुए कहा कि धार जो कभी मालवा की राजधानी थी, इतिहास में कई बार हमलों, लूट और पुनर्निर्माण का केंद्र रहा है। इसमें हिंदू शासकों की गतिविधियां भी शामिल थीं। खुर्शीद ने यह भी कहा कि 1305 में मालवा पर आक्रमण करने वाले अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी को धार को अलग से लूटने या नष्ट करने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उन्होंने मांडू जीतने के बाद सीधे शासन स्थापित कर लिया था।
उन्होंने यह तर्क भी दिया कि कमालुद्दीन चिश्ती से जुड़ी मस्जिद उस समय के शासक की ओर से परिसर में बनवाई गई थी, न कि किसी मंदिर को बलपूर्वक तोड़कर। अब इस मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी।
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