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MP News: पहले बिस्को पार्क, फिर नेहरू पार्क और अब पार्क ही नहीं रहा; स्मार्ट सिटी में संवरने के बजाए उजड़ गया

MP News: पहले बिस्को पार्क, फिर नेहरू पार्क और अब पार्क ही नहीं रहा; स्मार्ट सिटी में संवरने के बजाए उजड़ गया

किसी समय अपनी हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जानेवाला इंदौर का नेहरू पार्क अब उजाड़ पार्क में तब्दील हो गया है। यह पार्क अब अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। किसी समय यह नगर का प्रमुख मनोरंजन का केंद्र हुआ करता था। इस पार्क के पेड़ो की छांव में कई छात्र बैठकर पढ़ाई किया करते थे। बच्चों की रेल की सीटी से गुंजायमान हुआ करता था यह पार्क। शुरू में यह बिस्को पार्क कहलाता था, फिर बच्चों के प्रिय चाचा नेहरू के नाम हुआ और अब स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में गया तो करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद संवरने के बजाए उजाड़ हो गया। इसमें भारी भ्रष्टाचार की गंध आ रही है। यह इंदौर नगर निगम की महापौर परिषद के सदस्य राजेंद्र राठौड़ ने भी महसूस की है, इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इसमें धांधली के प्रति नाराजगी जताई है। गुरुवार को इंदौर के प्रमुख नेता और नगरीय निकाय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी नेहरू पार्क की बदहाली और पार्क में बने भवनों पर नाराजगी व्यक्त की है।

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होल्कर राज्य के वन संरक्षक थे सर बिस्को

18 वीं शताब्दी के अंत में इस उद्यान का नाम तत्कालीन होल्कर राज्य के वन संरक्षक सर विलियम फ्रेशर बिस्को के नाम पर रखा गया था। उस दौर में हर शनिवार को रियासत का प्रसिद्ध रॉयल बैंड अपने मधुर संगीत की धुनों से यहां जनता का मनोरंजन करता था। आजादी के 1954 में बिस्को पार्क इंदौर नगर पालिका को हस्तांतरित कर दिया गया। 1955 में इंदौर नगर पालिका परिषद ने बिस्को पार्क को अपने अधीन ले लिया। नगर पालिका परिषद के प्रस्ताव क्रमांक 573 दिनांक 24 अक्तूबर 1956 के तहत बिस्को पार्क का नाम पंडित जवाहरलाल नेहरू पार्क के नाम पर किया गया था।

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कान्ह के जल से सींचा जाता था

इस उद्यान ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। जलसंकट के दिनों में इस पार्क और यहां मौजूदा सैकड़ों पेड़ों को भारी संकट झेलना पड़ा। 1965 से पूर्व बिस्को पार्क को खान (कान्ह) नदी के पानी से सींचा जाता था। कृष्णपुरा के पास फुट ब्रिज पर बांध बनाकर पानी रोका गया था और पंप के माध्यम से एक विशेष पाइप लाइन से गांधी हॉल उद्यान, नेहरू पार्क और जिला कोर्ट उद्यान तक पानी पहुंचाया जाता था, ताकि यहां की यहां की हरियाली कायम रहे।

 

रियासत का केंद्र रहा यह पार्क

13 मई 1924 को महाराजा यशवंत राव ने यहां एक महत्वपूर्ण सभा को संबोधित किया था। इस सभा में उन्होंने इंदौर के स्कूल कॉलेजों की युवा छात्र-छात्राओं को संबोधित किया था। तब नगर का बिस्को पार्क एक आकर्षण का केंद्र हुआ करता था, सुंदर बगीचे और हरियाली से हर किसी का यह मन मोह लेता था।

 

महात्मा गांधी आए थे नेहरू पार्क में

20 अप्रैल 1935 को इंदौर में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन हुआ था। इसमें देशभर के विद्वान लेखक इंदौर पधारे थे। इस हिंदी सम्मेलन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की थी। आयोजन तत्कालीन बिस्को पार्क और वर्तमान के नेहरू पार्क में हुआ था। हिंदी साहित्य सम्मेलन के लिए यहां सुंदर पंडाल लगाया गया था। इस स्थान पर एक नगर बसा दिया गया था, जिसका नाम हुक्मचंद नगर रखा गया था।

 

गांधीजी ने यहीं की थी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की घोषणा

नेहरू पार्क में आयोजित हिंदी सम्मेलन में महात्मा गांधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की घोषणा की थी। इस हिंदी सम्मेलन में बैरिस्टर काशी प्रसाद जायसवाल, डॉक्टर प्राणनाथ विद्या अलंकार, पंडित रामचंद्र शुक्ल, हरिवंश राय बच्चन, पंडित राम नरेश त्रिपाठी, ठाकुर लक्ष्मण सिंह, पंडित गिरधर शर्मा, डॉक्टर दिनेश पांडे, सूरजमल जैन, डॉक्टर गोरखपुर प्रसाद, माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित हरिहर शर्मा, महाराज यशवंतराव होल्कर, सर सेठ हुकुमचंद, डॉक्टर सरजू प्रसाद और कई महत्वपूर्ण नागरिक सम्मिलित हुए थे।

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जून 1957 में यहां स्विमिंग पूल बना

बरसों से इंदौर के नागरिकों द्वारा नगर में तरणताल की मांग की जा रही थी। इस पर नगर निगम द्वारा नेहरू पार्क में अत्याधुनिक स्विमिंग पूल के निर्माण का निर्णय लिया गया और जून 1957 को इस स्विमंग पूल का उद्घाटन प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉक्टर कैलाश नाथ काटजू ने किया था। समय-समय पर इसमें सुधार कार्य होते रहे। यह तरणताल काफी पुराना हो चुका था। 2024 में नगर निगम द्वारा इस स्विमिंग पूल को तोड़कर नए पूल निर्माण के टेंडर जारी किए थे। अभी इस पूल का निर्माण कार्य जारी है। पूल फिर आरंभ होने में समय लगेगा।

 

शहर के मध्य में मनोरंजन का केंद्र तबाह

नेहरू पार्क में विकास के नाम पर बार-बार तोड़फोड़ की गई। बच्चों की रेल तो चालू है पर यहां की हरियाली गायब है और पेड़ों की छांव में मिलने वाला सुकून गायब है। रविवार और सावन के सोमवारों पर नगर के लोग यहां पिकनिक मनाने आया करते थे। गणगौर और अन्य पर्वों पर आयोजन हुआ करते थे, ये सब गतिविधियां अब बंद हो गई हैं और यह पार्क एक ऑफिस बनकर रह गया है। जरूरत है इस नगर के मध्य के मनोरंजन केंद्र को पुनः विकसित कर इस धरोहर को बचाने और संवारने की। अहम सवाल यह है कि स्मार्ट सिटी में शहर की यह धरोहर संवरने की बजाए बिगड़ कैसे गई? इसकी जांच कर भ्रष्टाचार के दोषियों को सबक सिखाना जरूरी है, तभी महारानी देवी अहिल्या के न्याय और उनके सुशासन की झलक अब तक कायम है, यह शहरवासियों को भरोसा हो सकेगा।

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