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अयोध्या फैसले के वे 10 सिद्धांत, जिन्हें मध्य प्रदेश कोर्ट ने भोजशाला मामले में बनाया आधार

अयोध्या फैसले के वे 10 सिद्धांत, जिन्हें मध्य प्रदेश कोर्ट ने भोजशाला मामले में बनाया आधार

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। अयोध्या के श्रीरामजन्म भूमि मामले में प्रतिपादित सर्वोच्च न्यायालय के 10 सिद्धांतों ने धार जिले में स्थित भोजशाला विवाद के निराकरण तक पहुंचने में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का रास्ता आसान किया। 242 पेज के निर्णय में हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने इन 10 सिद्धांतों और भोजशाला मामले में इनकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

छह अप्रैल से 12 मई तक चली बहस के दौरान भी मंदिर और मस्जिद के पक्षों ने अयोध्या फैसले और उसमें प्रतिपादित सिद्धांतों का बार-बार उल्लेख करते हुए इन्हें निर्विवादित और सर्वमान्य बताया था।

ये हैं वे 10 सिद्धांतः पहला सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या फैसले में कहा है कि इस प्रकार के मामलों में प्रमाण का मानक गणितीय निश्चितता या संदेह से परे प्रमाण नहीं होता, बल्कि न्यायालयों द्वारा स्वीकार किया जाने वाला मानक ‘संभावनाओं के प्रबल संतुलन’ का होता है।

दूसरा सिद्धांत

न्यायालयों का उद्देश्य किसी संरचना की धार्मिक या धर्मशास्त्रीय पूर्णता का निर्धारण करना नहीं है, बल्कि आस्था और विश्वास के प्रमाण, पूजा-अर्चना, दान या न्यास के अस्तित्व, उसके स्वरूप, उसकी स्थायित्व प्रकृति, धार्मिक उपयोग, उपासकों के आचरण, ऐतिहासिक दावों तथा धार्मिक विश्वास की निरंतरता और स्थिरता का परीक्षण करना है।

तीसरा सिद्धांत

देवता, समर्पित संपत्ति और उसके अंतर्निहित पवित्र उद्देश्य की रक्षा करना आधुनिक न्यायालयों का सर्वोपरि उद्देश्य है। इस संदर्भ में न्यायालय ‘लोकस स्टैंडी’ के नियम को शिथिल करता है ताकि न्याय सुनिश्चित हो सके।

चौथा सिद्धांत

मूर्ति के नष्ट हो जाने या अनुपस्थित रहने से पवित्र उद्देश्य समाप्त नहीं होता और न ही दान या समर्पण समाप्त माना जाता है। यदि मूर्ति नष्ट हो गई हो या उसकी उपस्थिति अस्थायी अथवा पूर्णतः अनुपस्थित हो, तब भी समर्पण द्वारा निर्मित विधिक व्यक्तित्व अर्थात पवित्र उद्देश्य अस्तित्व में बना रहता है।

पांचवां सिद्धांत

आस्था और विश्वास को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, लेकिन न्यायालयों को यह भी स्वीकार करना चाहिए कि ऐसे विषय हमेशा प्रत्यक्ष दस्तावेजी साक्ष्य से सिद्ध नहीं किए जा सकते और न ही वे हमेशा सांसारिक तर्कों के अनुरूप होते हैं।

छठा सिद्धांत

यद्यपि सरकारी गजेट और गजेटियर को स्वामित्व, धार्मिक स्वरूप, कानूनी अधिकार या विवादित ऐतिहासिक तथ्य का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। उनका परीक्षण समकालीन दस्तावेजों, आधिकारिक अभिलेखों, पुरातात्विक सामग्री, पक्षकारों के आचरण के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

सातवां सिद्धांत

आधिकारिक विवरण, प्रशासनिक नामकरण, सरकारी पत्राचार तथा समकालीन सरकारी अभिलेख महत्वपूर्ण साक्ष्य स्वयं में अंतिम स्वामित्व या कानूनी स्थिति का निर्धारण नहीं करते, किंतु यह अन्य दस्तावेजी, ऐतिहासिक, पुरातात्विक तथा पूजा-संबंधी साक्ष्यों की पुष्टि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

आठवां सिद्धांत

यह ‘वक्फ बाय यूजर’ से संबंधित है। किसी एक समुदाय के धार्मिक सिद्धांतों को इस प्रकार स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उससे दूसरे समुदाय के स्थापित धार्मिक अधिकार स्वतः समाप्त हो जाएं। संपूर्ण विवादित संपत्ति को ‘वक्फ बाय यूजर’ बताने के दावों को इस प्रकार स्वीकार नहीं किया जा सकता कि दूसरे समुदाय के धार्मिक अधिकार समाप्त हो जाएं।

नौवां सिद्धांत

यह एएसआइ की रिपोर्ट से संबंधित है। निष्कर्षों का परीक्षण पूर्ण सत्य के आधार पर नहीं बल्कि ‘संभावनाओं के प्रबल संतुलन’ के सिद्धांत पर किया जाना चाहिए। यदि विवादित भवन की अपनी नींव न हो, बल्कि वह पूर्ववर्ती संरचना की दीवारों पर निर्मित हो या उसका फर्श पुरानी संरचना के फर्श के ऊपर हो तो बलपूर्वक विध्वंस के निष्कर्ष अनुमान के आधार पर निकाले जा सकते हैं।

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दसवां सिद्धांत

जहां विवाद धार्मिक स्वरूप, ऐतिहासिक उपयोग, पूजा की निरंतरता या किसी संरक्षित धार्मिक स्थल पर प्रतिस्पर्धी दावों से संबंधित हो, वहां धार्मिक प्रतीकों, मूर्तियों, शिलालेखों, स्थापत्य अवशेषों और अन्य पुरातात्विक सामग्री का अत्यधिक साक्ष्य मूल्य होता है। किसी धार्मिक संरचना का विध्वंस, खंडहर या परिवर्तन हो जाए, तब भी आस्था और पूजा की निरंतरता महत्वपूर्ण साक्ष्य मूल्य रखती है।

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