धार की भोजशाला में मिली वाग्देवी की मूर्ति परमारकालीन कला, संस्कृति और विद्वता की गौरवशाली परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है। श्वेत संगमरमर से …और पढ़ें
HighLights
- विद्या, संस्कृति और आस्था का हजारों साल पुराना केंद्र
- 250 किलो वजनी श्वेत संगमरमर की वाग्देवी प्रतिमा
- 1091 ईस्वी के शिलालेख खोलते हैं इतिहास के राज
अरविंद दुबे, नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार की भोजशाला केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत अध्ययन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक मानी जाती रही है। परमार राजा भोज के काल में स्थापित भोजशाला को मां वाग्देवी (सरस्वती) की आराधना, वैदिक अध्ययन और विद्वानों के केंद्र के रूप में पहचान मिली।
विशाल स्थापत्य, नक्काशीदार स्तंभ, यज्ञकुंड और वाग्देवी प्रतिमा ने इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाए रखा। यहां धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, वैदिक आयोजन और वसंत पंचमी महोत्सव आयोजित होते थे। परिसर से कुछ ही किलोमीटर दूर ज्ञानपुरा गांव के बारे में माना जाता है कि परमार काल में यह आचार्यों और विद्वानों का निवास क्षेत्र था।
वाग्देवी प्रतिमा: शिल्प वैभव और विद्वता की अद्भुत धरोहर
धार की भोजशाला में मिली वाग्देवी की मूर्ति परमारकालीन कला, संस्कृति और विद्वता की गौरवशाली परंपरा का महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह मूर्ति विक्रम संवत 1091 यानी सन् 1034 की बताई जाती है। उच्च उत्कीर्णन शैली में निर्मित यह मूर्ति तत्कालीन मूर्तिकला कौशल की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करती है।
इतिहासकारों के अनुसार यह प्रतिमा मूल रूप से चार भुजाओं वाली थी। देवी के सिर पर मुकुट और सुसज्जित केश विन्यास उनकी दिव्यता और गरिमा को दर्शाते हैं।
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प्रतिमा का इतिहास और वर्तमान स्थिति
यह मूर्ति वर्ष 1875 में धार क्षेत्र के भग्नावशेषों से प्राप्त हुई थी। इसके आधार भाग पर संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में उकेरे अभिलेख के अनुसार वररुचि नामक विद्वान ने वाग्देवी सहित तीन प्रतिमाओं का निर्माण करवाया था। मूर्ति लगभग 128.5 सेमी ऊंची, 58.6 सेमी चौड़ी है। इसका अनुमानित भार करीब 250 किलो माना जाता है। वर्तमान में यह मूर्ति ब्रिटिश म्यूजियम की एशिया दीर्घा में प्रदर्शित है।
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