इंदौर एलिवेटेड कॉरिडोर पर हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। शासन के जवाब पर सवाल उठे। याचिकाकर्ता ने उपयोगिता पर आपत्ति जताई। अब अगली सुनवाई में फैसला अहम होग …और पढ़ें
HighLights
- हाई कोर्ट ने कॉरिडोर की उपयोगिता पर शासन से सवाल पूछे।
- पुराने सर्वे में प्रोजेक्ट की उपयोगिता पहले ही नकारी गई।
- लागत 250 करोड़ से बढ़कर अब 550 करोड़ पहुंची।
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। इंदौर में एलआइजी चौराहा से नवलखा तक प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना एक बार फिर विवादों में घिर गई है। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को लेकर हाई कोर्ट में दायर जनहित याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई, जिसमें कोर्ट ने शासन से कड़े सवाल पूछे।
विशेष रूप से कोर्ट ने यह जानना चाहा कि जब इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) के पूर्व सर्वे में इस कॉरिडोर की उपयोगिता को नकारा जा चुका है, तो फिर इस परियोजना को दोबारा क्यों शुरू किया गया। हालांकि शासन की ओर से जवाब प्रस्तुत किया गया, लेकिन उसमें परियोजना की वास्तविक जरूरत और शहर को होने वाले लाभों के बजाय केवल एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण की प्रक्रिया और सामान्य फायदे बताए गए।
इस पर याचिकाकर्ता ने आपत्ति जताते हुए कोर्ट को गुमराह करने का आरोप लगाया और विस्तृत रिजाइंडर पेश किया। मामले की अगली सुनवाई अब अगले सप्ताह निर्धारित की गई है।
पुराने सर्वे पर उठे सवाल
याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2018-19 में हुए सर्वे में एलिवेटेड कॉरिडोर की उपयोगिता महज 2 से 8 प्रतिशत तक आंकी गई थी, जिसके आधार पर उस समय इस परियोजना को निरस्त कर दिया गया था। इसके बावजूद वर्ष 2025 में अचानक इस प्रोजेक्ट को फिर से शुरू कर दिया गया।
लागत और लंबाई में भारी वृद्धि
शुरुआत में करीब 250 करोड़ रुपये की लागत वाला यह प्रोजेक्ट अब बढ़कर लगभग 550 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। साथ ही, कॉरिडोर की मूल लंबाई 6.5 किलोमीटर बताई गई थी, लेकिन रोटरी और अतिरिक्त संरचनाओं के कारण यह करीब 10 किलोमीटर तक पहुंचने की संभावना है।
60% ट्रैफिक लाभ का दावा सवालों में
परियोजना के पक्ष में यह दावा किया जा रहा है कि इससे शहर के 60 प्रतिशत यातायात को लाभ होगा, लेकिन याचिका में कहा गया है कि ऐसा कोई आधिकारिक सर्वे सार्वजनिक नहीं किया गया है। यह स्पष्ट नहीं है कि यह आंकड़ा किस आधार पर प्रस्तुत किया गया।
शासन के जवाब पर आपत्ति
याचिकाकर्ता अतुल शेठ ने बताया कि शासन ने अपने जवाब में इंदौर के संदर्भ में परियोजना की उपयोगिता स्पष्ट करने के बजाय केवल यह बताया कि एलिवेटेड कॉरिडोर कैसे बनाए जाते हैं और उनके सामान्य लाभ क्या होते हैं। इसे भ्रामक बताते हुए कोर्ट में रिजाइंडर दाखिल किया गया है।
अगली सुनवाई पर टिकी निगाहें
अब इस पूरे मामले में सभी की नजरें हाई कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए ठोस आधार प्रस्तुत किए जाते हैं या नहीं।
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