नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को निर्धारित करने के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चल रही याचिकाओं में मंगलवार को सुनवाई जारी रही। इंटरविनर काजी जकुल्ला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने तर्क रखे।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि 24 अगस्त 1935 को धार दरबार ने नोटिफिकेशन जारी कर कहा था कि भोजशाला मस्जिद है और यहां मुस्लिम समाज नमाज पढ़ता रहा है और पढ़ता रहेगा। इस नोटिफिकेशन को आज तक किसी याचिका में चुनौती नहीं दी गई।
मस्जिद पक्ष की ओर से दोबारा तर्क रखे जाएंगे
मंगलवार को एडवोकेट मेनन के तर्क पूरे हो गए। अब बुधवार को मामले में मस्जिद पक्ष की ओर से दोबारा तर्क रखे जाएंगे। बता दें, भोजशाला को लेकर हाई कोर्ट में चार जनहित याचिकाएं और एक अपील चल रही है। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ के समक्ष मंगलवार दोपहर ढाई बजे से मामले की सुनवाई शुरू हुई जो करीब पौने दो घंटे चली।
भारतीय ब्रिटिश सरकार अधिसूचना जारी कर चुकी थी
एडवोकेट शोभा मेनन ने सोमवार को रखे तर्कों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और कुलदीप तिवारी बार-बार कह रहे हैं कि भोजशाला में वाग्देवी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी, लेकिन वे आज तक एक भी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके जिससे प्राण प्रतिष्ठा की पुष्टि होती हो।
धार दरबार के अगस्त 1935 में अधिसूचना जारी करने से पहले ही तत्कालीन भारतीय ब्रिटिश सरकार अधिसूचना जारी कर चुकी थी कि रियासतों द्वारा जारी अधिसूचनाएं मान्य की जाएंगी।
भोजशाला पर एएसआई के दावे पर सवाल
एडवोकेट शोभा मेनन के अनुसार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) कह रहा है कि भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर है, लेकिन किसी भी संपत्ति को संरक्षित घोषित करने की एक प्रक्रिया होती है, जिसका पालन नहीं किया गया।
राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर में स्थाई रूप से किसी को आने-जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन एएसआइ ने वर्ष 2003 से ही भोजशाला में हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी हुई है।
एएसआई ने कभी भोजशाला का कब्जा लिया ही नहीं
अगर एएसआई ने नियमों पालन किया होता तो भोजशाला को संरक्षित करने के लिए इसका विधिवत कब्जा लिया जाता, इस संबंध में घोषणा (डिक्लेरेशन) की जाती, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वास्तविकता यह है कि एएसआई ने कभी भोजशाला का कब्जा लिया ही नहीं है।
सिविल प्रक्रिया से निकलेगा समाधान
एडवोकेट मेनन ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने 2003 के एएसआइ आदेश को करीब 19 साल तक चुनौती नहीं दी और 2022 में अचानक याचिका दायर की। उनके अनुसार भोजशाला विवाद स्वामित्व का मामला है, जिसका समाधान जनहित याचिका से नहीं, बल्कि सिविल प्रक्रिया से ही संभव है। इसलिए याचिकाएं निरस्त की जानी चाहिए।
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आज फिर मस्जिद पक्ष रखेगा तर्क
बुधवार को एक बार फिर मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से तर्क रखे जाएंगे। इसके पहले इस सोसायटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद तर्क रख चुके हैं। दरअसल हाई कोर्ट में चल रही चार याचिकाओं में से दो में सोसायटी प्रतिवादी है और एक में वादी।
सोसायटी का कहना है कि सलमान खुर्शीद एक याचिका में बतौर प्रतिवादी तर्क रख चुके हैं। अब बुधवार को याचिकाकर्ता और प्रतिवादी सोसायटी की ओर से तर्क रखे जाएंगे।
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