नए वकीलों को स्टायपंड नहीं दिए जाने पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य शासन, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य अधिवक्ता परिषद से जवाब मांगा है। …और पढ़ें
HighLights
- जिला स्तर पर 20 हजार और तहसील स्तर पर 15 हजार रुपये प्रतिमाह स्टायपंड देने की सिफारिश के बाद भी अमल नहीं
- नियमों से बंधे वकील दूसरा काम नहीं कर सकते, सनद के बाद कम से कम तीन साल तक निश्चित स्टायपंड मिले
- याचिकाकर्ता ने कहा- राज्य और परिषद मिलकर स्टायपंड दें; इस मामले में अब अगली सुनवाई जुलाई में होगी
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। नए अधिवक्ताओं को स्टायपंड दिए जाने के मुद्दे को लेकर हाई कोर्ट में प्रस्तुत दो जनहित याचिकाओं में शुक्रवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने राज्य शासन, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य अधिवक्ता परिषद से पूछा है कि वे बताएं कि नए अधिवक्ताओं को स्टायपंड दिए जाने में कहां और क्या परेशानी है। इन याचिकाओं में कहा है कि नए अधिवक्ताओं को प्रैक्टिस जमाने में तीन से पांच साल का समय लगता है।
इस अवधि में उनके पास भरण-पोषण का कोई अन्य साधन नहीं होता है, ऐसी स्थिति में नए अधिवक्ताओं को शासन द्वारा प्रारंभिक तीन वर्ष तक प्रतिमाह स्टायपंड दिया जाना चाहिए। याचिका में यह भी कहा है कि बार काउंसिल आफ इंडिया ने जिला स्तर पर नए अधिवक्ताओं को बीस हजार रुपये प्रतिमाह और तहसील स्तर पर 15 हजार रुपये प्रतिमाह स्टायपंड दिए जाने की अनुशंसा भी की थी, बावजूद इसके कुछ नहीं हुआ।
खुद को स्थापित करने की चुनौती होती है
नियमों में बंधे होने की वजह से अधिवक्ता वकालात के अलावा कोई अन्य काम नहीं कर सकते। नए अधिवक्ताओं के सामने खुद को स्थापित करने की चुनौती होती है। इसमें लंबा समय लगता है। ऐसे में नए अधिवक्ताओं को सनद प्राप्त करने के कम से कम तीन वर्ष तक एक निश्चित स्टायपंड देना चाहिए।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में यह जनहित याचिका एडवोकेट निमेष पाठक, लकी जैन और यंग एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन ने प्रस्तुत की है। शुक्रवार को चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष मामले में सुनवाई हुई। राज्य अधिवक्ता परिषद की ओर से तर्क रखा गया कि कई वरिष्ठ अधिवक्ता जूनियर अधिवक्ताओं को स्टायपंड देते हैं।
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