धार भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने के लिए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में 6 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई मंगलवार 5 मई को भी जारी रही। …और पढ़ें
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने के लिए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में 6 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई मंगलवार 5 मई को भी जारी रही। इस दिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने तर्क रखे। उन्होंने 22 मार्च 2024 से शुरू हुए भोजशाला के सर्वे के दौरान सामने आए तथ्यों को कोर्ट के सामने रखा। सर्वे रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष रखते हुए एडवोकेट जैन ने कहा कि अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए किए गए इस सर्वे से पता चला है कि भोजशाला का निर्माण 10वीं-11वीं सदी के बीच भोजकाल में हुआ था। सर्वे के दौरान गणेश और ब्रह्मा की मूर्तियां मिलीं। भोजशाला के विवादित हिस्से की जांच में दीवारों की जांच की गई, जिससे यह बात सामने आई कि यहां की दीवारें मिट्टी की ईंटों की बनी हुई हैं जो काफी चौड़ी थीं। इसकी बनावट परमार राजा भोज की पुस्तकों में वर्णित शैली के अनुरूप है।
मंदिर के स्तंभों का मस्जिद निर्माण में पुन: उपयोग और कलाकृतियों से छेड़छाड़
एडवोकेट जैन ने प्राचीन साहित्य का उल्लेख करते हुए कहा कि खिलजी शासन के दौरान अब्दुल शाह चंगेज ने फौज के साथ धार में प्रवेश कर ताकत के बल पर कई मंदिरों को नमाज पढ़ने की जगह बना दिया था। सर्वे में स्तंभों की कला और वास्तुकला से यह स्पष्ट हुआ कि ये पहले मंदिर का हिस्सा थे। मौजूदा संरचना में कुल 188 स्तंभ (106 खड़े और 82 आड़े) मिले हैं, जो मूल रूप से मंदिरों के ही थे। इन्हें वर्तमान ढांचे में उपयोग लाने के लिए उन पर उकेरी गई देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को छैनी जैसे औजारों से विकृत किया गया, क्योंकि मस्जिदों में ऐसी आकृतियों की अनुमति नहीं होती। हालांकि, पश्चिम क्षेत्र के कई स्तंभों पर ‘कीर्तिमुख’ और पशु आकृतियां अब भी सुरक्षित मिली हैं।
संस्कृत शिलालेख और राजा भोज के काल के पुख्ता साक्ष्य
एएसआइ ने रिपोर्ट में दावा किया है कि मौजूदा संरचना में संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखे कई शिलालेख मिले हैं। सर्वे में 150 से ज्यादा उकेरे गए शब्द मिले हैं, जिनमें राजा भोज की कविताओं के साथ ‘ऊं सरस्वतैय: नम:’ और ‘ऊं नम: शिवाय’ अंकित है। एक विशेष शिलालेख पर परमार वंश के राजा नरवर्मन (1094-1133 ईस्वी) का उल्लेख भी मिला है। एडवोकेट जैन ने बताया कि भोजशाला में अरबी और फारसी के शब्द केवल स्याही से बने थे, जबकि संस्कृत मंत्र पत्थरों पर गहराई से उकेरे गए हैं। इसके अलावा, दक्षिणी हिस्से की मेहराब का निर्माण बाद में हुआ है, जिसका मटेरियल मूल ढांचे से पूरी तरह अलग है।
सर्वे में मिलीं 94 मूर्तियां, प्राचीन सिक्के और बहुमंजिला संरचना
एएसआइ के सर्वे के दौरान 94 ऐसी मूर्तियां और कलाकृतियां मिली हैं जिन पर महीन नक्काशी की गई है। इनमें गणेश, ब्रह्मा (पत्नियों सहित), नृसिंह और भैरव के साथ-साथ शेर, हाथी, बंदर, सांप और हंस जैसे जानवरों की आकृतियां शामिल हैं। पिलरों पर बने ‘कीर्ति मुख’ भी मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। खुदाई के दौरान चांदी और तांबे के 30 परमारकालीन सिक्के भी बरामद हुए हैं। साथ ही, जमीन के नीचे एक बहुमंजिला संरचना होने के पुख्ता प्रमाण भी सामने आए हैं। मंगलवार को एएसआइ के तर्क पूरे हो गए हैं, अब बुधवार को शासन की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह अपना पक्ष रखेंगे।
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