वर्ष 1902-03 में हुए सर्वे में ही यह बात स्पष्ट हो गई थी कि भोजशाला मंदिर है। मस्जिद का निर्माण मंदिर से निकाली गई सामग्री से ही किया गया था। यहां पत् …और पढ़ें
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। वर्ष 1902-03 में हुए सर्वे में ही यह बात स्पष्ट हो गई थी कि भोजशाला मंदिर है। मस्जिद का निर्माण मंदिर से निकाली गई सामग्री से ही किया गया था। यहां पत्थरों पर संस्कृत में लिखे श्लोक मिले थे। समय-समय पर कई पर्यटक धार आए। उन्होंने भोजशाला को लेकर जो अनुभव किया उसे लिपिबद्ध किया। इन पर्यटकों ने भोजशाला का जो वर्णन किया है वह बहुत स्पष्ट है। वर्ष 1904 से ही भोजशाला राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर घोषित है।
धार दरबार ने वर्ष 1935 में एक अधिसूचना जारी कर इसे मस्जिद बताया था, लेकिन अधिनियम के प्रविधानों से स्पष्ट है कि धार दरबार को अधिसूचना जारी करने का अधिकार ही नहीं था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) भोजशाला का स्वामी नहीं बल्कि अभिभावक है। उसने समय-समय पर इसका रखरखाव भी किया। वर्ष 1935 में भोजशाला के रखरखाव पर 50 हजार रुपये खर्च किए गए थे। धार भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने के लिए हाई कोर्ट में चल रही याचिकाओं में यह बात सोमवार को एएसआई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने रखी।
ब्रिटिश पत्राचार और मंदिर का मूल स्वरूप
करीब दो घंटे तक चली सुनवाई के दौरान जैन ने मस्जिद पक्ष की ओर से उठाई गई आपत्तियों का बिंदुवार जवाब दिया। उन्होंने भोजशाला को राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर बताते हुए कहा कि वर्ष 1904 में ही इसकी विधिवत घोषणा कर दी गई थी। जैन ने भोजशाला को लेकर तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों के बीच हुए पत्राचार का हवाला भी दिया। उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी भोजशाला को लेकर सजग थे और इसके रखरखाव को लेकर बहुत चिंता करते थे।
उन्होंने इस संबंध में 13 जुलाई 1935 के दस्तावेजों का हवाला भी दिया। बताया कि मुस्लिम राजाओं ने मंदिर को मस्जिद में बदला था, जबकि मूल रूप से यह सरस्वती देवी का मंदिर ही है। एएसआई की ओर से मंगलवार को भी तर्क रखे जाएंगे। एडवोकेट सुनील जैन इस दिन कोर्ट के आदेश के बाद हुए भोजशाला के सर्वे में सामने आए नए तथ्यों के बारे में अपनी बात रखेंगे। हाई कोर्ट में एक और याचिका चल रही है जिसमें भोजशाला को जैन मंदिर बताया गया है। एएसआई की ओर से तर्क पूरे होने के बाद कोर्ट इस याचिका में याचिकाकर्ता की बात सुनेगी।
मस्जिद पक्ष की आपत्ति और कोर्ट का निर्देश
सोमवार को सुनवाई शुरू होते ही मस्जिद पक्ष की ओर से कहा गया कि कोर्ट के आदेश के बावजूद भोजशाला में एएसआई द्वारा किए गए सर्वे की वीडियोग्राफी हमें उपलब्ध नहीं कराई गई है। एएसआई ने इसे गूगल ड्राइव पर अपलोड किया है, लेकिन फाइलें इतनी बड़ी हैं कि इसे देख पाना संभव नहीं है। इस पर कोर्ट ने मस्जिद पक्ष के वकील से कहा कि वे चाहें तो कोर्ट चैंबर में आईटी विभाग की मदद लेकर फाइलें देख सकते हैं। कोर्ट ने मस्जिद पक्ष से कहा है कि वीडियोग्राफी देखने के बाद अगर उन्हें सर्वे को लेकर कोई आपत्ति है तो वे इसे 7 मई को अनिवार्य रूप से प्रस्तुत कर दें।
सुनवाई के अंतिम चरण में मामला
सुनवाई के दौरान हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि वे मस्जिद पक्ष की ओर से रखे गए तर्कों पर 13 और 14 मई को रिजाइंडर देना चाहते हैं। उन्हें इसकी अनुमति दी जाए। इस पर कोर्ट ने कहा कि हम इस मामले में सुनवाई पूरी करने के करीब हैं। याचिकाकर्ता, प्रतिवादी और इंटरविनर अपनी-अपनी बात रख चुके हैं और एएसआई के वकील अपनी बात रख रहे हैं। अगर आप रिजाइंडर ही देना चाहते हैं तो इसे जल्द से जल्द दे दें। कोर्ट की इस मौखिक टिप्पणी से मामले में ग्रीष्मावकाश से पहले फैसला आने की संभावना बढ़ गई है।
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