कारगिल विजय को 27 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उस युद्ध की हर रात, हर मोर्चा और साथियों की शहादत आज भी रणबांकुरों की स्मृतियों में ताजा है। 56 ब्रिगेड के …और पढ़ें
HighLights
- कारगिल युद्ध की हर रात, हर मोर्चा और साथियों की शहादत आज भी रणबांकुरों की स्मृतियों में ताजा है
- सूबेदार लक्ष्मण सिंह, जो अब इंदौर में रहते हैं, युद्ध के वे पल याद करते हुए आज भी भावुक हो उठते हैं
- यूनिट के 13 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, अगले दिन, 29 जून को पांच और जवान शहीद हो गए
उदय प्रताप सिंह, नईदुनिया, इंदौर : कारगिल विजय को 27 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन उस युद्ध की हर रात, हर मोर्चा और साथियों की शहादत आज भी रणबांकुरों की स्मृतियों में ताजा है। 56 ब्रिगेड के तहत 18 गढ़वाल राइफल्स में तैनात रहे सूबेदार लक्ष्मण सिंह, जो अब इंदौर के कालिंदी विहार में रहते हैं, युद्ध के वे पल याद करते हुए आज भी भावुक हो उठते हैं।
सूबेदार लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि कारगिल युद्ध के दौरान वे 18 गढ़वाल राइफल्स में रायफलमैन थे। द्रास, तोलोलिंग और बटालिक सेक्टर से आगे नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर पाकिस्तान की नार्दर्न लाइट इन्फेंट्री और घुसपैठियों ने कई रणनीतिक चोटियों पर कब्जा कर लिया था। इन्हें वापस लेने की जिम्मेदारी 56 ब्रिगेड को मिली, जिसमें 18 गढ़वाल राइफल्स सहित चार यूनिट शामिल थीं।
उन्होंने बताया कि 28 जून 1999 की रात दुश्मन ने भीषण हमला किया, जिसमें हमारी यूनिट के 13 जवान वीरगति को प्राप्त हुए। अगले दिन, 29 जून को हुए संघर्ष में पांच और जवान शहीद हो गए। दुश्मन ऊंची चोटियों पर था और हमारी बटालियन नीचे से जवाबी कार्रवाई कर रही थी। केवल दो दिनों में एक अधिकारी और 18 जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
लक्ष्मण सिंह उस समय ब्रेवो कंपनी में थे। उनकी जिम्मेदारी मोर्टार और राकेट लांन्चर के गोला-बारूद को करीब डेढ़ किलोमीटर खड़ी चढ़ाई पार कर अग्रिम मोर्चे तक पहुंचाना और वापसी में घायल जवानों को कंधों पर उठाकर बेस कैंप तक लाना थी। वे बताते हैं कि युद्ध के दौरान उनकी बटालियन ने करीब 80 घायल सैनिकों को सुरक्षित रेस्क्यू कर अस्पताल पहुंचाया। युद्ध की सबसे मार्मिक स्मृति अपने साथी राइफलमैन विक्रम सिंह की है, जो दुश्मन से लड़ते हुए शहीद हो गए। उस समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं। लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि आज उनका बेटा भी 18 गढ़वाल राइफल्स में देश की सेवा कर रहा है। इसे वे अपने शहीद साथी के सपनों और देशभक्ति की सबसे बड़ी विरासत मानते हैं।
कारगिल विजय दिवस : एक नजर में
- तिथि: 26 जुलाई 1999
- युद्ध अवधि: मई-जुलाई 1999
- युद्ध क्षेत्र: कारगिल, द्रास, बटालिक और मश्कोह सेक्टर
- भारतीय सैन्य अभियान: आपरेशन विजय
- उद्देश्य: नियंत्रण रेखा पार कर कब्जा की गई भारतीय चौकियों को मुक्त कराना।
- विजय दिवस: 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने अभियान की सफलता की घोषणा की।
कारगिल युद्ध के महत्वपूर्ण तथ्य
- युद्ध लगभग दो महीने चला।
- लड़ाई 14,000 से 18,000 फीट तक की ऊंचाई वाले दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में लड़ी गई।
- भारतीय सेना ने कठिन परिस्थितियों में कई रणनीतिक चोटियों पर दोबारा कब्जा प्राप्त किया।
- यह युद्ध ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में भारत के सबसे चुनौतीपूर्ण सैन्य अभियानों में माना जाता है।
फैक्ट फाइल
- 527 भारतीय सैनिक बलिदानी
- 1,363 भारतीय सैनिक घायल
- 1,042 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए भारत के अनुसार
कारगिल युद्ध के चार परमवीर चक्र विजेता
- कैप्टन विक्रम बत्रा (मरणोपरांत)
- लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय (मरणोपरांत)
- ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
- राइफलमैन संजय कुमार
रोचक तथ्य
- कारगिल युद्ध में कई चोटियों पर सीधी चढ़ाई करते हुए सैनिकों ने दुश्मन के मजबूत ठिकानों पर कब्जा किया।
- द्रास स्थित कारगिल वार मेमोरियल आज भी शहीदों की स्मृति का प्रमुख राष्ट्रीय स्मारक है।
- हर वर्ष भारतीय सेना और देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है।
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