नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार की ऐतिहासिक धरा पर आज न्याय की जो अविरल धारा बही है, उसने सदियों से चली आ रही प्रतीक्षा के बांध को तोड़ दिया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के जस्टिस आलोक कुमार अवस्थी ने जब फैसला पढ़ना शुरू किया, तो उनके हर शब्द में इतिहास का न्याय और भविष्य की आशा छिपी थी। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में उद्घोष कर दिया है कि धार की भोजशाला कोई साधारण ढांचा नहीं, बल्कि साक्षात मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है।
इस फैसले ने जहां करोड़ों सनातनी हृदय को तृप्त किया है, वहीं एक ऐसी चर्चा को जन्म दे दिया है जो सात समंदर पार लंदन की दहलीज तक जा पहुंची है। सवाल अब केवल मंदिर के अस्तित्व का नहीं है, सवाल उस ‘अस्तित्व की आत्मा’ का है जो वर्षों से परदेस में कैद है।
आइए, इस विशेष विश्लेषण में समझते हैं कि क्या अब मां वाग्देवी अपने उस घर लौटेंगी, जिसे राजा भोज ने उनकी साधना के लिए बनाया था।
जब न्याय ने पहचानी मंदिर की आत्मा
हाई कोर्ट का यह निर्णय महज कागजों पर लिखा एक फैसला नहीं, बल्कि उस सत्य की वैज्ञानिक और ऐतिहासिक स्वीकृति है जिसे सदियों तक नकारने की कोशिश की गई। कोर्ट ने एएसआई (ASI) के सर्वे, स्तंभों पर अंकित वेदों की ऋचाओं, संस्कृत के श्लोकों और वास्तुशिल्प के उन मूक गवाहों को पहचाना, जो सदियों से ‘मंदिर’ होने की गवाही दे रहे थे। जस्टिस आलोक कुमार अवस्थी के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि भोजशाला की पहचान मां वाग्देवी के मंदिर के रूप में ही रहेगी।
लेकिन, जैसे ही मंदिर के गर्भगृह की दीवारें जयकारों से गूंजीं, वैसे ही सबकी निगाहें उस खाली आसन की ओर मुड़ गईं, जहां कभी ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी की दिव्य प्रतिमा विराजमान थी।
क्या अब घर लौटेंगी मां वाग्देवी?
भोजशाला की जो मूल प्रतिमा है, वह वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम (लंदन) की एक ठंडी गैलरी में एक ‘प्रदर्शनी की वस्तु’ बनकर रह गई है। वर्ष 1875 में अंग्रेज अधिकारी मेजर किनकेड इसे धार से निकालकर अपने साथ ले गए थे। तब से लेकर आज तक, वह दिव्य पाषाण प्रतिमा अपनी मिट्टी की खुशबू और अपने भक्तों की पुकार सुनने को बेताब है।

हाई कोर्ट द्वारा परिसर को ‘मंदिर’ घोषित किए जाने के बाद अब इस प्रतिमा की वापसी की कानूनी (Legal) और कूटनीतिक (Diplomatic) संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
कानूनी पेच और कूटनीतिक ‘चक्रव्यूह’
मां वाग्देवी की वापसी का रास्ता जितना आस्था से भरा है, उतना ही कानून की पेचीदगियों से भी घिरा है। अब तक ब्रिटिश सरकार का तर्क रहा है कि ये कलाकृतियां उनके पास ‘कानूनी रूप से’ हैं। लेकिन भारत सरकार के पास अब हाई कोर्ट का वह ‘हथियार’ है, जो यह सिद्ध करता है कि यह प्रतिमा किसी सजावट का सामान नहीं, बल्कि एक सक्रिय धार्मिक केंद्र (Living Shrine) की आराध्य देवी हैं।
- यूनेस्को कन्वेंशन (1970): भारत इस अंतरराष्ट्रीय संधि का सहारा ले सकता है, जो सांस्कृतिक संपदा के अवैध निर्यात और हस्तांतरण को रोकने की बात करती है।
- सांस्कृतिक कूटनीति: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले कुछ वर्षों में भारत ने विदेशों से सैकड़ों चोरी हुई प्रतिमाएं वापस लाने में सफलता पाई है। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा से जिस तरह हमारी विरासत लौटी है, उसने मां वाग्देवी की वापसी की उम्मीद को पंख दे दिए हैं।

वाग्देवी: कला नहीं, आस्था का प्रतीक
दलीलों और ऐतिहासिक दावों से परे हटकर अगर हम देखें, तो यह केवल एक पत्थर की मूरत की वापसी नहीं है। राजा भोज ने भोजशाला को एक विश्वविद्यालय के रूप में स्थापित किया था। वहां विज्ञान, व्याकरण और खगोलशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। मां वाग्देवी उस ज्ञान की अधिष्ठात्री थीं। जब तक वह प्रतिमा अपने मूल स्थान पर नहीं लौटती, तब तक धार की वह सांस्कृतिक चेतना अधूरी मानी जाएगी।

इतिहासकार बताते हैं कि मां वाग्देवी की उस प्रतिमा के आधार पर एक शिलालेख है, जो इसके 1034 ईस्वी में निर्मित होने की पुष्टि करता है। यह साक्ष्य अब ब्रिटिश म्यूजियम के उन दावों को खोखला करने के लिए काफी है कि यह महज एक कलाकृति है।
कब थमेगी मां की प्रतीक्षा?
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय अब एक नई ‘डोजियर’ तैयार कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश दिया जाएगा कि जिस स्थान को भारत की उच्च अदालत ने ‘मंदिर’ माना है, उसकी आराध्य देवी को किसी म्यूजियम में कैद रखना धार्मिक भावनाओं का अपमान है।

कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि जी-20 जैसे मंचों पर भारत अपनी इस सांस्कृतिक गरिमा का मुद्दा उठा सकता है। जैसे ब्रिटेन को ‘कोहिनूर’ के मामले में घेरने की तैयारी होती है, वैसे ही अब ‘वाग्देवी’ की घर वापसी एक राष्ट्रीय मुद्दा बनने जा रही है।
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न्याय का सूरज और आस्था की किरण
धार की गलियों में आज एक ही चर्चा है “न्याय का सूरज तो उग आया है, अब बस मां के आने की देर है।” हाई कोर्ट का फैसला उस न्याय की पहली सीढ़ी है, जिसकी अंतिम मंजिल लंदन का वह म्यूजियम है।
अधिवक्ता कुलदीप तिवारी और उनके जैसे कई योद्धाओं ने जो कानूनी नींव रखी है, उस पर अब कूटनीति का कलश चढ़ना बाकी है। यह लड़ाई लंबी हो सकती है, लेकिन जब सत्य के साथ कानून की शक्ति और आस्था का संबल जुड़ जाता है, तो सात समंदर की दूरियां भी छोटी पड़ जाती हैं। मां वाग्देवी की घर वापसी अब केवल धार की मांग नहीं, बल्कि भारत के उस गौरव की वापसी है जो औपनिवेशिक काल के अंधेरों में कहीं खो गया था।
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