हाईकोर्ट ने मतांतरण से जुड़े एक मामले में कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस गजेंद्रसिंह की कोर्ट ने देवास के सोनकच्छ में आने वाले ग्राम चौबारा जागीर में मतां…और पढ़ें
HighLights
- देवास के सोनकच्छ में दर्ज केस के खिलाफ आरोपित पहुंचे थे हाई कोर्ट
- सोनकच्छ थाने में मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 के तहत केस दर्ज किया गया था
- कुछ महिला, पुरुष और नाबालिगों ने ग्रामीणों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रलोभन दिया था
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। हाईकोर्ट ने मतांतरण से जुड़े एक मामले में कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस गजेंद्रसिंह की कोर्ट ने देवास के सोनकच्छ में आने वाले ग्राम चौबारा जागीर में मतांतरण को लेकर निचली अदालत में आरोप तय किए जाने के आदेश को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में केवल यह देखा जाता है कि क्या अभियुक्तों के विरुद्ध प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है, न कि यह कि विचारण के अंत में दोष सिद्धि होगी या नहीं।
सोनकच्छ थाने में मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 के तहत केस दर्ज किया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि एक बैठक के दौरान कुछ महिला, पुरुष और नाबालिगों ने ग्रामीणों को ईसाई धर्म अपनाने पर बेहतर इलाज की सुविधा, बच्चों को अच्छी शिक्षा और 50 हजार नकद देने का प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करने के लिए कह रहे थे। जिसकी शिकायत 20 जून 2025 को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
आरोप था कि बैठक में मंजी, किरण, जगराम, राय सिंह और मिथुन सहित अन्य लोग मौजूद थे, देवी-देवताओं के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं और लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रहे थे। इसी मामले में ट्रायल कोर्ट में आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया गया था। जिस पर सभी आरोपियों के खिलाफ निचली अदालत ने आरोप तय करते हुए कहा था कि मामले में पर्याप्त सामग्री मौजूद है। इसको चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की गई थी।
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने निर्णय जारी कर दिया है। इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को केवल यह देखना होता है कि क्या गंभीर संदेह उत्पन्न होता है या नहीं। इस स्तर पर विस्तृत साक्ष्य मूल्यांकन या मिनी ट्रायल की अनुमति नहीं है। कोर्ट ने अपने आदेश में शिकायत के बड़े हिस्से को शामिल करते हुए लिखा है कि इस मामले में घोषणा या अनुमति संबंधी आपत्तियां का प्रविधान लागू नहीं होता। कोर्ट ने जांच में मिली सामग्री को आरोपों के लिए सही मानते हुए याचिका को निरस्त कर दिया।
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