पांच साल पहले प्रेम विवाह के बाद हुई चर्चित हत्या के मामले में जिला कोर्ट ने सभी पांच आरोपियों अर्जुन वास्केल, रमेश वास्केल, दिनेश वास्केल, मुकेश वास्केल और महेश गोयल को बरी कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि युवक की हत्या हुई थी और शव जलाकर साक्ष्य मिटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन अभियोजन यह संदेह से परे साबित नहीं कर सका कि हत्या इन्हीं आरोपियों ने की थी। दैनिक भास्कर ने फैसले का अध्ययन किया तो पुलिस जांच की कई गंभीर खामियां सामने आईं, जिनकी वजह से पूरा मामला कोर्ट में टिक नहीं सका। पहले जानिए क्या था मामला मामला फरवरी 2021 का है। खुडैल थाना क्षेत्र के जंगल में एक अधजला शव मिला था। बाद में डीएनए जांच से उसकी पहचान लवकुश राठौर के रूप में हुई। पुलिस जांच में सामने आया कि लवकुश ने संजू नाम की युवती से प्रेम विवाह किया था और इसी रंजिश में युवती के परिजनों ने उसकी हत्या कर शव को जलाकर जंगल में फेंक दिया। हालांकि ट्रायल के दौरान अभियोजन के कई महत्वपूर्ण गवाह अपने ही पुराने बयानों से मुकर गए। मृतक की मां, भाई और कथित प्रत्यक्षदर्शी ने भी पुलिस की कहानी का समर्थन नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल प्रेम विवाह को हत्या का कारण मान लेना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन यह भी साबित नहीं कर पाया कि घटना के समय आरोपी मृतक के साथ थे। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपियों से बरामदगी संबंधी मेमोरेंडम का कोई महत्व नहीं रह जाता, क्योंकि जिन वस्तुओं की बरामदगी बताई गई, उन्हें पुलिस तीन साल पहले ही घटनास्थल से जब्त कर चुकी थी। ऐसे में आरोपियों की निशानदेही से कोई नया तथ्य सामने नहीं आया। इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपियों को हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। बचाव पक्ष ने एडवोकेट अंशुल राठौर ने कोर्ट के समक्ष मुख्य रूप से यह तर्क रखे कि- परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी कड़ी नहीं मिली है। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रत्यक्ष या वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं था, जो आरोपियों को लवकुश की हत्या से सीधे तौर पर जोड़ता हो। पुलिस ने मामले की जांच लापरवाहीपूर्वक की। करीब चार वर्षों तक जांच चलने के बावजूद प्रस्तुत की गई चार्जशीट में कई गंभीर त्रुटियां और खामियां थीं, जिन्हें सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष विस्तार से रखा गया। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पुलिस ने केवल संदेह के आधार पर आरोपियों को गिरफ्तार किया था, जबकि संदेह मात्र किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का आधार नहीं हो सकता। एडवोकेट ने कहा कि कोर्ट ने भी अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि सिर्फ संदेह होना और अपराध सिद्ध होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। अभियोजन आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित नहीं कर सका, इसलिए सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां युवक की हत्या हुई थी और शव जलाकर साक्ष्य मिटाने की कोशिश भी की गई थी। डीएनए जांच से मृतक की पहचान सही साबित हुई। अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि हत्या इन्हीं आरोपियों ने की। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “संदेह कितना भी मजबूत हो, वह साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता। अभियोजन को अपना मामला संदेह से परे सिद्ध करना होता है।” इंदौर के वे चर्चित मामले, जहां कमजोर जांच बनी वजह कविता रैना हत्याकांड इस चर्चित मामले में भी अभियोजन आरोपियों के खिलाफ दोष सिद्ध नहीं कर सका और कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। संजय ठाकरे हत्याकांड भूमाफियाओं के खिलाफ आवाज उठाने वाले रहवासी संघ अध्यक्ष संजय ठाकरे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने सरपंच पति किशोर पटेल सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया था, लेकिन कमजोर पुलिस जांच और पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने के कारण सभी आरोपी बरी हो गए। नजीर बना फैसला यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनमें हत्या होना तो साबित हो जाता है, लेकिन पुलिस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और मजबूत श्रृंखला अदालत के सामने पेश नहीं कर पाती। ऐसे मामलों में संदेह का लाभ आरोपियों को मिलता है और वे दोषमुक्त हो जाते हैं।
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