Taapsee Pannu: परफेक्ट फिगर पाने के लिए तापसी पन्नू ने की हद से ज्यादा कसरत, अब लड़कियों से की यह खास गुजारिश
तापसी पन्नू – फोटो : इंस्टाग्राम-@taapsee
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तापसी पन्नू – फोटो : इंस्टाग्राम-@taapsee
तापसी ने अपने आपको थकाया
तापसी पन्नू ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज पर बताया ‘मुझे याद है कि मुझे सपाट पेट पाने का जुनून था, क्योंकि बड़े होते समय मैं बहुत ज्यादा फिट थी, लेकिन मुझे कभी समझ नहीं आया कि पेट के निचले हिस्से की चर्बी हमेशा क्यों बनी रहती थी। इसे कम करने के लिए मैंने इतनी ज्यादा कसरत की कि मैंने खुद को हद से ज्यादा थका दिया। यह बात बिल्कुल सही है कि जब आप खुद को हद से ज्यादा थकाते हैं, तो आपके दिमाग में एक खतरे की घंटी बजती है कि आपके शरीर को सुरक्षा की जरूरत है।’
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तापसी पन्नू
– फोटो : इंस्टाग्राम-@taapsee
तापसी पन्नू अपने बयानों को लेकर अक्सर चर्चा में रहती हैं। हाल ही में अभिनेत्री ने अपनी बॉडी इमेज से जुड़ी मुश्किलों के बारे में बात की है। उन्होंने बताया है कि उन्होंने स्लिम-फिट दिखने के लिए बहुत मेहनत की। इस कोशिश में उन्होंने अपने आपको परेशान किया। उन्होंने अपनी जिंदगी के उस दौर को याद किया जब उन्हें एक खास तरह का दिखने का बहुत ज्यादा दबाव महसूस होता था।
तापसी ने अपने आपको थकाया
तापसी पन्नू ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज पर बताया ‘मुझे याद है कि मुझे सपाट पेट पाने का जुनून था, क्योंकि बड़े होते समय मैं बहुत ज्यादा फिट थी, लेकिन मुझे कभी समझ नहीं आया कि पेट के निचले हिस्से की चर्बी हमेशा क्यों बनी रहती थी। इसे कम करने के लिए मैंने इतनी ज्यादा कसरत की कि मैंने खुद को हद से ज्यादा थका दिया। यह बात बिल्कुल सही है कि जब आप खुद को हद से ज्यादा थकाते हैं, तो आपके दिमाग में एक खतरे की घंटी बजती है कि आपके शरीर को सुरक्षा की जरूरत है।’
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स्टार प्लस का नया शो फितूर अपने नए प्रोमो के जरिए एक ऐसी कहानी लेकर आया है, जिससे कई लड़कियाँ खुद को जोड़ पाएंगी। यह प्रोमो उन भावनाओं को दिखाता है, जिनसे कई लड़कियाँ पहली बार गर्ल्स स्कूल से निकलकर को-एड कॉलेज में जाने के दौरान गुजरती हैं।
कई लड़कियों के लिए यह सिर्फ कॉलेज की शुरुआत नहीं होती, बल्कि एक नया अनुभव होता है। नए माहौल में घुलना-मिलना, झिझक, घबराहट और अनजान लोगों के बीच खुद को सहज महसूस करना आसान नहीं होता। फितूर इन्हीं भावनाओं को सामने लाते हुए लड़कियों को खुद पर भरोसा रखने और नई शुरुआत को आत्मविश्वास के साथ अपनाने का संदेश देता है।

प्रोमो पर बात करते हुए देबचंद्रिमा सिंहा रॉय ने कहा, "इस प्रोमो ने मुझे बहुत छू लिया क्योंकि यह ऐसी यात्रा है, जिससे बहुत-सी लड़कियाँ गुजरती हैं। गर्ल्स स्कूल के बाद पहली बार को-एड कॉलेज में जाना कई लड़कियों के लिए आसान नहीं होता। मुझे उम्मीद है कि जो भी लड़की यह प्रोमो देखेगी, उसे लगेगा कि उसकी भावनाओं को समझा गया है। घबराना बिल्कुल सामान्य है। समय और खुद पर भरोसे के साथ हर नई शुरुआत एक खूबसूरत अध्याय बन जाती है।"
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स्टार प्लस का नया शो फितूर अपने नए प्रोमो के जरिए एक ऐसी कहानी लेकर आया है, जिससे कई लड़कियाँ खुद को जोड़ पाएंगी। यह प्रोमो उन भावनाओं को दिखाता है, जिनसे कई लड़कियाँ पहली बार गर्ल्स स्कूल से निकलकर को-एड कॉलेज में जाने के दौरान गुजरती हैं।
कई लड़कियों के लिए यह सिर्फ कॉलेज की शुरुआत नहीं होती, बल्कि एक नया अनुभव होता है। नए माहौल में घुलना-मिलना, झिझक, घबराहट और अनजान लोगों के बीच खुद को सहज महसूस करना आसान नहीं होता। फितूर इन्हीं भावनाओं को सामने लाते हुए लड़कियों को खुद पर भरोसा रखने और नई शुरुआत को आत्मविश्वास के साथ अपनाने का संदेश देता है।

प्रोमो पर बात करते हुए देबचंद्रिमा सिंहा रॉय ने कहा, "इस प्रोमो ने मुझे बहुत छू लिया क्योंकि यह ऐसी यात्रा है, जिससे बहुत-सी लड़कियाँ गुजरती हैं। गर्ल्स स्कूल के बाद पहली बार को-एड कॉलेज में जाना कई लड़कियों के लिए आसान नहीं होता। मुझे उम्मीद है कि जो भी लड़की यह प्रोमो देखेगी, उसे लगेगा कि उसकी भावनाओं को समझा गया है। घबराना बिल्कुल सामान्य है। समय और खुद पर भरोसे के साथ हर नई शुरुआत एक खूबसूरत अध्याय बन जाती है।"
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Fitoor,emotional journey,girls,college, Hindi news">‘फितूर’ में दिखेगा को-एड कॉलेज में कदम रखने वाली लड़कियों का भावनात्मक सफर
स्टार प्लस का नया शो फितूर अपने नए प्रोमो के जरिए एक ऐसी कहानी लेकर आया है, जिससे कई लड़कियाँ खुद को जोड़ पाएंगी। यह प्रोमो उन भावनाओं को दिखाता है, जिनसे कई लड़कियाँ पहली बार गर्ल्स स्कूल से निकलकर को-एड कॉलेज में जाने के दौरान गुजरती हैं।
कई लड़कियों के लिए यह सिर्फ कॉलेज की शुरुआत नहीं होती, बल्कि एक नया अनुभव होता है। नए माहौल में घुलना-मिलना, झिझक, घबराहट और अनजान लोगों के बीच खुद को सहज महसूस करना आसान नहीं होता। फितूर इन्हीं भावनाओं को सामने लाते हुए लड़कियों को खुद पर भरोसा रखने और नई शुरुआत को आत्मविश्वास के साथ अपनाने का संदेश देता है।

प्रोमो पर बात करते हुए देबचंद्रिमा सिंहा रॉय ने कहा, "इस प्रोमो ने मुझे बहुत छू लिया क्योंकि यह ऐसी यात्रा है, जिससे बहुत-सी लड़कियाँ गुजरती हैं। गर्ल्स स्कूल के बाद पहली बार को-एड कॉलेज में जाना कई लड़कियों के लिए आसान नहीं होता। मुझे उम्मीद है कि जो भी लड़की यह प्रोमो देखेगी, उसे लगेगा कि उसकी भावनाओं को समझा गया है। घबराना बिल्कुल सामान्य है। समय और खुद पर भरोसे के साथ हर नई शुरुआत एक खूबसूरत अध्याय बन जाती है।"
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इन घटनाओं से सड़कें, घर, खेती की जमीन और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हुआ है और केंद्र शासित प्रदेश के कई हिस्सों में संपर्क व्यवस्था बाधित हुई है। हाल की घटनाओं में से एक डोडा जिले के भलेसा इलाके से सामने आई, जहां अचानक आई बाढ़ अपने साथ कीचड़ और मलबा सड़कों पर ले आई, जिससे कई अंदरूनी गांवों तक पहुंच कट गई।
इस महीने की शुरुआत में उत्तरी कश्मीर की तुलेल घाटी और गुरेज में भी कई बार बादल फटे, जिससे सड़कें और अन्य बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो गया।
7 जुलाई को डोडा जिले के ठाठरी के ऊपरी इलाकों में बादल फटा, जिससे बाढ़ का पानी और मलबा शहर में घुस गया। कई वाहन और दुकानें क्षतिग्रस्त हो गईं, और बहाली का काम शुरू होने से पहले डोडा-किश्तवाड़ नेशनल हाईवे पर यातायात बाधित रहा।
बादलों के फटने का क्रम यहीं नहीं रूका था और इस महीने की शुरुआत में, अधिकारियों ने चिनाब घाटी और उससे सटे ऊंचे इलाकों में लगभग 12 घंटों के भीतर 12 स्थानीय बादल फटने की घटनाओं को भी दर्ज किया, जिससे कई जगहों पर अचानक बाढ़ और जमीन खिसकने की घटनाएं हुईं। 11 जुलाई को अनंतनाग जिले के अवूरा और देहवाथु के वन क्षेत्रों में बादल फटने की दो घटनाएं सामने आईं। ओवेरा धारा के जलस्तर में अचानक वृद्धि से आस-पास के इलाके जलमग्न हो गए, जिसमें पहलगाम पर्यटक स्थल के होटल भी शामिल थे।
इंटरनेशनल जर्नल आफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन’ में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन, जिसमें जम्मू कश्मीर में बादल फटने और भारी बारिश की 68 घटनाओं का विश्लेषण किया गया, ने पुलवामा जिले में श्री अमरनाथ जी बेसिन और त्राल तहसील को सबसे संवेदनशील स्थानों के रूप में चिह्नित किया। शोधकर्ताओं ने कहा कि बार-बार होने वाली अत्यधिक बारिश ने इन क्षेत्रों में अचानक बाढ़, मलबे के बहाव और जमीन खिसकने के जोखिम को बढ़ा दिया है।
उत्तर-पश्चिमी हिमालय में बुनियादी ढांचे की कमजोरी की जांच करने वाली एक और स्टडी में पाया गया कि तीन घंटे में लगभग 40 मिमी और एक दिन में 60 से 140 मिमी बारिश से अचानक बाढ़ (फलैश फलड) और ढलान खिसकने जैसी घटनाएं हो सकती हैं, खासकर जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे जैसे ट्रांसपोर्ट कारिडोर के पास।
रिसर्चर्स का कहना है कि इन नतीजों से पता चलता है कि पहाड़ी इलाकों में बेहतर खतरा मैपिंग, मौसम की निगरानी, जमीन के इस्तेमाल की प्लानिंग और समय रहते चेतावनी देने वाले सिस्टम की जरूरत है, क्योंकि वहां कम समय में तेज बारिश की घटनाएं अधिक हो रही हैं।
मौसम विभाग के डेटा के अनुसार, पिछले दशक में जम्मू कश्मीर में स्थानीय स्तर पर मौसम की चरम घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है। इस ट्रेंड की वजह तापमान का बढ़ना, वायुमंडलीय सर्कुलेशन में बदलाव और ग्लेशियर का दायरा कम होना है, जो पश्चिमी हिमालय में बारिश और बर्फबारी के पैटर्न को बदल रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि भविष्य में मौसम की चरम घटनाओं के असर को कम करने के लिए फोरकास्टिंग सिस्टम को मजबूत करना, संवेदनशील इलाकों में निर्माण कार्यों को रेगुलेट करना और कम्युनिटी लेवल पर आपदा की तैयारी को बेहतर बनाना जरूरी होगा।
इन घटनाओं से सड़कें, घर, खेती की जमीन और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हुआ है और केंद्र शासित प्रदेश के कई हिस्सों में संपर्क व्यवस्था बाधित हुई है। हाल की घटनाओं में से एक डोडा जिले के भलेसा इलाके से सामने आई, जहां अचानक आई बाढ़ अपने साथ कीचड़ और मलबा सड़कों पर ले आई, जिससे कई अंदरूनी गांवों तक पहुंच कट गई।
इस महीने की शुरुआत में उत्तरी कश्मीर की तुलेल घाटी और गुरेज में भी कई बार बादल फटे, जिससे सड़कें और अन्य बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो गया।
7 जुलाई को डोडा जिले के ठाठरी के ऊपरी इलाकों में बादल फटा, जिससे बाढ़ का पानी और मलबा शहर में घुस गया। कई वाहन और दुकानें क्षतिग्रस्त हो गईं, और बहाली का काम शुरू होने से पहले डोडा-किश्तवाड़ नेशनल हाईवे पर यातायात बाधित रहा।
बादलों के फटने का क्रम यहीं नहीं रूका था और इस महीने की शुरुआत में, अधिकारियों ने चिनाब घाटी और उससे सटे ऊंचे इलाकों में लगभग 12 घंटों के भीतर 12 स्थानीय बादल फटने की घटनाओं को भी दर्ज किया, जिससे कई जगहों पर अचानक बाढ़ और जमीन खिसकने की घटनाएं हुईं। 11 जुलाई को अनंतनाग जिले के अवूरा और देहवाथु के वन क्षेत्रों में बादल फटने की दो घटनाएं सामने आईं। ओवेरा धारा के जलस्तर में अचानक वृद्धि से आस-पास के इलाके जलमग्न हो गए, जिसमें पहलगाम पर्यटक स्थल के होटल भी शामिल थे।
इंटरनेशनल जर्नल आफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन’ में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन, जिसमें जम्मू कश्मीर में बादल फटने और भारी बारिश की 68 घटनाओं का विश्लेषण किया गया, ने पुलवामा जिले में श्री अमरनाथ जी बेसिन और त्राल तहसील को सबसे संवेदनशील स्थानों के रूप में चिह्नित किया। शोधकर्ताओं ने कहा कि बार-बार होने वाली अत्यधिक बारिश ने इन क्षेत्रों में अचानक बाढ़, मलबे के बहाव और जमीन खिसकने के जोखिम को बढ़ा दिया है।
उत्तर-पश्चिमी हिमालय में बुनियादी ढांचे की कमजोरी की जांच करने वाली एक और स्टडी में पाया गया कि तीन घंटे में लगभग 40 मिमी और एक दिन में 60 से 140 मिमी बारिश से अचानक बाढ़ (फलैश फलड) और ढलान खिसकने जैसी घटनाएं हो सकती हैं, खासकर जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे जैसे ट्रांसपोर्ट कारिडोर के पास।
रिसर्चर्स का कहना है कि इन नतीजों से पता चलता है कि पहाड़ी इलाकों में बेहतर खतरा मैपिंग, मौसम की निगरानी, जमीन के इस्तेमाल की प्लानिंग और समय रहते चेतावनी देने वाले सिस्टम की जरूरत है, क्योंकि वहां कम समय में तेज बारिश की घटनाएं अधिक हो रही हैं।
मौसम विभाग के डेटा के अनुसार, पिछले दशक में जम्मू कश्मीर में स्थानीय स्तर पर मौसम की चरम घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है। इस ट्रेंड की वजह तापमान का बढ़ना, वायुमंडलीय सर्कुलेशन में बदलाव और ग्लेशियर का दायरा कम होना है, जो पश्चिमी हिमालय में बारिश और बर्फबारी के पैटर्न को बदल रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि भविष्य में मौसम की चरम घटनाओं के असर को कम करने के लिए फोरकास्टिंग सिस्टम को मजबूत करना, संवेदनशील इलाकों में निर्माण कार्यों को रेगुलेट करना और कम्युनिटी लेवल पर आपदा की तैयारी को बेहतर बनाना जरूरी होगा।
इन घटनाओं से सड़कें, घर, खेती की जमीन और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हुआ है और केंद्र शासित प्रदेश के कई हिस्सों में संपर्क व्यवस्था बाधित हुई है। हाल की घटनाओं में से एक डोडा जिले के भलेसा इलाके से सामने आई, जहां अचानक आई बाढ़ अपने साथ कीचड़ और मलबा सड़कों पर ले आई, जिससे कई अंदरूनी गांवों तक पहुंच कट गई।
इस महीने की शुरुआत में उत्तरी कश्मीर की तुलेल घाटी और गुरेज में भी कई बार बादल फटे, जिससे सड़कें और अन्य बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो गया।
7 जुलाई को डोडा जिले के ठाठरी के ऊपरी इलाकों में बादल फटा, जिससे बाढ़ का पानी और मलबा शहर में घुस गया। कई वाहन और दुकानें क्षतिग्रस्त हो गईं, और बहाली का काम शुरू होने से पहले डोडा-किश्तवाड़ नेशनल हाईवे पर यातायात बाधित रहा।
बादलों के फटने का क्रम यहीं नहीं रूका था और इस महीने की शुरुआत में, अधिकारियों ने चिनाब घाटी और उससे सटे ऊंचे इलाकों में लगभग 12 घंटों के भीतर 12 स्थानीय बादल फटने की घटनाओं को भी दर्ज किया, जिससे कई जगहों पर अचानक बाढ़ और जमीन खिसकने की घटनाएं हुईं। 11 जुलाई को अनंतनाग जिले के अवूरा और देहवाथु के वन क्षेत्रों में बादल फटने की दो घटनाएं सामने आईं। ओवेरा धारा के जलस्तर में अचानक वृद्धि से आस-पास के इलाके जलमग्न हो गए, जिसमें पहलगाम पर्यटक स्थल के होटल भी शामिल थे।
इंटरनेशनल जर्नल आफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन’ में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन, जिसमें जम्मू कश्मीर में बादल फटने और भारी बारिश की 68 घटनाओं का विश्लेषण किया गया, ने पुलवामा जिले में श्री अमरनाथ जी बेसिन और त्राल तहसील को सबसे संवेदनशील स्थानों के रूप में चिह्नित किया। शोधकर्ताओं ने कहा कि बार-बार होने वाली अत्यधिक बारिश ने इन क्षेत्रों में अचानक बाढ़, मलबे के बहाव और जमीन खिसकने के जोखिम को बढ़ा दिया है।
उत्तर-पश्चिमी हिमालय में बुनियादी ढांचे की कमजोरी की जांच करने वाली एक और स्टडी में पाया गया कि तीन घंटे में लगभग 40 मिमी और एक दिन में 60 से 140 मिमी बारिश से अचानक बाढ़ (फलैश फलड) और ढलान खिसकने जैसी घटनाएं हो सकती हैं, खासकर जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे जैसे ट्रांसपोर्ट कारिडोर के पास।
रिसर्चर्स का कहना है कि इन नतीजों से पता चलता है कि पहाड़ी इलाकों में बेहतर खतरा मैपिंग, मौसम की निगरानी, जमीन के इस्तेमाल की प्लानिंग और समय रहते चेतावनी देने वाले सिस्टम की जरूरत है, क्योंकि वहां कम समय में तेज बारिश की घटनाएं अधिक हो रही हैं।
मौसम विभाग के डेटा के अनुसार, पिछले दशक में जम्मू कश्मीर में स्थानीय स्तर पर मौसम की चरम घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है। इस ट्रेंड की वजह तापमान का बढ़ना, वायुमंडलीय सर्कुलेशन में बदलाव और ग्लेशियर का दायरा कम होना है, जो पश्चिमी हिमालय में बारिश और बर्फबारी के पैटर्न को बदल रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि भविष्य में मौसम की चरम घटनाओं के असर को कम करने के लिए फोरकास्टिंग सिस्टम को मजबूत करना, संवेदनशील इलाकों में निर्माण कार्यों को रेगुलेट करना और कम्युनिटी लेवल पर आपदा की तैयारी को बेहतर बनाना जरूरी होगा।
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