नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : हमने प्रकृति के विज्ञान को नहीं पढ़ा। मानसून प्रकृति का अपना प्रबंधन था। अब पेड़ लगाने का जमाना जा चुका है, हमें पानी लगाना होगा। नदियों को पुर्नीजवित करना होगा। जब नदी में पानी आता है तो सबकुछ लौटकर आता है।
हमने उत्तराखंड की एक नदी को जीवित करने के लिए वहां दो सौ वाटर होल बनाए। वर्षा जल उसमें जमा किया। अगले वर्ष ही नदी का पानी बढ़ गया। इसके साथ ही आस-पास पेड़ भी उगना शुरू हो गए और कई जीवों से जंगल को अपना ठिकाना बनाना शुरू कर दिया।
कई बार उत्तराखंड के अन्य वन्य क्षेत्रों में आग लग जाती है, लेकिन वहां आग नहीं लगती, क्योंकि जमीन में नमी बनी रहती है। यह बातें पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कही। वे सेवा सुरभि द्वारा क्यों रूठ जाती है प्रकृति विषय पर संबोधित कर रहे थे।
डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि आज कम होते पानी की समस्या सिर्फ इंदौर की नहीं है, बल्कि यह देशभर की समस्या बन चुकी है। यह अच्छी बात है कि भारत ट्रापिकल कंट्री में आता है। आज फ्रांस और अन्य यूरोपिय देशों की हालत खराब हो चुकी है। यदि हम ट्रापिकल कंट्री में नहीं होते तो 46 डिग्री का तापमाल नहीं झेल पाते हैं। भारत अब एग्रेसिव इकोनामी की ओर जा रह है। आप किेसी भी देश या धर्म के हो, लेकिन प्रकृति सिर्फ एक ही है। हमें प्रकृति को स्वीकार करना ही होगा। एक समय यूरोप स्वर्ग हुआ करता था, लेकिन आज नर्क बन चुका है।
प्रकृति के विज्ञान को पढ़ना होगा
डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि हम आज यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि हम कौन से मौसम की ओर जा रहे हैं। फरवरी में मई-जून जैसी गर्मी पड़ रही है। अब वर्षा भी समय से पहले हो जाती है। हमने सब बिखेर दिया है। हमें अब अपने अंदर झांकरकर देखना होगा। हमने मानसून की दशा और दिशा दोनो बदल कदी है। इंदौर को भी रिमैपिंग की जरूरत है, क्योंकि यहां से काफी कुछ जा चुका है। ऐसे में जो जा चुका है, उसे लाने के प्रयास करने होंगे और प्रकृति के विज्ञान को पढ़ना होगा।
डॉ. जोशी ने बताया कि 70 हजार साल पहले मानव भी जानवर हुआ करता है। बाद में होमोसेपियंस अलग हो गए और अफ्रीका से विभिन्न देश होते हुए अंत में अमेरिका पहुंचे। इस दौरान होमोसेपियंस ने अपनी बुद्धि का उपयोग करना भी शुरू कर दिया। मानव ने दस हजार साल पहले खेती की शुरुआत की और यही सबसे बड़ा फ्राड था। हम खेती के ट्रेप में फंस चुके हैं। हमने जंगल काटे, जानवरों को मारा और एक प्रकार से सीरियल किलर हो चुके है। उन्होंने कहा कि दुनिया में बीस हजार जिराफ ही बचे हैं, जबकि कैटल्स की संख्या दो बिलियन है, क्योंकि हमे इनकी आवश्यकता है। इसी तरह वाफ भी बहुत कम बचे हैं, लेेकिन पालतू कुत्तों की संख्या 400 मिलियन पार हो गई। हमें जिसकी जरूरत थी, हमने उनकी संख्या बढ़ाई।
जितना ज्यादा पानी होगा, उतना प्रदूषण कम होगा
डॉ. जोशी ने कहा कि दुनिया बदल चुकी है, हम विकास को नहीं रोक सकते। अब आदमी की आदमी से लड़ाई चल रही है। अब जान बचाने का समय है। उन्होंने कहा कि हम इतने इंटेलिजेंट हो गए कि इंटेलिजेंस को आर्टिफिशियल बना लिया। हमें नेचुरल इंटेलिजेंस पर काम करना होगा। हमनें पिछले तीस से चालीस सालों में जंगल बनाने के प्रयास किए, लेकिन कहीं जंगल नहीं बस पाया। जितना ज्यदा पानी होगा, उतना प्रदूषण कम होगा।
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