नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष पेश रिपोर्ट के बाद भागीरथपुरा दूषित पानी कांड में अधिकारियों की जवाबदेही का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। एनजीटी ने स्पष्ट कहा है कि जलापूर्ति संचालन, रखरखाव और निगरानी में लापरवाही करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
दरअसल शासन ने मामले में जिम्मेदारों के विरुद्ध अब तक जितनी भी कार्रवाई की वह कागजी भरपाई नजर आती है। चौकाने वाली बात तो यह कि 36 अप्राकृतिक मौतें होतें के बावजूद मर्ग कायम कर जांच की जरूरत नहीं समझी गई। इक्का-दुक्का अधिकारियों के ट्रांसफर और छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर शासन ने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली।
दिसंबर 2025 के अंत में इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने की वजह से मौत का सिलसिला शुरू हुआ था। देखते ही देखते दूषित पानी पीने से 36 लोगों की मौत हो गई। लापरवाही की हद तो यह कि दूषित पानी की वजह से क्षेत्र के रहवासियों के बीमार होने का सिलसिला 10 दिन पहले से शुरू हो गया था, लेकिन न नगर निगम ने इस पर ध्यान दिया न स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने। लगातार मौत के बाद देशभर में बवाल मचा जिसके बाद छह लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई। इनमें से तत्कालीन निगमायुक्त और अपर आयुक्त वर्तमान में भोपाल में उच्च पदों पर पदस्थ हैं। जिन छोटे कर्मचारियों को निलंबित किया गया था, वे जरूर फिलहाल निलंबित हैं।
इनके विरुद्ध हुई थी कार्रवाई
- तत्कालीन निगमायुक्त दिलीपकुमार यादव – हादसे के बाद शासन ने हटा दिया था। वर्तमान में पर्यटन विकास निगम में प्रबंध निदेशक (एमडी) हैं।
- तत्कालीन अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया – नोटिस, ट्रांसफर फिर निलंबन, वर्तमान में कृषि विकास विभाग में उप सचिव के रूप में पदस्थ हैं।
- तत्कालीन प्रभारी अधीक्षण यंत्री संजीव श्रीवास्तव – निलंबित, वर्तमान में भी निलंबित हैं।
- इसके अलावा जोनल अधिकारी शालीग्राम सितोले, सहायक यंत्री योगेश जोशी को निलंबित किया गया था। जबकि उपयंत्री शुभम श्रीवास्तव की सेवा समाप्त कर दी गई।
विभाग की जांच का क्या हुआ किसी को नहीं पता
भागीरथपुरा मामले में नगर निगम ने भी अपने स्तर पर जांच शुरू की थी, लेकिन यह हादसे की वजह तलाशने से आगे नहीं बढ़ सकी। आज तक किसी को नहीं पता कि भागीरथपुरा में दूषित पानी आखिर लोगों के घर तक पहुंचा कैसे था। जांच के दौरान यह बात सामने आई थी कि पुलिस चौकी के पास शौचालय से निकला सीवेज पीने की लाइन में मिला जिसकी वजह से हादसा हुआ, हालांकि इसकी कोई पुष्टि आज तक नहीं हुई।
आज तक तय नहीं हुई जिम्मेदारी
हादसे के बाद जोरशोर से दावे किए गए थे कि जिम्मेदारी तय की जाएगी, लेकिन हादसे के सात माह बाद भी यह तय नहीं हो सका कि भागीरथपुरा में दूषित पानी किस अधिकारी की लापरवाही से पहुंचा था। जिन अधिकारियों को इंदौर से हटाया गया था वे आज उच्च पदों पर पदस्थ हैं। हादसे को लेकर आधा दर्जन जनहित याचिकाएं हाई कोर्ट में लंबित हैं। इनकी सुनवाई के दौरान भी जिम्मेदारी तय करने की बात उठ चुकी है।
बोरिंग की जांच ही बंद हो गई
हादसे के बाद एनजीटी ने आइआइटी इंदौर, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, सिंचाई विभाग और नगरीय प्रशासन विभाग के अधिकारियों सहित पांच लोगों की कमेटी बनाई थी। कमेटी ने भागीरथपुरा में नर्मदा पेयजल व बोरिंग के पानी की जांच की थी। इसमें बोरिंग के पानी में ई-कोलाई मिलने की पुष्टि हुई थी। यही रिपोर्ट में पांच सदस्यों की कमेटी ने एनजीटी को सौंपी है। इधर हादसे के बाद नगर निगम ने दूषित पानी देने वाले बोरिंग के पास बोरिंग का पानी दूषित है की सूचना लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। इनमें से ज्यादातर बोरिंग का पानी आज भी इस्तेमाल हो रहा है।
क्या अब नगर निगम भी देगा पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति?
भागीरथपुरा जल त्रासदी की जांच रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में यह मांग उठाई गई है कि यदि किसी शहरी स्थानीय निकाय की लापरवाही से दूषित पेयजल लोगों तक पहुंचा और उससे पर्यावरण व जनस्वास्थ्य को नुकसान हुआ, तो उस पर ‘प्रदूषण फैलाने वाला ही क्षतिपूर्ति करेगा’ सिद्धांत और ‘पूर्ण दायित्व’ के सिद्धांत के तहत आर्थिक जिम्मेदारी तय की जाए।
क्या है ”प्रदूषण फैलाने वाला ही क्षतिपूर्ति करेगा” सिद्धांत?
इस सिद्धांत का अर्थ है कि जो व्यक्ति, संस्था या एजेंसी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगी, वही उसके सुधार, पुनर्स्थापन और उससे हुई क्षति की भरपाई करेगी। अब तक इसका उपयोग मुख्य रूप से उद्योगों, खनन, ठोस अपशिष्ट और सीवेज प्रदूषण के मामलों में किया जाता रहा है।
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