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जिजीविषा: क्या भारत दुनिया को प्रकृति-केंद्रित विकास सिखा सकता है?

जिजीविषा: क्या भारत दुनिया को प्रकृति-केंद्रित विकास सिखा सकता है?

क्या जलवायु परिवर्तन का समाधान केवल नई तकनीकों, विशाल सौर संयंत्रों और अरबों डॉलर के निवेश में छिपा है? या फिर इसका उत्तर उस जीवन-दृष्टि में भी निहित है, जिसने सदियों पहले मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका सहभागी माना था? यह प्रश्न आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का विषय, “Inspired by Nature: For Climate, For Our Future”, हमें बताता है कि जलवायु संकट का समाधान केवल प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि प्रकृति से हमारे संबंधों में भी खोजा जाना चाहिए।

पिछले तीन दशकों में वैश्विक जलवायु विमर्श मुख्यतः तकनीक-केंद्रित रहा है।

स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, कार्बन कैप्चर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों को जलवायु समाधान के प्रमुख साधन के रूप में देखा गया है। इनकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता, किंतु आज अनेक पर्यावरण विशेषज्ञ यह स्वीकार कर रहे हैं कि केवल तकनीकी प्रगति पर्याप्त नहीं होगी। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, वैश्विक उत्सर्जन में कमी के साथ-साथ जीवनशैली, उपभोग के पैटर्न और प्रकृति-आधारित समाधानों में परिवर्तन भी उतना ही आवश्यक है।

किन्तु भारत के पास अन्य देशों से अधिक अनुभव है क्योंकि भारतीय परंपरा में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना गया। अथर्ववेद का प्रसिद्ध वाक्य: “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात् “पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ”: मानव और प्रकृति के बीच एक ऐसे संबंध की कल्पना करता है, जिसमें अधिकार से अधिक उत्तरदायित्व का भाव है। यही विचार आधुनिक पर्यावरणीय सिद्धांतों, विशेषकर ‘इकोसेंट्रिज्म’ (Ecocentrism), से मेल खाता है, जो मनुष्य को प्रकृति का केंद्र नहीं, बल्कि उसके व्यापक तंत्र का एक हिस्सा मानता है।

आज दुनिया जिस अवधारणा को “Nature-Based Solutions” कह रही है, भारत उसकी अनेक मिसालें सदियों से प्रस्तुत करता आया है। राजस्थान के जोहड़, उत्तराखंड के पारंपरिक जलस्रोत, पूर्वोत्तर भारत के सामुदायिक वन, पश्चिमी घाटों के पवित्र उपवन और विभिन्न क्षेत्रों की जल संरक्षण परंपराएँ इस बात का प्रमाण हैं कि स्थानीय समुदाय प्रकृति के साथ मिलकर विकास का मार्ग खोज सकते हैं। वैज्ञानिक शोध भी यह दर्शाते हैं कि आर्द्रभूमियाँ, मैंग्रोव वन, प्राकृतिक जलागम क्षेत्र और जैव-विविधता संपन्न पारिस्थितिक तंत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में अत्यंत प्रभावी हैं।

बड़े परिवर्तन ला सकते हैं

भारत ने हाल के वर्षों में इस सोच को वैश्विक मंच पर भी प्रस्तुत किया है। 2022 में शुरू किया गया ‘मिशन LiFE’: Lifestyle for Environment, इस बात पर आधारित है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों और उद्योगों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जीवनशैली का हिस्सा होना चाहिए। ऊर्जा की बचत, जल संरक्षण, पुनर्चक्रण, टिकाऊ उपभोग और स्थानीय संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग जैसे छोटे कदम करोड़ों लोगों के स्तर पर बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। यह दृष्टिकोण पश्चिमी उपभोक्तावाद के उस मॉडल से भिन्न है, जिसमें विकास को प्रायः अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग से जोड़ा जाता रहा है।

भारत की वैश्विक भूमिका केवल विचारों तक सीमित नहीं है। देश ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के माध्यम से विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने का प्रयास किया है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कार्यक्रम, जैविक खेती को प्रोत्साहन और जल संरक्षण अभियान इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। किंतु भारत की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसकी नीतियाँ नहीं, बल्कि वह सांस्कृतिक दृष्टि है जो विकास और प्रकृति को परस्पर विरोधी नहीं मानती।

21वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं

वास्तव में, 21वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हम कितनी तेज़ी से विकास कर सकते हैं, बल्कि यह है कि हम किस प्रकार का विकास चाहते हैं। यदि विकास का अर्थ केवल संसाधनों का अधिक दोहन है, तो जलवायु संकट और गहरा होगा। लेकिन यदि विकास का अर्थ मानव कल्याण, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व का समन्वय है, तो एक नया मार्ग संभव है।

आज दुनिया को केवल नई तकनीकों की नहीं, बल्कि नई सोच की आवश्यकता है। भारत के पास दोनों हैं: आधुनिक नवाचार भी और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का प्राचीन ज्ञान भी। संभव है कि जलवायु परिवर्तन के समाधान की अगली बड़ी कहानी किसी अत्याधुनिक प्रयोगशाला से नहीं, बल्कि उस विचार से जन्म ले, जिसे भारत सदियों से जीता आया है: प्रकृति पर विजय नहीं, प्रकृति के साथ विकास। यही दृष्टि भारत को केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि भविष्य की हरित सभ्यता का मार्गदर्शक बना सकती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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