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देवी अहिल्याबाई होलकर ने महेश्वर को राजधानी बनाकर लहराई धर्म ध्वजा

देवी अहिल्याबाई होलकर ने महेश्वर को राजधानी बनाकर लहराई धर्म ध्वजा

यह जानकारी इतिहास अध्येता सुनील मतकर ने देते हुए बताया कि सर जान मालकम के अनुसार, अहिल्यादेवी द्वारा निर्मित सिद्धनाथ (हंडिया) मंदिर, मध्य भारत का सबसे सुंदर मंदिर शिल्प है। वे कहते हैं कि अहिल्यादेवी इतनी दयालु थीं कि उन्हें खड़ी फसलों से पक्षियों को भगाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली गुलेल पसंद नहीं थी। वह कहती थीं, ‘हम निर्दोष पक्षियों को भूखा क्यों मारें?’ इसलिए उन्होंने खेती की जमीन का एक हिस्सा पक्षियों के लिए आरक्षित करने का कानून बनाया, यानी आज के अभयारण्य की कल्पना उन्होंने बहुत पहले ही कर ली थी।

मछलियों को आटा और चींटियों को गुड़ खिलाना उनकी दिनचर्या थी।

वे नियमित रूप से गो-सेवा करती थीं, और नर्मदा में मछलियों को मावशीबाई, आत्याबाई, राम राया नाम देकर उन्हें खाना खिलाती थीं। अहिल्यादेवी दान देने में भी विवेकशील थीं, दान देकर वह कभी मुक्त नहीं होना चाहती थीं। उन्होंने दान की व्यवस्था के लिए पूरे देश में नियुक्तियां कर रखी थीं, वह सचेत रूप से ऐसी व्यवस्था करती थीं कि उनके बाद कोई जब्ती और मुकदमा न हो। उनके शासनकाल में भारत में दान का एक नया मानक स्थापित हुआ। वह ब्राह्मणों को पुस्तकें दान करती थीं, इसी कारण महेश्वर में हस्तलिखित पुस्तकें लिखने वाले लेखकों को आशीर्वाद प्राप्त था।

उनके ग्रंथों और पुराणों का संग्रह बहुत बड़ा था। वह नियमित रूप से धार्मिक ग्रंथों का श्रवण करती थीं। अहिल्यादेवी के धार्मिक साहित्य संग्रह में प्रमुख ग्रंथ हैं: रामायण, महाभारत, भागवत, ज्ञानेश्वरी, स्वयंवराख्यान, रसमंजरी, रघुवंश, विष्णु सहस्रनाम, वेंकटेश स्तोत्र, दान चंद्रिका, मुहूर्त चिंतामणि, निर्वाण सिंधु, अनुवेदांत, मथुरा महात्म्य, अध्यात्म रामायण सप्तकांड, स्वर्गारोहण, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, मल्हारी कवच, मल्हार स्तवनराज, चंद्रिका पूजा विधान, सिंहस्थ स्नान रीति, भैरव तंत्रोत्तममन्यु स्तोत्र, विष्णु प्रतिष्ठा पादशी, गायत्री पादशी, नारायण उपनिषद, पद्म पुराण द्वारा उच्चारित मल्हारी सहस्रनाम, तिथ्यर्क, मार्गशीर्ष महात्म्य, यमुना महात्म्य, संवर्तक प्रणीत धर्मशास्त्र, स्वप्नाध्याय आदि का उल्लेख ‘होलकर शाहीच्या इतिहासाची साधने, होलकरांची थैली’ में किया गया है। वे कहती थीं, ‘यह मेरा नहीं, प्रजा का है, मैंने जो लिया है वह कर्ज है, यह मैं कैसे चूका पाऊंगी?’

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