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धोखाधड़ी और न्याय साथ-साथ नहीं चल सकते; फर्जी दुर्घटना केस खारिज करते हुए इंदौर जिला कोर्ट ने कहा

धोखाधड़ी और न्याय साथ-साथ नहीं चल सकते; फर्जी दुर्घटना केस खारिज करते हुए इंदौर जिला कोर्ट ने कहा

इस टिप्पणी के साथ जिला न्यायालय के जज संजीव सिंह ने दुर्घटना की फर्जी कहानी गढ़कर प्रस्तुत किए गए क्षतिपूर्ति के तीन प्रकरणों को निरस्त कर दिया। मामले…और पढ़ें

Publish Date: Fri, 24 Jul 2026 11:01:56 AM (IST)Updated Date: Fri, 24 Jul 2026 11:01:56 AM (IST)

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. पुलिस अधीक्षक को जांच अधिकारी सहित अन्य की जांच के लिए भेजी निर्णय की प्रति
  2. दुर्घटना में शामिल नहीं रही कार को झूठा फंसाने के लिए दुर्घटना की मनगढ़ंत कहानी गढ़ी
  3. तीन मृतकों के आश्रितों के लिए मांगी गई थी क्षतिपूर्ति राशि

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि धोखाधड़ी और न्याय साथ-साथ नहीं चल सकते। न्यायिक प्रक्रिया के साथ छल स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस टिप्पणी के साथ जिला न्यायालय के जज संजीव सिंह ने दुर्घटना की फर्जी कहानी गढ़कर प्रस्तुत किए गए क्षतिपूर्ति के तीन प्रकरणों को निरस्त कर दिया। मामले में जांच अधिकारी और अन्य की भूमिका को संदिग्ध मानते हुए कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक को इस निर्णय की प्रति भेजने के लिए कहा है ताकि वे जांच कर सकें।

एडवोकेट संजय मेहरा ने बताया कि प्रकरणों में दावा किया गया था कि 23 जुलाई 2023 को कालूलाल, प्रकाशचंद और कमलेश मोटर साइकिल पर सवार होकर जा रहे थे। इसी दौरान पीछे से आई कार ने उन्हें टक्कर मार दी जिससे तीनों की मृत्यु हो गई।

दुर्घटना के आधार पर मृतक कालूलाल और प्रकाशचंद के आश्रितों ने 40-40 लाख रुपये और कमलेश के आश्रितों ने 25 लाख रुपये क्षतिपूर्ति दिलवाए जाने की मांग करते हुए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में प्रकरण प्रस्तुत किया था। साक्ष्यों एवं अभिलेखों के विस्तृत परीक्षण के बाद न्यायालय ने पाया कि वाहन चालक, वाहन स्वामी तथा गवाह नितेश कुमार ने अनुसंधान अधिकारियों के साथ मिलकर दुर्घटना में शामिल नहीं रही कार को झूठा फंसाने तथा दुर्घटना की मनगढ़ंत कहानी गढ़कर उसे कोर्ट के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

कोर्ट ने इसे मिथ्या आधार पर क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का प्रयास माना। कोर्ट ने तीनों प्रकरण निरस्त करते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के साथ छल स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने वाहन चालक, वाहन स्वामी, गवाह नितेश कुमार तथा अनुसंधान अधिकारी की भूमिका की जांच कर आवश्यक वैधानिक कार्रवाई किए के लिए पुलिस अधीक्षक को निर्णय की प्रति भेजने के लिए भी कहा है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी चाहे तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध विधि अनुसार स्वतंत्र कार्रवाई स्पेशल टास्क फोर्स में कर सकती है।

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