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भक्ति का अनोखा रूप… रामेश्वरम से 2100 किमी दौड़कर इंदौर पहुंचेगी ‘डाक कावड़’, 171 घंटे में पूरी होगी यात्रा

भक्ति का अनोखा रूप… रामेश्वरम से 2100 किमी दौड़कर इंदौर पहुंचेगी ‘डाक कावड़’, 171 घंटे में पूरी होगी यात्रा

भोले की भक्ति के कई स्वरूप हैं। इसमें से एक शहर से निकलने वाली नॉनस्टॉप सीताराम डाक कावड़ यात्रा है। इसमें कांवड़िये इस बार तमिलनाडु स्थित रामेश्वरम ज…और पढ़ें

Publish Date: Mon, 03 Aug 2026 10:28:54 PM (IST)Updated Date: Mon, 03 Aug 2026 10:28:54 PM (IST)

रामेश्वरम से 2100 किमी दौड़कर इंदौर पहुंचेगी ‘डाक कावड़’

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भोले की भक्ति के कई स्वरूप हैं। इसमें से एक शहर से निकलने वाली नॉनस्टॉप सीताराम डाक कावड़ यात्रा है। इसमें कांवड़िये इस बार तमिलनाडु स्थित रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग से 2100 किलोमीटर दौड़ते हुए कांवड़ लेकर इंदौर आएंगे। 2100 किलोमीटर की यह यात्रा 171 घंटों में पूरी होगी। अहिल्या की नगरी में आकर स्कीम नंबर 78 स्थित अरण्यधाम संत आश्रम स्थित राम-रामेश्वर महादेव मंदिर में जलाभिषेक करेंगे।

2015 से अनवरत जारी है परंपरा: 10 अगस्त को रवाना होगा जत्था

पूर्वी क्षेत्र के बावड़ी वाले हनुमान मंदिर (अरण्य धाम संत आश्रम) के संस्थापक महामंडलेश्वर रामजी बाबा ने बताया कि वर्ष 2015 से अनवरत दौड़ते हुए सीताराम डाक कावड़ की शुरुआत की गई थी। इसके माध्यम से श्रद्धालु सावन माह में अलग-अलग पवित्र धामों से जल लाकर महादेव का अभिषेक करते आ रहे हैं। इस बार तमिलनाडु के रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग से 15 अगस्त को सुबह 9:00 बजे विशेष पूजा-अर्चना एवं अभिषेक के बाद लगातार दौड़ने वाली इस डाक कावड़ की शुरुआत होगी। इसके लिए अरण्य धाम संत आश्रम से श्रद्धालुओं का काफिला 10 अगस्त को इंदौर से रवाना होगा।

सीताराम भक्त मंडल के कमलेश्वर सिंह सिसोदिया ने बताया कि लगभग 250 से 300 कार्यकर्ता व श्रद्धालु 10 अगस्त को इंदौर से रामेश्वरम के लिए प्रस्थान करेंगे। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के खान-पान की व्यवस्था के लिए 25 सदस्यीय रसोइयों (महाराज) का दल भी पूरे समय साथ रहेगा। प्रत्येक कांवड़िया बारी-बारी से 150-200 किलोमीटर दौड़ेगा।

तीन प्रकार की कांवड़ परंपरा

  • अखंड कांवड़: इसमें श्रद्धालु जल लेकर दिन-रात पैदल चलते हैं और रास्ते में कहीं विश्राम नहीं करते हैं।
  • पैदल कांवड़: इसमें श्रद्धालु सूर्योदय से सूर्यास्त तक पैदल यात्रा करते हैं और रात्रि में विश्राम करते हैं।
  • डाक कांवड़: इसमें कांवड़िये कांवड़ लेकर दौड़ते हैं। कांवड़ एक ही होती है, लेकिन कांवड़िये बारी-बारी से बिना रुके दिन-रात दौड़ते हुए गंतव्य तक पहुंचते हैं। (यह परंपरा मुख्य रूप से उत्तराखंड और झारखंड क्षेत्र में प्रचलित रही है।)

ऐसे बढ़ती गई कांवड़ यात्रा की दूरी

  • 2015 से 2019 तक: ओंकारेश्वर से उज्जैन 150 किमी की यात्रा की।
  • 2020 में: खेड़ी घाट से 60 किमी की यात्रा की।
  • 2021 में: ओंकारेश्वर से 90 किमी की यात्रा की।
  • 2022 में: अमरकंटक से 900 किमी की यात्रा की।
  • 2023 में: गंगोत्री धाम से 1500 किमी की यात्रा की।
  • 2024 में: द्वारकाधीश गुजरात से 1100 किमी की यात्रा की।
  • 2025 में: राम जन्मभूमि अयोध्या से भी 1100 किमी की यात्रा की।

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–</p> <p>_अपनी उल्फत के वो नगमात मिले,_<br/>_मिलना चाहा था मगर बीच में दीवार मिले….._<br/>_आ के बैठे ही थे महफिल में, के बेजार उठे,_<br/>_हमसे पहले भी तो, साकी के तलबगार मिले…._<br/>_माना दुनिया में है खुदगर्ज-ओ-बेवफा ही नहीं,_<br/>_माना हर गाम पर इन्सां भी खुद्दार मिले_<br/>_घर से निकले थे वो दामन को बचाकर अपने_<br/>_उन पर ही इल्जाम के छीटें सरे बाजार मिले_<br/>_बाद मुद्दत के यह “कौशल” है होश में आये_<br/>_गो जिंदगानी में ठोकर ही बार-बार मिले_</p> <p>ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी है। आशिक का अपनी महबूब को अपनी चाहत पेश करने का जो अंदाज है वह जज्बाती बना देता है। उदाहरण के तौर पर-<br/>_”ये करम मुझपर तेरी चाहतों का रहा,_<br/>_कभी ओंस से बुझी प्यास तो कभी दरिया ने भी प्यासा रखा।”_</p> <p>यह शायरी प्रेम की विडंबना और जीवन के विरोधाभासों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है। ‘ओस’ और ‘दरिया’ जैसे बिंबों का प्रयोग ग़ज़ल को सौंदर्य और गहराई प्रदान करता है।</p> <p>इसी प्रकार-<br/>_”तुझे हासिल करने की ऐसी ज़िद रही,_<br/>_तुझे खो कर भी पाने की उम्मीद रही।”_</p> <p>यहाँ शायर अपने मर्म को ऐसे पेश करता है जैसे लगता है प्रेम की दृढ़ता, समर्पण और आशा का अत्यंत मार्मिक चित्रण हो। वहीं, “तन्हाइयों” और “यादों” का उल्लेख रचना को भावनात्मक विस्तार देता है। सहज भाषा, लयपूर्ण अभिव्यक्ति आम पाठकों के लिए भी पठनीय है। कठिन शब्दों या अलंकरणों के बजाय स्वाभाविक अभिव्यक्ति को महत्व दिया गया है, जिससे ग़ज़लें सीधे हृदय तक पहुँचती हैं। शायर की संवेदनशील दृष्टि और भावों की ईमानदारी इन रचनाओं को विशेष बनाती है।</p> <p>_”जला रखा हूँ दीपक तेरे आने की चाहत लिए,_<br/>_जलाना दिल न पड़े, तेरे न आने की सूरत में….”_</p> <p>आनंद कौशल का यह ग़ज़ल-शायरी-संग्रह प्रेम-विरह, इंतज़ार-मिलन, साथ-तन्हाई और वफ़ा-बेवफ़ाई जैसी मानवीय संवेदनाओं को बेहद सहज और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।</p> <p>_”अश्कों को दामन में छिपाये बैठा सारी रात,_<br/>_शहरों को यूँ वीरानियों में डूबते देखा था…”_</p> <p>प्रत्येक शेर में अनुभवों की गहराई और भावनाओं की सच्चाई झलकती है, जिससे पाठक स्वयं को इन रचनाओं से जुड़ा हुआ महसूस करता है। यही कारण है कि यह संग्रह केवल साहित्य-प्रेमियों ही नहीं, बल्कि नए पाठकों को भी आकर्षित करने की क्षमता रखता है।<br/>आनदं कौशल ने अपनी हमनशीं में सिर्फ मोहब्बत, जुदाई, वफ़ा का हीं जिक्र नहीं किया है. उन्होंने वर्तमान सामाजिक और राजनितिक परिस्थितयों पर भी चोट की है।</p> <p>_मुश्किलें हज़ार हैं दो जून रोटी की जुगाड़ में…..,_<br/>_कितनी उम्मीदों को हर रोज देखता हूँ कबाड़ में….”_<br/>और<br/>_”ये राजनीति का चरित्र है….._<br/>_बोल और कृत्य विचित्र है…..”_</p> <p>समग्र रूप से यह संग्रह प्रेम और जीवन की भावनाओं का सुंदर दस्तावेज़ है। आनंद कौशल की लेखनी संवेदनाओं को शब्दों का ऐसा रूप देती है, जो पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ती है। यह संग्रह समकालीन हिंदी-उर्दू शायरी के पाठकों के लिए एक सराहनीय और पठनीय कृति कही जा सकती है।<br/>अगर आप आसान भाषा में दिल को छू लेने वाली शायरी पढ़ना पसंद करते हैं, तो यह किताब आपको ज़रूर अच्छी लगेगी। उम्मीद है कि शायरी पसंद करने वाले हर पाठक को इसमें अपने मन के भाव कहीं न कहीं ज़रूर मिलेंगे। आनंद कौशल जी को उनकी मर्मस्पर्शी कृति (हमनशीं) के लिए बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।<br/>……………<br/>मधुप मणि “पिक्कू”<br/>पत्रकार, लेखक सह महासचिव, डब्ल्यूजेएआई</p> 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