ग्वालियर में गहराया जलसंकट: तिघरा बांध में अगस्त तक का ही स्टॉक शेष!
- शहर में ज्यादातर जगह पर पानी की आपूर्ति तिघरा बांध से होती है। बांध से इन दिनों रोजाना करीब तीन एमसीएफटी पानी तेज धूप के कारण वाष्पीकृत हो रहा है। बांध का जलस्तर लगातार नीचे जाने से सप्लाई का प्रेशर घट गया है, जिसके कारण शहर के कई इलाकों में जल संकट होना शुरू हो गया है। कई इलाकों में तिघरा की सप्लाई सही प्रेशर नहीं पहुंच पा रही है, जिससे लोगों को पानी नहीं मिल रहा।
शहडोल: पहाड़ की चोटी पर बसा है गांव,दो किमी खाई से लाते हैं पानी
- जिले के ब्यौहारी जनपद की ग्राम पंचायत धांधोकुई का गांव दाल गांव ऊंचाई पर बसा होने के कारण जलस्तर काफी नीचे है। एकमात्र हैंडपंप सालों से खराब पड़ा है। ग्रामीणों को तपती धूप में पथरीले, खतरनाक रास्तों से 2 किलोमीटर नीचे उतरना पड़ता है। सिद्ध बाबा के पास गहरी झिरिया से महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे बच्चे सिर पर घड़ा रखकर पानी ढोते हैं। एक बार पानी लाने में डेढ़ से दो घंटे लग जाते हैं। दिन में कई चक्कर लगाने पड़ते हैं।
इंदौर में गंभीर जलसंकट… 35 लाख आबादी प्यासी, 60% बोरिंग सूखे, अब 3 साल तक टैंकरों के भरोसे रहेगा स्वच्छता का सरताज

आइये अब समझते हैं मध्य प्रदेश की भौगोलिक स्थिति
मध्य प्रदेश में जल संकट केवल बारिश की कमी या गर्मी बढ़ने का परिणाम नहीं है, यहां की भौगोलिक संरचना कुछ ऐसी है कि बारिश का पानी संचय नहीं हो पाता।
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संकट की जड़ों में भूवैज्ञानिक संरचना, कृषि पद्धतियों, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और विकास के वर्तमान मॉडल की संयुक्त भूमिका है।
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शेष रूप से पश्चिमी मध्य प्रदेश अर्थात मालवा और निमाड़ भूगर्भीय दृष्टि से बेसाल्टिक कठोर चट्टानों पर स्थित है।
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इन चट्टानों में जल संग्रहण की क्षमता सीमित होती है, इसलिए यहाँ भूजल का प्राकृतिक भंडारण अपेक्षाकृत कम होता है।

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विंध्य क्षेत्र में कठोर सैंडस्टोन संरचनाएं
विंध्य क्षेत्र में अधिकांश स्थानों पर कठोर सैंडस्टोन संरचनाएँ पाई जाती हैं, जिनकी porosity और permeability कम होने के कारण भूजल संचयन सीमित रहता है। भूजल वैज्ञानिक सुधीन्द्र मोहन शर्मा बताते हैं कि बुंदेलखंड क्षेत्र की ग्रेनाइट चट्टानें तो और भी कठिन परिस्थिति उत्पन्न करती हैं, क्योंकि इनमें गहराई में भी पर्याप्त जल उपलब्ध होना मुश्किल होता है।

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मुरैना, नरसिंहपुर, हरदा, होशंगाबाद में अच्छा भूजल संचय
इसके विपरीत, पूर्वी मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्र जैसे नरसिंहपुर तथा मध्य क्षेत्र के हरदा और होशंगाबाद (नर्मदापुरम) और उत्तरी मध्य प्रदेश के मुरैना के कुछ हिस्से Alluvial Formations पर स्थित हैं, जहाँ रेत और अवसादयुक्त संरचनाओं के कारण भूजल अपेक्षाकृत अच्छी मात्रा में प्राप्त हो जाता है।
…तो आखिर कहां है समस्या!
यह समस्या केवल भूविज्ञान तक सीमित नहीं है, खेती और सिंचाई भी अहम वजह है। जानिये कैसे।
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प्रदेश में उपलब्ध भूजल का लगभग 90 प्रतिशत उपयोग कृषि में हो रहा है, लेकिन सिंचाई की वर्तमान पद्धतियों में जल उपयोग दक्षता अत्यंत कम है।
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अनुमानतः खेतों में उपयोग किए गए कुल पानी का केवल 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा ही वास्तव में फसलों की जड़ों तक पहुँच पाता है।
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शेष जल या तो वाष्पीकृत हो जाता है या बहाव के रूप में नष्ट हो जाता है।
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कुछ हिस्सा पुनः भूजल में अवश्य लौटता है, लेकिन कुल मिलाकर यह अत्यधिक दोहन की स्थिति को संतुलित नहीं कर पाता।
प्रदेश की अधिकांश नदियों में जल स्त्रोतों का अभाव
मध्य प्रदेश में नर्मदा और चंबल जैसी कुछ प्रमुख नदियों को छोड़ दें तो अधिकांश क्षेत्रों में बड़े और स्थायी सतही जल स्रोतों का अभाव है। ताप्ती नदी का प्रभाव भी केवल सीमित हिस्सों तक है। परिणामस्वरूप प्रदेश की जल आवश्यकता का मुख्य भार भूजल पर ही आ जाता है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुसीबत
इस संकट को जलवायु परिवर्तन ने और गंभीर बना दिया है। वर्षा अब अधिक अनियमित और असंतुलित होती जा रही है। कहीं अल्प अवधि में अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कहीं लंबे सूखे की स्थिति बन रही है। इससे भूजल रिचार्ज, तालाबों और नदियों में जल उपलब्धता तथा जलाशयों की स्थिरता प्रभावित हो रही है।

गांवों से शहरों की ओर पलायन ने तेजी से बढ़ाई पानी की खपत
दूसरी ओर, कृषि से घटते लाभ और जल संकट के कारण ग्रामीण आबादी तेजी से शहरों की ओर पलायन कर रही है। इंदौर, भोपाल और अन्य बड़े शहरों में बढ़ती जनसंख्या ने शहरी जल मांग को अत्यधिक बढ़ा दिया है. यही नहीं, जिन क्षेत्रों में शहरीकरण तेजी से हो रहा है, वहीं उद्योगों का विस्तार भी अधिक हो रहा है, क्योंकि वहाँ श्रमिक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं. उद्योग, उनसे जुड़े छोटे व्यवसाय और बढ़ती शहरी आबादी — सभी मिलकर जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे हैं।

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सड़कों, हाईवे, कॉलोनियों और कंक्रीट के रास्तों पर नहीं ठहरता पानी
विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर सड़कों, हाईवे, कॉलोनियों और कंक्रीट आधारित निर्माण कार्यों ने प्राकृतिक ड्रेनेज प्रणाली और भूजल रिचार्ज क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है। वर्षा का जल अब पहले की तरह भूमि में समाहित होने के बजाय तेजी से बहकर निकल जाता है।
महज पानी की कमी नहीं, विकास के मॉडल के असंतुलन का नतीजा
इस प्रकार मध्य प्रदेश का जल संकट केवल “पानी की कमी” का विषय नहीं, बल्कि जनसंख्या वृद्धि, भूवैज्ञानिक सीमाएँ, कृषि पद्धतियाँ, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और विकास मॉडल के असंतुलन का सम्मिलित परिणाम है। यही कारण है कि इंदौर सहित प्रदेश के अनेक शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में हर वर्ष गर्मी के मौसम में जल संकट गंभीर रूप ले लेता है।
…तो अब समाधान के लिए क्या किया जाना चाहिये
आज आवश्यकता केवल नए जल स्रोत खोजने की नहीं, बल्कि जल उपयोग की संस्कृति बदलने की है. सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, रिचार्ज संरचनाएँ, प्राकृतिक जलमार्गों का संरक्षण, फसल चक्र में बदलाव और जल के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व — यही वे उपाय हैं जो भविष्य में मध्य प्रदेश को स्थायी जल सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
इधर, जलसंकट पर राजनीति शुरू, कांग्रेस ने कहा 90 प्रतिशत पानी योग्य नहीं, भाजपा ने किया खंडन
इंदौर में पेयजल को लेकर राजनीतिक घमासान छिड़ गया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने शुक्रवार को पत्रकारों से एक रिपोर्ट साझाकर दावा किया कि शहर का 90 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं रह गया है।
नोएडा की लैब की 259 पेज की इस रिपोर्ट को जारी करते हुए इसके हवाले से पटवारी ने कहा कि इंदौर पेयजल के मामले में सबसे संक्रमित शहर बन गया है। यहां पीने के पानी में वही ईकोलाई और कोलीफोर्म बैक्टीरिया है, जो मल में पाया जाता है। वहीं, भाजपा ने इस रिपोर्ट को झूठा बताया है।
36 लोग इंदौर में जहरीले पानी से मारे गए।
क्या मुख्यमंत्री और इंदौर के प्रभारी मंत्री ने इस घटना के बाद इंदौर के पानी के सैंपल लेकर उनकी जांच करवाई?
आज विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस ने पूरे इंदौर में पानी की जांच कराई, जिसमें 98% सैंपल फेल निकले।
यह है मध्य प्रदेश की असली… pic.twitter.com/lxcSwspcuZ
— Jitendra (Jitu) Patwari (@jitupatwari) May 29, 2026
पटवारी ने कांग्रेस नेताओं के साथ पत्रकार वार्ता में कहा कि नगरीय सीमा में आने वाली सात विधानसभा क्षेत्रों के अलग-अलग वार्डों से 240 नमूनों की जांच देश की आधुनिकतम व स्वतंत्र लैब में करवाई गई। फरवरी में 26 दिनों तक खुद लैबोरेटरी के कर्मचारियों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ पेयजल के नमूनों को एकत्र किया था।
हर नमूने के साथ जियो टैगिंग और वीडियोग्राफी भी की गई। इंदौर के नागरिकों को ऐसा पानी पिलाया जा रहा है जिससे उन्हें गंभीर बीमारियां हो रही हैं। पानी में ऐसी अशुद्धियां मिली हैं जिससे जलजनित संक्रमण से लेकर किडनी फेलियर, अस्थमा और अन्य गंभीर बीमारियां हो रही हैं। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा कि कांग्रेस द्वारा पेश की गई रिपोर्ट झूठी है। स्वच्छ और वाटर प्लस बन चुके शहर की छवि खराब करने का षड्यंत्र है।
यहां देखें कांग्रेस द्वारा जारी वीडियो
इंदौर की यह जल रिपोर्ट देखिए :
240 पानी के सैंपलों में से 98% फेल पाए गए!
⦿ इंदौर की जनता पानी नहीं, ज़हर पीने को मजबूर है। pic.twitter.com/mkwOMtRXkR
— MP Congress (@INCMP) May 29, 2026
अब जानिये क्या है मध्य प्रदेश की औसत बारिश
मध्य प्रदेश में औसत वार्षिक बारिश लगभग 112 सेमी (लगभग 44 इंच) है। यह प्रमुख तौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान (जून से सितंबर माह के बीच) दर्ज की जाती है। प्रदेश में बारिश का वितरण सभी क्षेत्रों में समान नहीं है। यह पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है।
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अधिक बारिश वाले क्षेत्र: दक्षिण-पूर्वी हिस्सों (जैसे मंडला, बालाघाट) में औसत बारिश 1,370 मिमी (53.9 इंच) से लेकर कुछ स्थानों पर 2,150 मिमी (84.6 इंच) तक होती है।
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सामान्य बारिश वाले क्षेत्र: मध्य प्रदेश और मालवा क्षेत्र (जैसे इंदौर, भोपाल) में सामान्य बारिश होती है।
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कम बारिश वाले क्षेत्र: पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी जिलों (जैसे भिंड, मुरैना, ग्वालियर) में औसत बारिश 1,000 मिमी (39.4 इंच) या उससे कम होती है।

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मध्य प्रदेश की प्रमुख नदियां
1. नर्मदा नदी
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उद्गम: अनूपपुर जिले के अमरकंटक पठार से है।
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लंबाई: कुल 1312 किमी (मध्य प्रदेश में 1077 किमी)।
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विशेषता: पश्चिम की ओर बहने वाली यह देश की सबसे बड़ी नदी है। यह सीधे अरब सागर (खंभात की खाड़ी) में मिलती है। कई जिलों से गुजरने के कारण इसे मध्य प्रदेश की “जीवन रेखा” भी कहा जाता है।
2. चंबल नदी
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उद्गम: इंदौर के महू के निकट जानापाव पहाड़ियों से निकलती है।
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लंबाई: कुल 965 किमी।
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विशेषता: इसे प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी नदी कहा जाता है। यहां से निकलकर यह यूपी के इटावा में यमुना नदी में समाहित हो जाती है।
3. ताप्ती नदी
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उद्गम: बैतूल जिले के मुलताई से निकलती है।
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लंबाई: लगभग 724 किमी।
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विशेषता: यह नदी भी नर्मदा की ही तरह पश्चिम की ओर बहती है। अंत में यह अरब सागर में जाकर गिरती है।
4. सोन नदी
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उद्गम: अनूपपुर जिले के अमरकंटक से निकलती है।
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लंबाई: लगभग 780 किमी।
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विशेषता: यह उत्तर दिशा में बहने वाली प्रदेश की ऐसी प्रमुख नदी है, जो बिहार में गंगा नदी में समाहित होती है।
5. बेतवा नदी
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उद्गम: रायसेन जिले की विंध्याचल पर्वतमाला से।
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लंबाई: लगभग 590 किमी।
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विशेषता: इसे “मध्य प्रदेश की गंगा” भी कहा जाता है। अपने सांस्कृतिक महत्व के कारण इसे यह पहचान मिली है।
6. क्षिप्रा नदी
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उद्गम: इंदौर के काकरा बर्दी पहाड़ी से निकली है।
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विशेषता: धार्मिक महत्व होने चलते इसे “मालवा की गंगा” भी कहा जाता है। इसके तट पर उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ का मेला आयोजित होता है।

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आपातकाल में इन कंट्रोल रूम, हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करें
जल संकट के चलते प्रदेश सरकार ने सभी जिलों में कंट्रोल रूम स्थापित किए हैं। पानी की आपूर्ति से जुड़ी शिकायतों के समाधान के लिए आप इन माध्यमों से सहायता ले सकते हैं।
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स्थानीय कंट्रोल रूम: अपने जिले में सहायता के लिए अपने कलेक्टर कार्यालय, नगर निगम कार्यालय या लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के स्थानीय कंट्रोल रूम में संपर्क करें।
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हेल्पलाइन नंबर: मध्य प्रदेश शासन द्वारा सभी जिलों में पेयजल की किल्ल्त के निवारण के लिए ज़िला स्तर पर विशेष हेल्पलाइन (उदाहरण के लिए धार आदि जिलों में 6265233535) भी जारी किए गए हैं।
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सीएम हेल्पलाइन (CM Helpline): पेयजल संबंधित आपातकालीन समस्या के लिए टोल-फ्री नंबर 181 पर कॉल करके शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
ज़िला स्तर पर पानी के टैंकरों की व्यवस्था और शिकायतों के समाधान की निगरानी दैनिक रूप से की जा रही है। किसी भी आपातकालीन स्थिति में अपने स्थानीय नगर निगम या ग्राम पंचायत के अधिकारियों से संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए मध्य प्रदेश शासन की आधिकारिक वेबसाइट देखें।

जलसंकट के बारे में चेताते, सजग करते ये वीडियो भी देखें
- यह संकट है बड़ा
- सीमित है पीने का पानी
शोध सामग्री के लिए संदर्भ एवं साभार
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भूजल वैज्ञानिक सुधीन्द्र मोहन शर्मा (पूर्व राष्ट्रीय नोडल अधिकारी पेयजल सुरक्षा, भारत सरकार)
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