8 अप्रैल को पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी की बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की बैठक हुई। उसमें संविदा नियुक्ति की नीति बनाते हुए तय कर लिया गया कि रिटायर होन …और पढ़ें
HighLights
- चूंकि इसके लिए संविदा नियुक्ति के लिए नियम व नीति नहीं थी।
- बिजली कंपनी के बोर्ड ने नए नियम व नीति तय कर लिए गए।
- सप्ताहभर में ही तुरत-फुरत में अकेला आवेदन बुला लिया गया।
नईदुनिया प्रतिनिधि,इंदौर। पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण ने मैदानी इंजीनियर के सबसे बड़े पद इंजीनियर पद पर ही संविदा नियुक्ति की तैयारी कर ली थी। संविदा नियुक्ति के लिए नियम व नीति नहीं थी तो इस महीने की शुरुआत में बिजली कंपनी के बोर्ड ने नए नियम व नीति तय कर लिए गए।
सप्ताहभर में ही तुरत-फुरत में एक अकेला आवेदन बुलाया गया। छानबीन समिति ने कमियां पकड़ी लेकिन अनदेखा कर नियुक्ति को मंजूरी देने के लिए फाइल उर्जा विभाग भोपाल भी भेज दी गई।
बिजली कंपनी के अधीक्षण यंत्री और चीफ इंजीनियर स्तर के 21 वरिष्ठ इंजीनियरों ने ही इस मनमानी प्रक्रिया की पोल खोल दी। इंजीनियरों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी। पहली ही सुनवाई में कोर्ट ने प्रक्रिया को प्रारंभिक रूप से संदेहास्पद मानते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।
बिजली कंपनी में चीफ इंजीनियर व समकक्ष उच्च पदों पर नियमित नियुक्ति होती रही है। कंपनी में इस श्रेणी में संविदा के कोई पद नहीं है। जूनियर इंजीनियर और सहायक इंजीनियर पद पर भर्ती होने वाले इंजीनियर वर्षों के अनुभव और प्रमोशन के बाद इस पद पर पहुंचते हैं।
8 अप्रैल को पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी की बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की बैठक हुई। उसमें संविदा नियुक्ति की नीति बनाते हुए तय कर लिया गया कि रिटायर होने वाले कंपनी के पूर्व अधिकारियों को इस पद पर संविदा आधार पर नियुक्ति दी जा सकेगी।
बिजली कंपनी के अधीक्षण यंत्री राजेंद्र नेगी, सुधीर आचार्य, अचल जैन, पूर्व चीफ इंजीनियर कामेश श्रीवास्तव समेत 21 इंजीनियरों ने इस पर कोर्ट की शरण ली।नियुक्ति प्रक्रिया को नियमविरुद्ध व दोषपूर्ण बनाते हुए रोकने की याचिका दायर की।
आरटीआई से हुआ खुलासा
- मंगलवार को याचिका पर पहली सुनवाई हुई। बिजली कंपनी के इंजीनियरों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पीयूष माथुर ने करीब 20 मिनट तक तर्क रखे।
- उन्होंने इंजीनियरों द्वारा आरटीआई में निकाले गए आवेदन व दस्तावेज पेश किए। कोर्ट से कहा कि प्रदेश की चार बिजली वितरण कंपनियों, पॉवर मैनेजमेंट कंपनी, ट्रांसमिशन कंपनी जैसी छहों कंपनियों में से सिर्फ एक इंदौर की बिजली कंपनी ने ही संविदा नियुक्ति की नीति को स्वीकार किया।
- संविदा नियुक्ति उन पदों पर होती है जो पद संविदा के लिए सृजित हो। यहां तो ऐसा कोई पद संविदा श्रेणी में सृजित नहीं है। नियुक्ति प्रक्रिया होती है तो उसमें सार्वजनिक आवेदन मंगाए जाते हैं।
- यहां एक मात्र आवेदन बाबुलाल चौहान का लिया गया जो अब भी बिजली कंपनी में प्रभार के रूप में चीफ इंजीनियर उज्जैन के पद पर है और आने वाले दिनों में रिटायर होना है।
- छानबीन समिति ने पूर्व सेवा विवरण को संतोषप्रद नहीं माना फिर भी एक आवेदन के आधार पर नियुक्ति को मंजूरी देने के लिए आगे बढ़ा।
- याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट माथुर ने तर्क रखा कि इस तरह तो किसी खास को लाभ देने के उद्देश्य से होने वाली मनमानी नियुक्ति प्रक्रिया से सेवारत मौजूदा इंजीनियरों के प्रदोन्नति के अवसर भी छिने जा रहे हैं।
- कोर्ट ने तर्कों से सहमत होते हुए पूरी नियक्ति प्रक्रिया को स्थगति करने का आदेश दिया।
- शासन के साथ बिजली कंपनी और नियुक्ति के लिए आवेदन करने वाले इंजीनियर चौहान समेत पांच को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
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